आधुनिक जीवनशैली और असंतुलित खानपान के दौर में गुर्दे से जुड़े रोगों का खतरा लगातार बढ़ता जा रहा है। दैनिक दिनचर्या की सामान्य सी लगने वाली लापरवाहियां कई बार गुर्दे को धीरे-धीरे गंभीर क्षति पहुंचा देती हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, रक्त में शर्करा की अधिकता और उच्च रक्तचाप गुर्दे की कार्यप्रणाली को सीधे तौर पर प्रभावित करने वाले सबसे प्रमुख कारकों में शामिल हैं। जब शरीर में लंबे समय तक ब्लड शुगर का स्तर बढ़ा रहता है, तो यह गुर्दे की सूक्ष्म रक्त वाहिकाओं को क्षतिग्रस्त कर देता है। ठीक इसी प्रकार अनियंत्रित हाई बीपी भी गुर्दे की नाजुक संरचना पर गहरा दबाव डालकर उसे बीमार बना देता है।
प्राकृतिक वेग रोकना और संक्रमण की अनदेखी पड़ सकती है भारी
अंबाला छावनी नागरिक अस्पताल में सेवारत आयुर्वेदिक चिकित्सक डॉ. जितेंद्र वर्मा के अनुसार, गुर्दे की बीमारियों के पनपने के पीछे कई शारीरिक और व्यावहारिक कारण जिम्मेदार होते हैं। उन्होंने विशेष रूप से उन व्यक्तियों को सतर्क किया है जो कामकाज के दबाव, यात्रा अथवा किसी अन्य मजबूरी के चलते लंबे समय तक पेशाब रोककर रखते हैं। आयुर्वेद के बुनियादी सिद्धांतों का हवाला देते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि शरीर के स्वाभाविक वेगों को कभी भी जबरन नहीं रोकना चाहिए, क्योंकि यह आदत सीधे मूत्र तंत्र पर विपरीत प्रभाव डालती है।
इसके साथ ही मूत्र मार्ग से जुड़ी किसी भी प्रकार की परेशानी अथवा संक्रमण को अनदेखा करना बहुत जोखिम भरा साबित हो सकता है। यदि यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन यानी यूटीआई की समय पर पहचान कर उसका समुचित उपचार न कराया जाए, तो यह संक्रमण ऊपर की ओर फैलकर गुर्दे तक पहुंच सकता है। जब यह संक्रमण गुर्दे के ऊतकों को अपनी चपेट में ले लेता है, तो इससे गुर्दे को स्थायी नुकसान पहुंचने की आशंका काफी बढ़ जाती है।
दीर्घकालिक बीमारियों का नियंत्रण और पानी के सेवन में संतुलन
चिकित्सक ने रेखांकित किया कि डायबिटीज और उच्च रक्तचाप दोनों ही गुर्दे की सेहत के लिए अत्यंत गंभीर खतरे पैदा करते हैं। आधुनिक एलोपैथिक चिकित्सा विज्ञान में भी इन दोनों स्वास्थ्य समस्याओं को क्रॉनिक किडनी डिजीज के मूल कारणों के रूप में चिह्नित किया गया है। इसलिए गुर्दे को सुरक्षित रखने की पहली शर्त यही है कि रक्तचाप और शुगर के स्तर को पूरी तरह नियंत्रित रखा जाए।
वहीं तरल पदार्थों और पानी के सेवन को लेकर भी उन्होंने विवेकपूर्ण दृष्टिकोण अपनाने पर बल दिया है। हालांकि गुर्दे में पथरी की समस्या से बचाव के लिए पर्याप्त मात्रा में पानी पीना आवश्यक माना जाता है, परंतु पानी की सही आवश्यकता हर व्यक्ति की शारीरिक स्थिति, मौसम और उसकी दैनिक गतिविधियों पर निर्भर करती है। डॉ. वर्मा ने स्पष्ट किया कि गुर्दे की विफलता या अन्य गंभीर अवस्थाओं में चिकित्सकों द्वारा तरल पदार्थों के सेवन पर सख्त पाबंदियां लगाई जाती हैं। ऐसी स्थिति में गुर्दे के मरीजों को मनमाने ढंग से पानी पीने के बजाय अपने विशेषज्ञ चिकित्सक के निर्देशानुसार ही दैनिक मात्रा तय करनी चाहिए।
खानपान की बंदिशें और औषधीय जड़ी-बूटियों का प्रयोग
गुर्दे की सेहत में भोजन की भूमिका पर चर्चा करते हुए डॉ. जितेंद्र वर्मा ने बताया कि आहार योजना प्रत्येक मरीज की व्यक्तिगत स्थिति के अनुसार तय होती है। उन्होंने कहा कि बीमारी का कौन सा चरण है और मरीज के शरीर में पोटैशियम, फॉस्फोरस, सोडियम तथा प्रोटीन का स्तर क्या है, इसी आधार पर खानपान में फेरबदल किया जाता है। गंभीर गुर्दे की समस्या का सामना कर रहे मरीजों को खीरा, टमाटर, दही, चावल और दाल जैसी चीजों का सेवन रोक देना चाहिए और इस विषय में योग्य चिकित्सक से व्यक्तिगत परामर्श लेना चाहिए।
आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धतियों की चर्चा करते हुए उन्होंने बताया कि मूत्र तथा गुर्दे से जुड़े विकारों के निवारण हेतु गोक्षुर, पुनर्नवा, वरुण और गिलोय जैसी पारंपरिक औषधियों का प्राचीन ग्रंथों में विस्तृत उल्लेख मिलता है। इसके साथ ही उन्होंने पत्थरचट्टा के संदर्भ में भी बात की। हालांकि उन्होंने मरीजों को सख्त ताकीद की कि वे बिना डॉक्टरी सलाह के किसी भी प्रकार की जड़ी-बूटी या घरेलू दवा का सेवन कतई शुरू न करें। जब गुर्दे की कार्यक्षमता पहले से ही घटी हुई होती है, तब विभिन्न दवाओं और सप्लीमेंट्स का शरीर पर अप्रत्याशित और विपरीत असर हो सकता है।
प्रारंभिक जांच और समय पर सावधानी
गुर्दे के रोगों की सबसे जटिल बात यह है कि शुरुआती चरणों में इनके कोई स्पष्ट या प्रत्यक्ष लक्षण अक्सर सामने नहीं आते। बीमारी भीतर ही भीतर बढ़ती रहती है और जब तक मरीज को अहसास होता है, तब तक काफी क्षति हो चुकी होती है। ऐसे में डायबिटीज, उच्च रक्तचाप अथवा जिनके परिवार में पहले से गुर्दे की बीमारी का इतिहास रहा हो, उन सभी व्यक्तियों को समय-समय पर अपनी स्वास्थ्य जांच कराते रहना चाहिए। नियमित परामर्श, रक्त एवं यूरिन टेस्ट और अनुकूल खानपान अपनाकर गुर्दे को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है।



















