सुबह की शुरुआत करते वक्त जब लोग ताजा दूध का सेवन करते हैं, तो अक्सर यह मान लिया जाता है कि सीधे तबेले या डेयरी से आया दूध शुद्ध और सेहतमंद ही होगा। ग्रामीण इलाकों और शहरों में भी कई लोग बिना उबाले या बिना किसी प्रक्रिया के दूध पीना ज्यादा फायदेमंद समझते हैं। हकीकत यह है कि किसी खाद्य पदार्थ का ताजा दिखना उसकी सुरक्षा की पक्की गारंटी नहीं होता। बिना किसी ताप उपचार यानी हीट ट्रीटमेंट के मिलने वाला कच्चा दूध कई ऐसे सूक्ष्मजीवों का घर हो सकता है, जिन्हें साधारण आंखों से पहचानना पूरी तरह असंभव है। यही अनदेखे रोगाणु शरीर में जाकर कई गंभीर बीमारियों की वजह बन जाते हैं।
कच्चा दूध क्या है और क्यों छिपा रहता है इसमें अदृश्य खतरा
कच्चा दूध उस दूध को कहा जाता है जिसे निकालने के बाद वैज्ञानिक तरीके से निर्धारित तापमान पर गर्म नहीं किया गया हो, यानी जिसे पाश्चराइजेशन की प्रक्रिया से न गुजारा गया हो। पशुपालन के दौरान चाहे साफ-सफाई का कितना भी ध्यान रखा जाए, दुहने के बर्तनों, पशु के थन या आसपास के वातावरण से सूक्ष्मजीव दूध में प्रवेश कर ही जाते हैं। सीडीसी के मुताबिक कच्चे दूध में कैम्पिलोबैक्टर, ई कोलाई, लिस्टेरिया, ब्रूसेला और साल्मोनेला जैसे घातक बैक्टीरिया पनप सकते हैं।
सबसे बड़ी परेशानी यह है कि रोगाणुओं से भरा दूध भी देखने, सूंघने या चखने में बिल्कुल सामान्य और ताजा लग सकता है। इसमें किसी तरह की दुर्गंध या खराबी का आभास नहीं होता। इसलिए केवल सीधे गाय या भैंस से मिलने के आधार पर उसे सुरक्षित मान लेना सेहत के साथ खिलवाड़ हो सकता है। यह जोखिम गर्भवती महिलाओं, नन्हे बच्चों, बुजुर्गों और कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता वाले व्यक्तियों के लिए जानलेवा साबित हो सकता है क्योंकि उनका शरीर इन तीव्र संक्रमणों का मुकाबला आसानी से नहीं कर पाता।
ब्रूसेलोसिस का गंभीर संक्रमण और शरीर पर इसके दुष्प्रभाव
कच्चे दूध और उससे बने बिना पाश्चराइज्ड डेयरी उत्पादों से फैलने वाली बीमारियों में ब्रूसेलोसिस प्रमुख है। यह बीमारी ब्रूसेला बैक्टीरिया के संक्रमण से होती है। सीडीसी के अनुसार संक्रमित पशुओं से मिलने वाले उत्पादों के जरिए यह कीटाणु इंसानों तक पहुंचता है और बिना उबले या बिना पाश्चराइज किए उत्पाद इसके प्रमुख वाहक बनते हैं।
जब कोई व्यक्ति ब्रूसेलोसिस की चपेट में आता है, तो उसे तेज बुखार, अत्यधिक पसीना आना, लगातार थकान, सिरदर्द और मांसपेशियों व जोड़ों में असहनीय दर्द जैसी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। अगर समय रहते इसका सही उपचार न मिले, तो कुछ गंभीर मामलों में यह संक्रमण दिल की अंदरूनी परत और वाल्व तक पहुंच जाता है, जिससे दिल का संक्रमण जैसी जानलेवा जटिलताएं पैदा हो सकती हैं।
पाश्चराइजेशन की वैज्ञानिक प्रक्रिया और भारत में एफएसएसएआई के नियम
दूध को सुरक्षित बनाने के लिए पाश्चराइजेशन सबसे भरोसेमंद वैज्ञानिक तरीका माना गया है। साधारण तौर पर दूध को थोड़ा सा गुनगुना कर लेना पाश्चराइजेशन नहीं कहलाता। इस प्रक्रिया में दूध के प्रत्येक हिस्से को एक निश्चित तापमान तक गर्म किया जाता है और फिर तय समय तक उसी तापमान पर रखकर तुरंत ठंडा कर दिया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य बीमारी फैलाने वाले तमाम रोगजनक बैक्टीरिया को पूरी तरह खत्म करना होता है।
भारत में खाद्य सुरक्षा और मानकों की निगरानी करने वाली संस्था एफएसएसएआई ने इसके लिए कड़े नियम बनाए हैं। एफएसएसएआई के तय मानकों के अनुसार, दूध के प्रत्येक हिस्से को कम से कम 63 डिग्री सेल्सियस तापमान पर लगातार 30 मिनट तक गर्म किया जाना अनिवार्य है। इसके अलावा दूसरा विकल्प यह है कि दूध को 71.5 डिग्री सेल्सियस तापमान पर कम से कम 15 सेकेंड तक गर्म किया जाए। इस निर्धारित समय और तापमान के बाद दूध को तुरंत ठंडा किया जाता है। एफएसएसएआई के नियमों में जरूरत के हिसाब से अन्य स्वीकृत तापमान और समय संयोजनों का भी स्पष्ट प्रावधान है।
अमेरिका में कड़े नियम और दोनों देशों में सुरक्षा के उपाय
कच्चे दूध से होने वाले स्वास्थ्य जोखिमों को देखते हुए अमेरिका में काफी सख्त कानूनी प्रावधान किए गए हैं। अमेरिकी खाद्य एवं औषधि प्रशासन यानी एफडीए ने 1987 में ही कच्चे दूध की अंतरराज्यीय बिक्री यानी एक राज्य से दूसरे राज्य में व्यापार पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया था। हालांकि, किसी एक राज्य की सीमा के भीतर कच्चा दूध बेचा जा सकता है या नहीं, इसका फैसला वहां की राज्य सरकारों के अपने स्थानीय कानूनों पर निर्भर करता है। एफडीए के अनुसार सभी राज्यों में इसे लेकर एक समान नियम नहीं हैं। अमेरिकी स्वास्थ्य एजेंसियां मानती हैं कि दूध से जुड़े खतरों को दूर करने का एकमात्र असरदार रास्ता पाश्चराइजेशन ही है। इसी वजह से सीडीसी हमेशा पाश्चराइज्ड दूध और उससे बने उत्पादों के इस्तेमाल की सलाह देता है।
भारत में भी बाजार में बिकने वाले पैकेज्ड दूध की गुणवत्ता एफएसएसएआई के नियमों के तहत जांची जाती है। उपभोक्ताओं के लिए यह जरूरी है कि वे दूध के पैकेट पर लिखी पाश्चराइजेशन संबंधी जानकारी को ध्यान से पढ़ें। अगर दूध सीधे डेयरी या पशुपालक से कच्चा लिया गया है या उसके पाश्चराइजेशन की पुष्टि नहीं है, तो उसे सीधे पीने की गलती कभी न करें। घर पर उसे उचित तरीके से अच्छी तरह उबालकर ठंडा करने के बाद ही पीना स्वास्थ्य की दृष्टि से सबसे सुरक्षित और समझदारी भरा कदम है।



















