फरीदाबाद के खेतों में अन्नदाता दिन-रात मेहनत करके फसल तैयार करते हैं, लेकिन उनकी उस कड़ी मेहनत का सही मूल्य उन्हें नहीं मिल पाता है। फरीदाबाद के डीग गांव की रहने वाली 62 वर्षीय महिला किसान राजेश की व्यथा कुछ ऐसी ही है जिन्होंने एक एकड़ जमीन पट्टे पर लेकर भिंडी, तोरी, घीया और मिर्च की फसल उगाई थी। मानसून के इस मौसम में हरी सब्जियों की मांग बढ़ने और बेहतर कमाई होने की पूरी उम्मीद थी, लेकिन हकीकत इसके बिल्कुल विपरीत साबित हुई।
बाजार में इस समय हरी सब्जियों के दाम आसमान छू रहे हैं और आम आदमी की जेब पर भारी पड़ रहे हैं, जबकि खेतों से वही उपज पानी के भाव बिक रही है। खुदरा बाजार में भिंडी जहां पचास से साठ रुपये प्रति किलो तक बिक रही है, वहीं राजेश के खेतों से यही भिंडी महज एक रुपये प्रति किलो के भाव से उठाई जा रही है। इसी तरह बाजार में घीया बीस से तीस रुपये किलो के भाव पर बिक रही है, लेकिन किसान को इसका मेहनताना सिर्फ एक से दो रुपये प्रति किलो ही मिल रहा है।
राजेश ने अपनी इस बदहाली के बारे में खुलकर बात करते हुए बताया कि उन्होंने डीग गांव में एक एकड़ जमीन किराए पर लेकर उस पर सब्जियों की खेती की है। इस खेत में बड़े परिश्रम से भिंडी, तोरी, घीया और मिर्च उगाई गई थी ताकि अच्छी फसल होने पर परिवार के लिए कुछ मुनाफा कमाया जा सके। लेकिन पिछले लगभग एक महीने से सब्जियों के दाम इतने ज्यादा गिर चुके हैं कि फसल की उत्पादन लागत तक वसूल नहीं हो पा रही है।
राजेश ने आगे बताया कि वह बासठ वर्ष की आयु में भी पूरे दिन खेतों में पसीना बहाती हैं और सुबह से लेकर शाम तक अपनी फसल की खुद देखभाल करती हैं। खेत से भिंडी तुड़वाने के लिए मजदूरों को लगाना पड़ता है जिस पर रोजाना करीब छह सौ रुपये का खर्च आता है। इसके बावजूद जब बाजार में भिंडी का दाम केवल एक रुपये किलो मिलता है तो मुनाफे का तो सवाल ही पैदा नहीं होता, बल्कि भारी नुकसान उठाना पड़ता है। राजेश का कहना है कि उनके खेत से भिंडी एक रुपये किलो में निकलती है, जबकि मंडी में आम उपभोक्ता जब इसे खरीदने जाता है तो उसे चालीस रुपये या उससे भी अधिक कीमत चुकानी पड़ती है। कई जगहों पर भिंडी पचास से साठ रुपये प्रति किलो के हिसाब से बेची जा रही है, जिससे यह समझ पाना मुश्किल हो जाता है कि बाजार में इतनी महंगी बिकने वाली सब्जी आखिर किसानों से इतनी सस्ती क्यों खरीदी जा रही है।
खेती की लागत निकाल पाना भी हुआ मुश्किल
राजेश ने जानकारी दी कि वह घीया की खेती भी करती हैं और उनके खेतों से घीया एक से दो रुपये प्रति किलो के भाव पर जा रही है, जबकि खुले बाजार में यही घीया बीस से तीस रुपये किलो तक बिकती है। इसके अलावा मिर्च का भी उन्हें केवल दस से बारह रुपये किलो का ही भाव नसीब हो रहा है। खेतों में फसल तैयार करने के दौरान खाद, कीटनाशक दवाइयों, मजदूरी और खुद की मेहनत पर काफी खर्च आता है, लेकिन जब फसल को बेचने का समय आता है तो लागत की भरपाई तक नहीं हो पाती है।
राजेश बताती हैं कि उगाई गई सब्जियों को मंडी तक पहुंचाने के लिए टेंपो का लगभग ढाई सौ रुपये किराया देना पड़ जाता है। जब खेत से ही फसल का भाव इतना कम मिलेगा तो ऐसी स्थिति में मंडी तक ढुलाई का किराया निकालना भी असंभव हो जाता है। कई बार ऐसी निराशाजनक स्थिति बन जाती है कि फसल को मंडी ले जाने की बजाय खेत में ही छोड़ देना या फिर ट्रैक्टर से जोत देना बेहतर लगता है। राजेश ने बताया कि वह पट्टे पर जमीन लेकर खेती कर रही हैं जिसके एवज में उन्हें करीब सैंतीस हजार रुपये सालाना पट्टे की रकम चुकानी है। वर्तमान हालात ऐसे बन चुके हैं कि खेती से पट्टे की पूरी राशि निकाल पाना भी बहुत कठिन हो गया है, जबकि खाद, दवाई, मजदूरी और ढुलाई का खर्च बिल्कुल अलग है। इन तमाम खर्चों के बाद भी सब्जियों का उचित मूल्य नहीं मिल रहा है।
किसान और ग्राहक के बीच मुनाफे का भारी अंतर
राजेश का कहना है कि उनका पूरा परिवार अपने गुजारे के लिए पूरी तरह से खेती पर ही निर्भर है और यही उनकी आमदनी का एकमात्र जरिया है। लेकिन जब फसल का सही दाम नहीं मिल पाता है तो पूरा परिवार गहरे संकट और परेशानी में घिर जाता है। वह पूरे दिन खेत में कड़ी धूप और मेहनत करती हैं ताकि फसल बिकने पर घर का खर्चा चल सके, लेकिन सब्जियों के इन बेहद कम दामों ने उनकी सारी उम्मीदों पर पानी फेर दिया है।
उन्होंने दुख जताते हुए कहा कि उन्हें इस बात का सबसे ज्यादा अफसोस होता है कि एक तरफ देश का आम नागरिक महंगी सब्जियां खरीदने के लिए विवश है और दूसरी तरफ किसान अपनी खून-पसीने से उगाई गई फसल को औने-पौने दामों में बेचने को मजबूर है। आखिर किसान और अंतिम ग्राहक के बीच कीमतों का यह इतना बड़ा अंतर क्यों है। यदि बाजार में भिंडी पचास से साठ रुपये किलो बिक रही है तो उसका उत्पादन करने वाले किसान को सिर्फ एक रुपये प्रति किलो का भाव क्यों मिल रहा है, यही एक बड़ा सवाल आज उनके सामने मुंह बाए खड़ा है।
राजेश ने मांग की है कि किसानों को उनकी मेहनत और उत्पादन लागत के आधार पर उचित मूल्य मिलना चाहिए क्योंकि खेती करना कोई आसान काम नहीं है। चिलचिलाती धूप, बरसात और मौसम की तमाम मार झेलने के बाद एक फसल तैयार होती है और यदि उसके बाद भी सही दाम न मिले तो खेती करना पूरी तरह से घाटे का सौदा बन जाता है। खेत से लेकर बाजार तक पहुंचने वाली सब्जियों के दामों में यह भारी अंतर सीधे तौर पर किसान की आर्थिक स्थिति को कमजोर कर रहा है।





















