हरियाणा के अंबाला में एक अत्यंत अनूठा और भव्य जैन मंदिर आकार ले रहा है, जिसकी निर्माण शैली इसे देश के अन्य धार्मिक स्थलों से पूरी तरह अलग बनाती है। करीब ढाई एकड़ जमीन पर फैला यह परिसर आधुनिक तकनीक और कंक्रीट के दौर से पूरी तरह दूर है। इस पूरे निर्माण कार्य की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें कतई लोहे और सरिये का उपयोग नहीं किया जा रहा है, जिससे इसकी मजबूती और प्राचीन शैली अपने आप में खास बन जाती है।
प्राचीन डाट तकनीक और मकराना संगमरमर का उपयोग
इस पूरे धार्मिक स्थल का ढांचा विशुद्ध रूप से राजस्थान के मकराना से मंगाए गए बेहतरीन संगमरमर के पत्थरों से तैयार किया जा रहा है। आधुनिक युग में जहां हर बड़ी इमारत और मंदिर में कंक्रीट और सरिये के लिंटर का सहारा लिया जाता है, वहीं यहां प्राचीन भारतीय डाट तकनीक का प्रयोग हो रहा है। इस पारंपरिक पद्धति में पत्थरों को एक-दूसरे के साथ विशेष तरीके से फिट किया जाता है ताकि इमारत सदियों तक सुरक्षित और मजबूत बनी रहे। इस अनूठी शिल्पकला के कारण ही इसके निर्माण कार्य में अधिक समय लग रहा है, क्योंकि हर एक पत्थर को करीने से तराशकर जोड़ा जा रहा है।
दूरदर्शिता और वैचारिक पृष्ठभूमि
इस परियोजना की परिकल्पना जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ की कुबेर द्वारा रचित विनीता नगरी की तर्ज पर की गई है। इस विशाल प्रकल्प की नींव जैन मुनि विजय रत्नाकर सूरीश्वर के मार्गदर्शन और उनके द्वारा तैयार किए गए पारंपरिक प्रारूप के आधार पर रखी गई थी। वर्तमान समय में आचार्य श्रीमद् विजय धर्मधुरंधर सूरीश्वर जी महाराज की कड़ी निगरानी में इसका निर्माण कार्य अत्यधिक तीव्र गति से आगे बढ़ रहा है, ताकि आने वाली पीढ़ियों के लिए भारतीय वास्तुकला का एक जीवंत उदाहरण प्रस्तुत किया जा सके।
विस्तृत वास्तुकला और परिसर की रूपरेखा
मंदिर कमेटी के सदस्य अतुल जैन ने बताया कि इस पवित्र स्थल को केवल एक पूजा घर के रूप में नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक महान धार्मिक और वास्तुकला की धरोहर के रूप में विकसित किया जा रहा है। मुख्य जिनालय का क्षेत्रफल लगभग 500 गज के दायरे में फैला होगा। पूरे विशाल परिसर के भीतर कुल 36 सुंदर गुंबदों का निर्माण किया जा रहा है, जिनके ठीक नीचे जैन परंपरा के 108 आचार्य भगवंतों की मूर्तियों और स्वरूपों की स्थापना की जाएगी।
पत्थरों पर उकेरी गई धार्मिक गाथाएं
इस भव्य इमारत की बाहरी दीवारों पर लगभग 6-6 इंच गहरी नक्काशी का काम किया जा रहा है, जो पर्यटकों और श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करेगा। यहां आने वाले लोगों को केवल संगमरमर की शानदार इमारत ही नहीं दिखेगी, बल्कि पत्थरों पर उकेरी गई अत्यंत सूक्ष्म और बारीक शिल्पकला के दर्शन भी होंगे। मंदिर परिसर के भीतर यात्रियों के लिए आश्रम, भोजनशाला और अन्य आवश्यक सुविधाओं का भी पूरा प्रबंध किया जाएगा ताकि दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की असुविधा न हो।
परिसर की दीवारों और हिस्सों पर जैन धर्म के प्रमुख तीर्थ स्थलों और ऐतिहासिक धार्मिक प्रसंगों की कथाओं को पत्थरों पर जीवंत रूप से उकेरा जा रहा है। शंखेश्वर तीर्थ से जुड़े प्रसंग में भगवान श्रीकृष्ण, बलराम, भगवान नेमिनाथ और धरणेंद्र-पद्मावती की कथाओं को दर्शाया जाएगा। इसके अलावा, जीरावला तीर्थ से जुड़ी आचार्य और सेठ की स्वप्न कथा तथा पहाड़ से प्रतिमा मिलने के प्रसंग को भी शिल्प के जरिए खूबसूरती से प्रदर्शित किया जाएगा।
इसी तरह, स्तंभनतीर्थ की नीलमणि प्रतिमा, नागकुमारों की भक्ति और समुद्र से प्रतिमा के प्रकट होने की घटनाओं को उकेरा जाएगा। नवखंडा पार्श्वनाथ के इतिहास को दर्शाते हुए उनकी प्रतिमा के नौ टुकड़े होने और फिर चमत्कारिक रूप से सुरक्षित जुड़ने के प्रसंग को शिल्प कला में जगह दी गई है। सम्मेदशिखर से जुड़े प्रसंग में भगवान पार्श्वनाथ के निर्वाण और आचार्यों के आकाश मार्ग से आगमन का सुंदर चित्रण किया जाएगा। अंतरिक्ष तीर्थ से जुड़ी कथा भी यहां देखने को मिलेगी, जिसमें रावण के आदेश पर रेत से बनी प्रतिमा और उसके बाद उसके वज्रमय होने का विवरण शामिल है। भवन के बाहरी हिस्से को राजा-महारानी की शाही शोभायात्राओं के दृश्यों से सजाया जाएगा, जबकि पिछली दीवार पर कलिकुंड पार्श्वनाथ का एक विशेष और भव्य शिल्प तैयार किया जा रहा है। वर्ष 2011 से निरंतर चल रहा यह निर्माण कार्य भारतीय वास्तुकला की अमिट छाप छोड़ने के लिए तैयार हो रहा है।



















