गुरुग्राम में हाल ही में सामने आए हिट एंड रन मामले ने पूरे देश में सनसनी फैला दी है। इस घटना से जुड़े तमाम फोटो और वीडियो सोशल मीडिया पर व्यापक रूप से वायरल हो चुके हैं, जिनमें साफ देखा जा सकता है कि कैसे सड़क पर पुरुषों से आगे बढ़ रही एक महिला बाइक सवार कार में सवार युवकों को रास नहीं आई। शराब के नशे से भी अधिक खतरनाक पुरुषवादी अहंकार में डूबे कार चालक कल्याण बैंसला ने अपने सपनों को साकार करती बाइक सवार सिया उर्फ शिवानी चौहान को बेहद खतरनाक तरीके से टक्कर मार दी। इस भीषण टक्कर के बाद वह युवती सड़क पर गिरकर काफी दूर तक घिसटती चली गई, लेकिन गनीमत रही कि वह फिर से अपने पैरों पर खड़ी होने में कामयाब रही। इसके बाद पुलिस ने अपनी कार्रवाई शुरू की और कानून अपना काम करने में जुट गया, क्योंकि देश में संविधान और नियम कायदों का राज है। लेकिन जिस समाज की फिक्र करते हुए एक लड़की के माता-पिता अपनी पूरी जिंदगी बिता देते हैं, वही समाज अब इस गंभीर अपराध के बाद न्याय के बजाय जाति के नाम पर पंचायतें जुटा रहा है।
अपराधी को बचाने के लिए बुलाई जा रही महापंचायत
इस पूरे प्रकरण के मुख्य आरोपी, अहंकार से भरे और समाज के नाम पर कलंक माने जाने वाले कल्याण बैंसला को कानूनी शिकंजे से बचाने के लिए अब पलवल में एक महापंचायत का आयोजन किया जा रहा है। इस पंचायत के जरिए लोगों से बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने की पुरजोर अपील की जा रही है, ताकि आरोपी युवक को उसके सजातीय होने के नाते समर्थन जुटाया जा सके। इस तरह के आयोजनों का मुख्य उद्देश्य भीड़ के दबाव का इस्तेमाल कर एक संगीन जुर्म के आरोपी को सही साबित करना और कानून की आंखों में धूल झोंकना है। यह स्थिति बेहद चिंताजनक है कि एक इंसान खुलेआम महिला को जान से मारने की नीयत से टक्कर मारे और समाज का एक वर्ग उसे बचाने के लिए एकजुट हो जाए।
पुरानी और संकीर्ण मानसिकता का जारी रहना
समाज में आज भी लड़कों की हरकतों को नजरअंदाज करने वाली वह पुरानी सोच पूरी तरह हावी है जिसके तहत यह मान लिया जाता है कि लड़के हैं तो गलतियां हो जाती हैं। यह दबी-कुचली और सड़ियल मानसिकता आखिर कब तक हमारा पीछा करती रहेगी और हमारा समाज इतना लाचार व पंगु कैसे हो गया है? एक तरफ जहां कानून अपने रास्ते पर चल रहा है, वहीं समाज की यह विकलांग सोच देखकर हैरानी होती है कि लोग एक पीड़ित और एक अपराधी के बीच में भी जाति का एंगल तलाशने से बाज नहीं आ रहे हैं। वे देश की एक बेटी की जान लेने पर आमादा शख्स को सिर्फ इसलिए सुरक्षा कवच देना चाहते हैं क्योंकि वह उनकी अपनी जाति से ताल्लुक रखता है।
नैतिक मूल्यों का पतन और पुरुषवादी अहंकार
क्या हम वाकई उसी महान देश की भूमि पर निवास कर रहे हैं जहां न्याय, धर्म और अपने वचनों के पालन के लिए लोगों ने अपने सिर तक कटवा दिए थे? क्या हमारी नैतिकता, सामाजिक मान्यताएं और हमारी ऐतिहासिक तथा पौराणिक कथाएं आज की पीढ़ी की पहुंच से इतनी दूर हो चुकी हैं कि उन्हें यह भी होश नहीं है कि वे किस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि आज पुरुषवादी सोच अपनी सारी सीमाओं को पार करते हुए पशुता के स्तर तक हमारे दिमागों पर हावी हो चुकी है। आरोपी बैंसला के समर्थन में बुलाई जा रही इस महापंचायत से कानूनी प्रक्रिया पर भले ही सीधा असर पड़े या न पड़े, लेकिन इसने आम जनमानस की सोच और इंसानियत पर बहुत बड़े और गंभीर सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं। जो लोग अक्सर अपनी राजनीतिक विफलताओं और कुकर्मों के लिए नेताओं को दोष देते हैं, वे आज खुद जाति को अपने गुनाहों को छिपाने और ढोने की एक सीढ़ी के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं।





















