बिहार के विभिन्न जिलों में कई ऐसी पारंपरिक मिठाइयां मौजूद हैं जिनका स्वाद और इतिहास बेहद अनूठा होता है। ऐसी ही एक खास सौगात नवादा जिले के पकरीबरावां की प्रसिद्ध बरा मिठाई है। मैदा और चीनी के बेहतरीन मेल से तैयार होने वाली यह मिठाई आज केवल अपने जिले तक सीमित नहीं है, बल्कि बिहार के अलावा देश के कई अन्य राज्यों में भी इसके चाहने वाले बड़ी संख्या में मौजूद हैं। अपनी खास कुरकुराहट, नाजुक बनावट और मुंह में रखते ही घुल जाने की खूबी के कारण यह लोगों के बीच खासी लोकप्रिय हो रही है।
कुटीर उद्योग के रूप में विकसित हुआ कारोबार
आधुनिक समय में नए तरह के खान-पान का चलन तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन इसके बावजूद बरा मिठाई ने अपनी पारंपरिक पहचान और मूल स्वाद को पूरी तरह से बरकरार रखा है। पकरीबरावां क्षेत्र में इस मिठाई का निर्माण आज एक बड़े कुटीर उद्योग का रूप ले चुका है, जिससे सैकड़ों लोगों की आजीविका जुड़ी हुई है। इन्हीं कारोबारियों में से एक सरयू चौधरी पिछले 25 वर्षों से इस व्यवसाय से पूरी निष्ठा के साथ जुड़े हुए हैं। वह राज्यभर में लगने वाले मेलों में विशेष स्टॉल लगाते हैं और पकरीबरावां की इस मशहूर बरा मिठाई को लोगों तक पहुंचाते हैं।
गया के शिल्प मेले में बिक रही है धड़ल्ले से
इन दिनों गया शहर के आजाद पार्क में एक भव्य शिल्प मेले का आयोजन किया जा रहा है। इस मेले में नवादा की इस पारंपरिक मिठाई का एक विशेष स्टॉल लगाया गया है, जहां खरीदारों की अच्छी खासी भीड़ देखने को मिल रही है। यह मिठाई 10 रुपये प्रति पीस और 200 से 300 रुपये प्रति किलो के दाम पर बेची जा रही है। मेले में इस अनोखी मिठाई की प्रतिदिन करीब 40 किलोग्राम तक बिक्री दर्ज की जा रही है। पकरीबरावां की यह बरा मिठाई केवल बिहार ही नहीं बल्कि देश के विभिन्न हिस्सों में लगने वाले मेलों में अपनी खास छाप छोड़ रही है।
बेहद जटिल है बनाने की पूरी प्रक्रिया
बरा मिठाई की सबसे बड़ी विशेषता इसकी अत्यधिक कोमलता और नाजुकपन है। इसे तैयार करने की प्रक्रिया जितनी कठिन और पेचीदा होती है, उतनी ही सावधानी इसे संभालते समय बरतनी पड़ती है। मैदा और चीनी की चाशनी के मिश्रण से बनने वाली यह मिठाई इतनी नाजुक होती है कि इसे बनाने से लेकर खाने तक बहुत हल्के हाथों का इस्तेमाल करना पड़ता है। थोड़ी सी भी लापरवाही होने पर यह कांच की तरह बेहद आसानी से टूटकर बिखर जाती है। इसी नफासत और बेजोड़ स्वाद के कारण कई लोग इसे मिठाइयों की रानी के रूप में भी याद करते हैं।
नवादा की मिट्टी की महक बिखेरती मिठास
जब गया के आजाद पार्क स्थित शिल्प मेले में आने वाले सैलानी इस पारंपरिक मिठाई का लुत्फ उठाते हैं, तो इसके साथ ही नवादा की माटी की खुशबू भी दूर-दूर तक महसूस होने लगती है। पकरीबरावां की पहचान बन चुकी यह मिठाई आज भी अपनी पुरानी साख के साथ शान से खड़ी है, बस इसे अब एक बड़े वैश्विक बाजार और व्यापक पहचान मिलने का इंतजार है। कारोबार से जुड़े जानकारों का मानना है कि यदि इसे उचित मंच मिले तो इसकी ख्याति और भी अधिक दूर तक फैल सकती है।
कम निवेश से शुरू हुआ था सफर
सरयू चौधरी अपने पुराने दिनों को याद करते हुए बताते हैं कि उन्होंने इस कारोबार की शुरुआत महज 10 हजार रुपये की शुरुआती लागत से की थी। धीरे-धीरे मेहनत रंग लाई और आज इससे अच्छी खासी आमदनी हो रही है। वह बिहार के अलग-अलग जिलों में आयोजित होने वाले मेलों में जाकर अपने स्टॉल लगाते हैं और हर जगह के लोगों से इस मिठाई को भरपूर प्यार मिलता है। इस मिठाई की खासियत इसका हल्कापन, खस्तापन और जबरदस्त स्वाद है।
सिक्के गिरने पर बिखर जाने का है किस्सा
इस मिठाई को इतना अधिक खस्ता और नाजुक बनाया जाता है कि मामूली सा दबाव पड़ने पर भी यह टूट सकती है। पुराने समय में इसकी इसी विशेष कुरकुराहट को लेकर एक लोकप्रिय कहावत भी कही जाती थी कि यदि इस मिठाई पर एक रुपये का सिक्का भी गिर जाए तो यह तुरंत टूटकर बिखर जाती है। मैदा और चीनी के इस अनूठे मेल को धीमी आंच पर रिफाइन तेल में छाना जाता है और उसके बाद ऊपर से चाशनी या चीनी का घोल डाला जाता है, जिससे इसका स्वाद और भी अधिक बढ़ जाता है।



















