भारतीय खानपान में चावल से तैयार होने वाले व्यंजनों की कोई कमी नहीं है, लेकिन पश्चिमी भारत के पारंपरिक चूल्हों पर पकने वाली कुछ बेहद खास देसी विधियां अब भी मुख्यधारा की चकाचौंध से दूर हैं. महाराष्ट्र के कोल्हापुर अंचल में बेहद चाव से बनाया जाने वाला ऐसा ही एक अनूठा भोजन रावणभात कहलाता है. इस पारंपरिक डिश का नाम सुनते ही मानस पटल पर पौराणिक आख्यानों का स्मरण होना स्वाभाविक है, हालांकि खानपान की दुनिया में यह कोई युद्ध नहीं बल्कि सादे अन्न को सुगंधित मसालों के साथ सजाने की एक सलीकेदार कला है. उबले हुए चावलों के साथ जब भीगी हुई चना दाल और देसी बघार का संगम होता है, तो एक ऐसा व्यंजन तैयार होता है जो सादगी और स्वाद का बेजोड़ उदाहरण पेश करता है.
प्याज और लहसुन के बिना उभरती सुगंध
अकसर पुलाव, बिरयानी या अन्य नमकीन चावलों की तैयारी में तली हुई प्याज और कुटे हुए लहसुन को जायके की बुनियाद माना जाता है, मगर इस पारंपरिक व्यंजन की खासियत यह है कि इसमें इन दोनों ही चीजों का जरा भी प्रयोग नहीं किया जाता. इसके बावजूद हर निवाला खुशबूदार और तृप्त करने वाला सिद्ध होता है. इसका समूचा स्वाद भारतीय रसोई के बुनियादी खड़े मसालों के सही संतुलन पर टिका है. गर्म किए गए खाद्य तेल में सरसों के दानों का चटकना, जीरे की सोंधी महक, सूखी लाल मिर्च की तीखी तासीर, करी पत्ते का हरापन और चुटकी भर हींग का मिश्रण एक ऐसा सोंधा आधार तैयार करता है जो किसी भी भारी ग्रेवी को मात दे सकता है. बघार में शामिल इन सभी तत्वों का अर्क जब तेल में उतरता है, तब दाल अपने भीतर इन सभी खुशबुओं को समेट लेती है.
चना दाल का अनूठा कसाव और बनावट
इस व्यंजन को आम मसाला भात से जुदा करने वाला सबसे प्रमुख घटक चना दाल है. दाल को पकाने से पहले दो से तीन घंटे तक स्वच्छ जल में भिगोकर रखा जाता है, जिससे उसके भीतर पर्याप्त नमी पहुंच जाती है. जब इस दाल को कड़ाही में पकाया जाता है, तो इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता है कि वह इतनी ही गले जिससे उसका दाना साबुत और कड़ा बना रहे. दाल का यह कसाव ही तैयार व्यंजन को एक विशिष्ट बनावट प्रदान करता है. यदि दाल को जरूरत से अधिक उबाल दिया जाए और वह पेस्ट जैसी बन जाए, तो समूचा व्यंजन अपना आकर्षण खो देता है. चावल के हर एक कोर में दाल की हल्की कुरकुरी और दानेदार उपस्थिति मुंह में एक अलग ही अनुभूति कराती है.
इमली की खटास और तीखेपन का संतुलन
रावणभात का स्वाद profile न तो बहुत मीठा होता है और न ही केवल कसैला, बल्कि इसमें इमली का गूदा या रस एक ताजगी भरा खट्टापन जोड़ता है. दाल के पक जाने के उपरांत उसमें इमली का अर्क डाला जाता है, जिससे दाल के दानों पर खटास की एक महीन परत चढ़ जाती है. लाल मिर्च पाउडर और सूखी सागा मिर्च की गर्माहट इस खटास को संतुलित करती है. इस तरह कम से कम सामग्रियों के प्रयोग के बाद भी भोजन में एक गहरा, बहुआयामी स्वाद पैदा हो जाता है, जो सादे चावल को किसी उत्सव के पकवान जैसा बना देता है.
तैयारी की सामग्री और प्राथमिक चरण
इस स्वादिष्ट क्षेत्रीय डिश को अपने घर पर बनाने के लिए किसी दुर्लभ सामग्री की दरकार नहीं होती. प्राथमिक रूप से पहले से पकाकर रखे गए सादे चावल और अच्छी गुणवत्ता वाली चना दाल ही इसकी मुख्य धुरी हैं. तड़के और बघार के लिए रसोई में मौजूद सरसों, जीरा, सूखी लाल मिर्च, करी पत्ता, शुद्ध हींग, पिसी लाल मिर्च और स्वादानुसार सादा नमक एकत्र कर लें. इसके अलावा स्वाद को उभारने के लिए ताजी इमली का रस और गार्निशिंग हेतु बारीक कटी हरी धनिया की पत्तियां आवश्यक हैं. कुछ घरों में अतिरिक्त कुरकुरापन जोड़ने के लिए अलग से भुनी हुई मूंगफली के दाने भी मिलाए जाते हैं, जबकि तटीय प्रभाव वाले इलाकों में सूखा कद्दूकस किया हुआ नारियल भी छिड़कने का चलन है. अपनी रुचि और उपलब्धता के आधार पर इन घटकों की मात्रा घटाई या बढ़ाई जा सकती है.
बनाने की प्रक्रिया में सबसे पहला काम दाल को तैयार करना है. दाल को अच्छी तरह धोकर पर्याप्त पानी में करीब 2 से 3 घंटे के लिए छोड़ दें ताकि वह भीगकर फूल जाए. तय समय बीत जाने पर अतिरिक्त पानी को छलनी से पूरी तरह निकाल लें. दूसरी तरफ चावल को इस तरह उबालें कि उसके सभी दाने खिले-खिले रहें और आपस में चिपके नहीं. चावल का अधिक गल जाना इस व्यंजन के अंतिम रूप को बिगाड़ सकता है, इसलिए दानों का अलग-अलग रहना बेहद अहम है.
धीमी आंच पर पकाने की सटीक विधि
एक फैले हुए पेंदे वाले बर्तन या कड़ाही में थोड़ा तेल डालकर आंच पर चढ़ाएं. तेल के पर्याप्त गर्म होते ही उसमें सरसों के दाने चटकाएं. तुरंत बाद जीरा, साबुत सूखी लाल मिर्च, करी पत्ते और हींग का तड़का लगाएं. जैसे ही इन मसालों से सोंधी महक उठने लगे, तुरंत पानी निथारी हुई चना दाल कड़ाही में डाल दें. इसके साथ ही स्वादानुसार नमक और लाल मिर्च का पाउडर भी मिला दें. दाल को मध्यम आंच पर तब तक भूनें जब तक वह तेल को सोख न ले. यदि दाल को पकने में समय लगे तो उसमें चंद चम्मच पानी का छींटा मारकर ढक्कन लगा दें. जब दाल पक जाए लेकिन उसका आकार पूरी तरह साबुत रहे, ठीक उसी समय आंच धीमी करके इमली का रस दाल में मिलाएं.
चावल मिलाते वक्त बरतें यह सावधानी
जब मसालेदार दाल का मिश्रण तैयार हो जाए, तब उसमें पहले से पके हुए चावल डालने की बारी आती है. यह इस विधि का सबसे नाजुक चरण है. उबले चावलों को कड़ाही में डालते ही बहुत तेजी से पलटा न चलाएं, क्योंकि तेज हाथों से चलाने पर चावल के दाने टूटकर भरता बन सकते हैं. करछुल को किनारों से नीचे ले जाते हुए हल्के हाथों से ऊपर की ओर पलटें, ताकि दाल, इमली और मसालों का लेप हर चावल के दाने पर एकसमान चढ़ जाए. इसके पश्चात कड़ाही पर ढक्कन लगाकर बिल्कुल मंद आंच पर दो से तीन मिनट के लिए छोड़ दें. इस धीमी भाप में चावल अपने भीतर तड़के और खटास की खुशबू को पूरी तरह जज्ब कर लेते हैं. अंत में ऊपर से कटी हुई ताजी हरी धनिया बुरकें और गैस की आंच बंद कर दें.
बचे हुए चावलों का बेहतरीन सदुपयोग
इस महाराष्ट्रीयन रेसिपी का एक व्यावहारिक पहलू यह भी है कि इसके लिए रसोई में हर बार ताजा चावल पकाने की मजबूरी नहीं होती. दोपहर के भोजन अथवा पिछली रात के बचे हुए सादे भात को यदि प्रशीतक में सुरक्षित रखा गया हो, तो उनसे भी झटपट यह व्यंजन तैयार किया जा सकता है. इससे अन्न की बर्बादी भी रुकती है और मिनटों में एक जायकेदार नाश्ता या भोजन मेज पर आ जाता है. बासी चावल का इस्तेमाल करते समय केवल इस बात की सावधानी बरतनी चाहिए कि वे कमरे के तापमान पर लंबे समय तक खुले न छूटे रहे हों और उनमें किसी किस्म की बास या खराबी न आई हो. फ्रिज से निकाले ठंडे दानों को कड़ाही में डालकर तब तक भाप में रखना चाहिए जब तक कि वे भीतर तक गर्माहट न पकड़ लें.
परोसने का सलीका और पारंपरिक संगत
रावणभात अपने तीखे, खट्टे और सोंधे स्वाद के कारण बिना किसी अतिरिक्त सब्जी या दाल के भी आसानी से खाया जा सकता है. फिर भी यदि आप थाली को और समृद्ध बनाना चाहते हैं, तो इसके साथ ताजा गाढ़ा दही, भुने जीरे वाली छाछ, उड़द का तला हुआ पापड़ या फिर आम का चटपटा अचार परोस सकते हैं. ऊपर से डाली गई भुनी हुई मूंगफली हर कौर में बादामी कुरकुरापन जोड़ती है. जो लोग प्याज का सेवन करते हैं, वे थाली में किनारे पर बारीक कटी कच्ची प्याज और नींबू की फांक रख सकते हैं, हालांकि मूल कोल्हापुरी अंदाज का लुत्फ उठाने के लिए इसे बिना प्याज के ही चखना सबसे उम्दा माना जाता है.



















