हरियाणा के पलवल जिले में स्थित जनौली गांव के पास रेलवे ओवरब्रिज का निर्माण कार्य रुक जाने से आसपास के दर्जनों गांवों की रोजमर्रा की जिंदगी पटरी से उतर चुकी है। इस मार्ग से हर दिन 50 से अधिक गांवों के बाशिंदे आवाजाही करते हैं, जो न केवल पड़ोसी जिलों को जोड़ता है बल्कि जेवर हवाई अड्डे की तरफ जाने वाले यात्रियों को भी सीधी कनेक्टिविटी देता है। वर्तमान में काम पूरी तरह रुक जाने और मुख्य क्रॉसिंग के बंद हो जाने से स्थानीय कामगार, कारखानों के कर्मचारी और किसान गंभीर संकट से जूझ रहे हैं। स्थिति इतनी विकट हो गई है कि औद्योगिक इकाइयों में जाने वाले अनेक कर्मचारियों को अपनी मोटरसाइकिलें फाटक के बाहर ही खड़ी करके आगे का सफर पैदल तय करना पड़ रहा है। स्थानीय आबादी लंबे समय से मांग कर रही है कि जब तक पुल तैयार नहीं होता, तब तक वाहनों और पैदल चलने वालों के लिए कोई वैकल्पिक रास्ता उपलब्ध कराया जाए।
रोजाना 50 हजार यात्रियों की आवाजाही और भारी अतिरिक्त चक्कर
इस मार्ग के महत्व को रेखांकित करते हुए स्थानीय निवासी बबलू हुड्डा ने बताया कि यह सड़क करीब 25 से 30 गांवों के बीच जीवन रेखा का काम करती है। जब कभी अलीगढ़ राजमार्ग पर वाहनों का भीषण जाम लगता है, तब भारी संख्या में मुसाफिर बाईपास के तौर पर इसी रास्ते का सहारा लेते हैं। सामान्य दिनों में इस सड़क से प्रतिदिन लगभग 50 हजार लोगों का आना-जाना होता है। अब इस अहम रास्ते के बंद होने की वजह से फरीदाबाद, पलवल अथवा पास के औद्योगिक क्षेत्रों की फैक्ट्रियों में ड्यूटी पर जाने वाले लोगों को हर दिन 15 से 20 किलोमीटर की अतिरिक्त दूरी नापनी पड़ रही है। सड़क के दोनों किनारों पर उपजाऊ खेत फैले हैं, जिससे कृषि कार्य में जुटे किसानों के लिए भी खाद, बीज और उपकरण ले जाना दूभर हो गया है। निर्माण स्थल पर रेलवे द्वारा गहरे गड्ढे खोद दिए गए हैं और भारी बैरिकेड लगा दिए गए हैं। क्षेत्रवासियों ने जिला उपायुक्त और संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों के समक्ष बार-बार शिकायतें दर्ज कराईं, लेकिन अब तक कोई ठोस समाधान नहीं निकला है।
किसानों और मजदूरों के सामने आजीविका का बड़ा संकट
क्षेत्रीय परिस्थितियों पर चर्चा करते हुए स्थानीय नागरिक रविंद्र सिंह ने साझा किया कि इस रुकावट की सबसे कठोर मार दिहाड़ी मजदूरों और धरतीपुत्र किसानों पर पड़ी है। लगभग दो से तीन महीने पहले इस क्रॉसिंग को पूरी तरह से सील कर दिया गया, जिसके बाद से यहां से मोटरसाइकिल या साइकिल निकालना भी पूरी तरह असंभव हो गया है। अपने खेतों की देखभाल करने और फसल की कटाई-बुआई के लिए अन्नदाताओं को लगभग 20 किलोमीटर का लंबा फेरा लगाना पड़ रहा है। वहीं औद्योगिक इकाइयों में पसीना बहाने वाले मजदूरों को 10 से 15 किलोमीटर का फालतू सफर रोजाना करना पड़ रहा है। समय पर ड्यूटी पहुंचने के लिए लोग अपनी गाड़ियां रेलवे लाइन के पास लावारिस छोड़कर पटरियों के बीच से पैदल जाने का जोखिम उठा रहे हैं। ग्रामीण लगातार इस बात पर बल दे रहे हैं कि निर्माण में अगर तकनीकी या प्रशासनिक कारणों से विलंब हो रहा है, तो कम से कम ट्रैक्टर-ट्रॉली, दोपहिया वाहनों और पैदल यात्रियों के लिए एक सुरक्षित बाईपास मार्ग तुरंत तैयार किया जाए। रास्ते की अनुपलब्धता से विशेष रूप से महिलाओं की आवाजाही भी बुरी तरह प्रभावित हुई है।
2026 की निर्धारित समयसीमा और मौके पर पूरी तरह ठप पड़ा काम
जनौली निवासी प्रवीण ने अपनी रोजमर्रा की परेशानी साझा करते हुए बताया कि वह हर सुबह अपनी बाइक रेलवे बैरियर के पास छोड़ते हैं और पैदल ही आगे का सफर तय करते हैं। इस फ्लाईओवर परियोजना की नींव साल 2023 के अंतिम महीनों में रखी गई थी और अब दो साल से अधिक का समय बीत चुका है। परियोजना को पूरा करने के लिए आधिकारिक तौर पर 2026 की समयसीमा तय की गई थी, परंतु धरातल पर अभी भारी निर्माण कार्य शेष है और वर्तमान में मौके पर एक भी मजदूर या मशीन सक्रिय नहीं है। रेलवे प्रशासन के अधिकारियों से सीधे संपर्क करने के बावजूद आम जनता को कोई राहत मार्ग नहीं दिया गया। इसी गांव के निवासी अजीत ने चिंता जाहिर करते हुए कहा कि कार्य की जो धीमी गति रही है, उससे तय समयसीमा में ओवरब्रिज बनना असंभव सा दिखता है और अभी तो काम पूरी तरह बंद पड़ा है। आम लोगों की बस इतनी दरख्वास्त है कि कम से कम दोपहिया गाड़ियां निकालने लायक कोई कच्चा या पक्का संपर्क मार्ग बना दिया जाए।
फाटक नंबर 568 पर फंसा खेती-किसानी का काम
कृषि गतिविधियों पर पड़े नकारात्मक प्रभाव का विवरण देते हुए किसान विजेंद्र सिंह ने बताया कि रेलवे लाइन के पार उनकी खुद की तथा करीब 50 अन्य किसानों की खेती की जमीन स्थित है। यह पूरा निर्माण रेलवे फाटक नंबर 568 पर किया जा रहा है। काम शुरू हुए लगभग तीन साल का लंबा वक्त बीतने को आया है, लेकिन ढांचा अधूरा पड़ा है। कड़े बैरिकेड्स खड़े कर दिए जाने से पैदल चलने वालों की पगडंडी भी छिन गई है। किसानों को अपनी फसलों तक पहुंचने के लिए लगभग 15 किलोमीटर का चक्कर लगाना पड़ता है, जिससे रोज का डीजल फूंका जा रहा है, अतिरिक्त मजदूरी लग रही है और कीमती समय नष्ट हो रहा है। इसके साथ ही करीब 50 नजदीकी गांवों से औद्योगिक क्षेत्रों में काम करने आने वाले युवा इसी रास्ते पर निर्भर हैं। स्थानीय निवासियों का स्पष्ट कहना है कि प्रशासन और चुने हुए जन प्रतिनिधियों से अनगिनत बार गुहार लगाने के बाद भी किसी के कान पर जूं नहीं रेंग रही है।


















