फरीदाबाद में चिकित्सा जगत का एक बेहद प्रेरणादायक और दुर्लभ मामला सामने आया है, जहां गर्भकाल के केवल 26वें हफ्ते में जन्मे और जन्म के वक्त मात्र 530 ग्राम वजन वाले एक नवजात शिशु ने जिंदगी की कठिन जंग जीत ली है। गंभीर स्वास्थ्य जटिलताओं और बेहद नाजुक शारीरिक स्थिति के बीच शिशु को लगभग 3 महीने तक नियोनेटल आईसीयू (एनआईसीयू) में गहन चिकित्सा निगरानी में रखा गया। डॉक्टरों की निरंतर देखरेख, आधुनिक उपचार और परिवार के धैर्य की बदौलत अब शिशु का वजन बढ़कर 1 किलो 700 ग्राम हो गया है। स्वस्थ हो चुका यह बच्चा अब सीधे अपनी मां का दूध पी रहा है और उसे अस्पताल से छुट्टी देकर घर भेज दिया गया है। विशेष बात यह भी है कि इस परिवार में शादी के करीब 17 साल के लंबे इंतजार के बाद इस बच्चे की किलकारी गूंजी थी।
गर्भावस्था के दौरान सामने आई थीं अत्यधिक गंभीर जटिलताएं
शिशु की मां की गर्भावस्था शुरुआत से ही अत्यंत जोखिम भरी रही थी। फरीदाबाद स्थित अमृता हॉस्पिटल के नियोनेटोलॉजिस्ट डॉ. हेमंत ने इस केस की विस्तृत जानकारी साझा करते हुए बताया कि गर्भवती मां गंभीर प्री-एक्लेम्पसिया की समस्या से जूझ रही थीं। इस स्थिति में गर्भवती महिला का रक्तचाप खतरनाक स्तर तक बढ़ जाता है। चिकित्सीय परीक्षण के दौरान जब गर्भनाल की धमनी का डॉप्लर टेस्ट किया गया, तो उसमें रक्त का सामान्य प्रवाह उल्टा पाया गया। इस गंभीर रुकावट के कारण गर्भ के भीतर पल रहे भ्रूण का विकास सामान्य गति की तुलना में बेहद धीमा पड़ गया था। इन्हीं गंभीर और जानलेवा परिस्थितियों को देखते हुए गर्भकाल के 26वें सप्ताह में ही प्रसव कराना पड़ा, जिसके तुरंत बाद नवजात को आपातकालीन गहन देखभाल इकाई में स्थानांतरित किया गया।
आंतों में सूजन और शॉक की स्थिति ने बढ़ाई चुनौती
डॉ. हेमंत के अनुसार, नवजात आईयूजीआर यानी इंट्रा-यूटेराइन ग्रोथ रेस्ट्रिक्शन से पीड़ित था, जिसका अर्थ है कि वह गर्भ में अपनी निर्धारित उम्र के हिसाब से अपेक्षित वजन हासिल नहीं कर सका था। जन्म लेने के फौरन बाद उसकी आंतों में अत्यधिक गंभीर सूजन विकसित हो गई, जिसे मेडिकल भाषा में नेक्रोटाइजिंग एंटेरोकोलाइटिस कहा जाता है। इस विकार के चलते बच्चे का पेट असामान्य रूप से फूलने लगा और उसका पाचन तंत्र पूरी तरह से निष्क्रिय होने की कगार पर पहुंच गया। इस शारीरिक विकार ने उसके पूरे शरीर का इलेक्ट्रोलाइट संतुलन बिगाड़ दिया, जिससे बच्चा शॉक की गंभीर स्थिति में चला गया और उसका ब्लड प्रेशर चिंताजनक रूप से नीचे गिर गया।
पोटेशियम और कैल्शियम के खतरनाक स्तर पर आपात कार्रवाई
इस संकट के दौरान बच्चे के शरीर में रासायनिक तत्वों का संतुलन बुरी तरह बिगड़ चुका था। डॉ. हेमंत ने बताया कि नवजात शिशुओं में पोटेशियम का सामान्य स्तर सामान्यतः 3.5 से 4.5 के आसपास रहता है, लेकिन इस बच्चे के शरीर में यह उछलकर 12 तक पहुंच गया था। इसी प्रकार कैल्शियम का स्तर भी सामान्य सीमाओं को पार करते हुए लगभग 21 तक पहुंच गया। इतने अधिक स्तर दिल और अन्य अंगों के लिए प्राणघातक साबित हो सकते थे। स्थिति को तत्काल नियंत्रित करने के लिए डॉक्टरों को कैल्सीटोनिन का विशेष इंजेक्शन लगाना पड़ा। इतने छोटे और अपरिपक्व नवजातों में फेफड़ों के पूर्ण विकसित न होने, हड्डियों के अत्यधिक कमजोर रहने और मस्तिष्क के विकास पर स्थायी प्रतिकूल असर पड़ने का भी बहुत बड़ा जोखिम बना रहता है।
तीन सप्ताह तक दूध बंद कर नसों के रास्ते दिया गया पोषण
आंतों की नाजुक स्थिति को ध्यान में रखते हुए डॉक्टरों ने कड़ा चिकित्सीय फैसला लिया और करीब तीन हफ्तों तक बच्चे को मुंह या नली से दूध देना पूरी तरह बंद रखा। डॉ. हेमंत ने स्पष्ट किया कि यदि उस संवेदनशील स्थिति में बच्चे को फीड दी जाती, तो उसकी आंतें फट सकती थीं या उन्हें अपूरणीय क्षति पहुंच सकती थी, जिससे आपातकालीन सर्जरी अनिवार्य हो जाती। बच्चे को पित्त जैसा हरा पदार्थ बाहर फेंकने, पेट फूलने और आंतरिक रासायनिक असंतुलन की भारी समस्याएं थीं। दूध बंद रहने की पूरी अवधि में बच्चे को नसों के जरिए पैरेंट्रल न्यूट्रिशन दिया गया। पीआईसीसी लाइन की सहायता से उसके शरीर में प्रोटीन, वसा, ग्लूकोज, सोडियम, कैल्शियम तथा अन्य सभी अनिवार्य पोषक तत्व सीधे पहुंचाए गए।
डॉक्टरों की टीम का मुख्य ध्येय केवल शिशु की सांसें बचाए रखना नहीं था, बल्कि उसकी शारीरिक वृद्धि, हड्डियों की मजबूती और मस्तिष्क के समुचित विकास को सुनिश्चित करना भी था। लगभग तीन हफ्तों के सघन इलाज के बाद जब आंतों की सूजन घटी और स्थिति स्थिर हुई, तब बेहद धीमी गति से मां का दूध दोबारा शुरू किया गया। शुरुआत में फीड की मात्रा बूंद-बूंद करके बढ़ाई गई। जब शिशु का वजन बढ़कर लगभग डेढ़ किलोग्राम हो गया और उसका विकास गर्भकाल के 34 से 35 सप्ताह के बराबर पहुंचा, तब उसने अपनी मां से सीधे स्तनपान करना शुरू किया। इस पूरे सफर के दौरान बच्चे की मां लगातार अस्पताल में मौजूद रहीं और संक्रमण से बचाव के तमाम कड़े नियमों का कड़ाई से पालन किया गया।
डिस्चार्ज से पहले की सभी न्यूरोलॉजिकल और शारीरिक जांचें सामान्य
अस्पताल से छुट्टी मिलने के समय बच्चे को किसी भी प्रकार की बाहरी ऑक्सीजन सहायता की आवश्यकता नहीं रही। डॉक्टरों द्वारा किए गए ब्रेन स्कैन पूरी तरह सामान्य आए और इकोकार्डियोग्राफी (इको) जांच में उसके दिल की कार्यप्रणाली भी दुरुस्त पाई गई। मेटाबॉलिक परीक्षणों में कैल्शियम, फॉस्फोरस और अल्कलाइन फॉस्फेटेज का स्तर पूरी तरह संतुलित निकला, जो स्वस्थ हड्डियों का प्रमाण है। इसके अलावा बच्चे का जनरल मूवमेंट असेसमेंट और हैमरस्मिथ इन्फेंट न्यूरोलॉजिकल एग्जामिनेशन (HINE) भी किया गया। इन दोनों प्रमुख जांचों में फिलहाल किसी भी तरह की न्यूरोलॉजिकल विकृति या असामान्यता के संकेत नहीं मिले हैं।
प्री-टर्म शिशुओं के शुरुआती चेतावनी संकेतों पर सतर्कता जरूरी
अत्यधिक कम वजन और समय से पहले जन्मे बच्चों के संदर्भ में डॉ. हेमंत ने बताया कि अभिभावकों को विशेष सतर्कता बरतनी चाहिए। नवजात में अचानक सांस रुकना, सांस लेने में अत्यधिक कठिनाई होना, ऑक्सीजन की आवश्यकता बढ़ जाना, पेट का अचानक फूलना, मल का न आना, मल में खून दिखाई देना या हरे रंग की उल्टी होना बेहद गंभीर लक्षण हो सकते हैं। ऐसा कोई भी संकेत नजर आते ही बिना किसी देरी के तुरंत विशेषज्ञ डॉक्टरों से संपर्क करना चाहिए।
अभिभावकों को हौसला न हारने की सलाह
डॉ. हेमंत ने कहा कि प्री-टर्म यानी समय से पहले जन्मे बच्चों को लेकर माता-पिता को कभी भी उम्मीद और हौसला नहीं छोड़ना चाहिए। सही समय पर सटीक चिकित्सा प्रबंधन और कुशल नियोनेटोलॉजिस्ट की देखरेख में 500 से 700 ग्राम वजन वाले अत्यंत नाजुक नवजात भी पूरी तरह स्वस्थ होकर सामान्य जीवन जी सकते हैं। इसके लिए हमेशा ऐसे उन्नत अस्पताल या सेंटर का चयन करना चाहिए जहां समय से पहले जन्मे और बेहद कम वजन वाले बच्चों की सघन देखभाल का व्यापक अनुभव मौजूद हो। डॉक्टर ने इस केस को अपने पूरे करियर की सबसे बड़ी और जटिल चुनौतियों में से एक करार दिया। पूरे दिल्ली एनसीआर में इस तरह का सफल मामला पहली बार सामने आया है, जिससे 17 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद माता-पिता की गोद खुशियों से भर गई है।




















