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अंबाला छावनी में सजी 104 साल पुरानी फूल डोल यात्रा, जन्माष्टमी पर उमड़े श्रद्धालुहरियाणा
6 सित॰ 2026, 10:13 pm (30 मिनट पहले)· 3

अंबाला छावनी में सजी 104 साल पुरानी फूल डोल यात्रा, जन्माष्टमी पर उमड़े श्रद्धालु

हरियाणा के अंबाला छावनी में जन्माष्टमी के दूसरे दिन भगवान श्रीकृष्ण की पालकी की शोभायात्रा निकाली गई, यह परंपरा करीब 104 साल से चली आ रही है।

जन्माष्टमी बीतते ही हरियाणा के अंबाला छावनी में एक अलग ही रौनक देखने को मिलती है, जब भगवान श्रीकृष्ण की पालकी फूलों की बरसात के बीच शहर के बाजारों से होकर गुजरती है। यह नजारा किसी नए आयोजन का नहीं बल्कि करीब 104 साल पुरानी उस परंपरा का है, जिसे स्थानीय लोग फूल डोल मेला कहते हैं। हरियाणा और पंजाब के कई जिलों से श्रद्धालु सिर्फ इस मेले में शामिल होने के लिए अंबाला पहुंचते हैं।

अंग्रेजों के दौर से चली आ रही रवायत

अंबाला जिले की पहचान आमतौर पर उसकी छावनी और पुरानी इमारतों से जुड़ी रहती है, लेकिन यह इलाका अपनी धार्मिक परंपराओं के लिए भी उतना ही जाना जाता है। जन्माष्टमी के अगले दिन आयोजित होने वाला फूल डोल मेला अनाज मंडी इलाके में बने श्री सत्संग सभा शिवाला रजि. शिव मंदिर परिसर में लगता है। मंदिर के पुजारी देव ढोंडियाल का कहना है कि यह मंदिर खुद 150 साल से भी ज्यादा पुराना है और अंग्रेजों के शासनकाल से ही यहां हर साल यह आयोजन होता आया है।

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पंचामृत स्नान, छप्पन भोग और नौका की रस्म

पुजारी देव ढोंडियाल के मुताबिक हर साल जन्माष्टमी के अगले दिन शुरुआत भगवान श्रीकृष्ण के पंचामृत स्नान से होती है, इसके बाद उनके पुराने वस्त्र बदले जाते हैं। इस बार भी यही क्रम दोहराया गया, नए वस्त्र पहनाने के बाद विधिवत पूजा हुई और ठाकुर जी को छप्पन भोग अर्पित किया गया। इसके बाद मंदिर परिसर में बने एक कुंड में भगवान श्रीकृष्ण को नौका पर बिठाकर भ्रमण कराया गया। यह नौका वाली रस्म हर साल फूल डोल मेले से ठीक पहले निभाई जाती है और इसे भी इस आयोजन का अहम हिस्सा माना जाता है।

दो अलग-अलग मंदिरों से निकलीं पालकियां

नौका की रस्म पूरी होते ही फूल डोल मेले का असली सिलसिला शुरू हुआ, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण की दो अलग-अलग पालकियां शामिल की गईं। एक पालकी हाथी खाना इलाके में स्थित श्री कैलाश मंदिर से रवाना हुई, जबकि दूसरी पालकी सीधे अनाज मंडी वाले मंदिर से निकली। दोनों पालकियां शहर के प्रमुख बाजारों से होकर गुजरीं और रास्ते भर लोग हाथों में फूल लिए पालकी के स्वागत के लिए खड़े नजर आए। कई इलाकों में आतिशबाजी भी हुई, जिससे पूरे रास्ते भक्तिमय माहौल बना रहा।

पुजारी देव ढोंडियाल के मुताबिक शोभायात्रा जहां-जहां से गुजरी, वहां श्रद्धालुओं ने फूल बरसाकर भगवान का स्वागत किया। बड़ी तादाद में लोग पालकी के साथ पैदल चलते हुए भी नजर आए। यात्रा सुभाष पार्क के सामने बने बीपीएस प्लेनेटोरियम तक जा पहुंची, वहां कुछ देर ठहराव के बाद पालकी वापसी के लिए रवाना हुई। अनाज मंडी मंदिर लौटने पर भगवान श्रीकृष्ण की आरती उतारी गई और दोबारा छप्पन भोग का प्रसाद चढ़ाया गया।

दूर-दराज से पहुंचते हैं श्रद्धालु

फूल डोल मेले की सबसे बड़ी खासियत यही है कि यह सिर्फ अंबाला छावनी तक सीमित नहीं रहता। हरियाणा और पंजाब के अलग-अलग जिलों से लोग खासतौर पर इस शोभायात्रा में शामिल होने के लिए यहां पहुंचते हैं। पालकी के साथ चलना, रास्ते में फूल बरसाना और आतिशबाजी में शामिल होना, यह सब मिलकर स्थानीय लोगों के लिए साल के सबसे बड़े धार्मिक आयोजनों में से एक बन जाता है।

पीढ़ियों से बंधी आस्था

59 साल के श्रद्धालु अनिल इस मेले से बचपन से जुड़े हुए हैं। उनका कहना है कि यह उनके लिए सिर्फ मेला नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही आस्था है। अनिल की तरह कई परिवार हर साल सिर्फ इसी मेले के इंतजार में रहते हैं, और यही वजह है कि सौ साल से ज्यादा पुरानी यह परंपरा अंबाला छावनी में आज भी उतनी ही श्रद्धा के साथ निभाई जा रही है।

सवाल-जवाब

फूल डोल मेला क्या है?
यह अंबाला छावनी में जन्माष्टमी के दूसरे दिन आयोजित होने वाला मेला है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण की पालकी की शोभायात्रा निकाली जाती है।
यह परंपरा कितनी पुरानी है?
यह परंपरा करीब 104 साल पुरानी है, जबकि मंदिर खुद 150 साल से भी ज्यादा पुराना है।
मेला कहां आयोजित होता है?
यह अंबाला छावनी की अनाज मंडी स्थित श्री सत्संग सभा शिवाला रजि. शिव मंदिर में आयोजित होता है।
शोभायात्रा में कितनी पालकियां शामिल होती हैं?
इस बार दो पालकियां शामिल हुईं, एक श्री कैलाश मंदिर हाथी खाना से और दूसरी अनाज मंडी मंदिर से।
शोभायात्रा कहां तक जाती है?
यह सुभाष पार्क के सामने स्थित बीपीएस प्लेनेटोरियम तक जाती है और फिर वापस अनाज मंडी मंदिर लौटती है।
इस मेले में कौन शामिल होता है?
हरियाणा और पंजाब के अलग-अलग जिलों से श्रद्धालु इस मेले में शामिल होने पहुंचते हैं।
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टिप्पणियाँ 2

Karan Malhotra@karan-malhotra·8 मिनट पहले

अंबाला छावनी की यह 104 साल पुरानी फूल डोल यात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि क्षेत्र की कानून-व्यवस्था और सार्वजनिक सुरक्षा प्रबंधन की दृष्टि से भी एक बड़ा प्रशासनिक इम्तिहान है। हरियाणा और पंजाब दोनों राज्यों से भारी संख्या में श्रद्धालुओं के जुटने और बाजारों से मुख्य शोभायात्रा के गुजरने के कारण स्थानीय पुलिस को रूट डायवर्जन, आतिशबाजी के दौरान सुरक्षा और भीड़ नियंत्रण के कड़े इंतजाम करने पड़ते हैं, ताकि सांप्रदायिक सौहार्द और शांति व्यवस्था बनी रहे।

Rohan Verma@rohan-verma·7 मिनट पहले

अंबाला छावनी के इस ऐतिहासिक आयोजन में हरियाणा और पंजाब से आने वाली भारी भीड़ को संभालना जिला प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती रहता है। खासकर संकरे बाजारों से गुजरने वाले इस रूट पर आतिशबाजी और जुलूस के दौरान सुरक्षा के कड़े इंतज़ाम करना बेहद ज़रूरी है, ताकि कानून-व्यवस्था और आपसी सौहार्द पर कोई आंच न आए।

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