रोजमर्रा की जिंदगी में रात को बिस्तर पर लेटकर मोबाइल फोन चलाना अधिकांश लोगों की अनिवार्य दिनचर्या का हिस्सा बन चुका है। कोई सोशल मीडिया पर वीडियो स्क्रॉल करता है, कोई चैटिंग में व्यस्त रहता है, तो कुछ लोग समाचार या लेख पढ़ते हुए सोने की कोशिश करते हैं। कई लोगों को यह गलतफहमी होती है कि फोन देखते-देखते अपने आप नींद आ जाएगी, परंतु हकीकत इसके उलट है। स्क्रीन पर लगातार नजरें गड़ाए रखने की यह आदत शरीर के प्राकृतिक स्लीप-वेक चक्र को गंभीर रूप से बाधित कर सकती है। विशेषकर जब सोने के समय से ठीक पहले लंबे समय तक फोन का इस्तेमाल किया जाए, तब शारीरिक और मानसिक स्तर पर इसके कई प्रतिकूल परिणाम सामने आने लगते हैं।
नींद आने में विलंब और मेलाटोनिन हार्मोन पर प्रभाव
मोबाइल स्क्रीन से निकलने वाला प्रकाश, विशेष रूप से नीली रोशनी, हमारे शरीर की आंतरिक जैविक घड़ी को गहराई से प्रभावित करती है। सामान्य अवस्था में अंधेरा होने पर शरीर में मेलाटोनिन नामक आवश्यक हार्मोन का स्राव शुरू होता है, जो मस्तिष्क को यह संकेत देता है कि अब आराम करने और सोने का समय हो गया है। रात के समय तेज स्क्रीन लाइट के संपर्क में रहने से मेलाटोनिन के बनने की प्रक्रिया बाधित हो जाती है। इसके अतिरिक्त, जब कोई व्यक्ति फोन पर उत्तेजक वीडियो, सामाजिक संदेश या चैट देखता है, तो उसका मस्तिष्क पूरी तरह सक्रिय और सतर्क बना रहता है। ऐसी स्थिति में शरीर भले ही बिस्तर पर पड़ा हो, लेकिन दिमाग विश्राम की शांत अवस्था में नहीं जा पाता, जिसके कारण व्यक्ति को करवटें बदलते हुए सोने में काफी लंबा समय लग जाता है।
नींद की गुणवत्ता में गिरावट और अगले दिन की परेशानियां
देर रात तक मोबाइल का उपयोग केवल नींद आने में देरी तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह नींद की समग्र गुणवत्ता को भी गहराई से प्रभावित करता है। वर्ष 2024 में प्रकाशित एक बड़े शोध अध्ययन में युवा वयस्कों के बीच इलेक्ट्रॉनिक स्क्रीन के इस्तेमाल और नींद से जुड़े विभिन्न परिणामों के बीच सीधा संबंध दर्ज किया गया था। इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने पाया कि स्क्रीन के निरंतर उपयोग से नींद की कुल अवधि कम हो जाती है और नींद में बार-बार खलल पड़ने जैसी समस्याएं पैदा होती हैं। यदि किसी व्यक्ति की नींद देर रात स्क्रीन देखने की वजह से रोजाना अधूरी रह जाती है, तो इसका असर अगले दिन उसकी कार्यक्षमता पर साफ दिखाई देता है। ऐसे लोगों में दिनभर सुस्ती, शारीरिक थकान, चिड़चिड़ापन और किसी भी काम पर ध्यान केंद्रित करने में गंभीर कठिनाई महसूस होती है।
डिजिटल आई स्ट्रेन और आंखों में सूखापन
अंधेरे कमरे में केवल मोबाइल स्क्रीन की तेज चमक देखना आंखों के स्वास्थ्य के लिए अत्यंत हानिकारक सिद्ध होता है। इस स्थिति को डिजिटल आई स्ट्रेन कहा जाता है, जिसमें आंखों में भारी थकान, सूखापन, चुभन और जलन महसूस होने लगती है। जब कोई व्यक्ति अंधेरे में लंबे समय तक छोटी स्क्रीन को देखता है, तो उसकी आंखों की मांसपेशियों को अत्यंत निकट की वस्तु पर लगातार फोकस बनाए रखना पड़ता है। इससे आंखों पर अत्यधिक दबाव पड़ता है और पलकों के झपकने की दर भी घट जाती है, जिससे आंखों की प्राकृतिक नमी सूखने लगती है। इस समस्या से बचने के लिए आवश्यक है कि कमरे की बत्ती पूरी तरह बंद करके अंधेरे में फोन चलाने के स्थान पर हल्की रोशनी रखी जाए और समय-समय पर स्क्रीन से नजरें हटाकर आंखों को आराम दिया जाए।
मानसिक अशांति और सूचनाओं का अत्यधिक दबाव
सोने से ठीक पहले इंटरनेट पर भावनात्मक रूप से विचलित करने वाले समाचार, तनावपूर्ण चर्चाएं या लगातार आने वाले नोटिफिकेशन दिमाग को अत्यधिक उत्तेजित रखते हैं। यदि कोई व्यक्ति सोने से पहले किसी तनावपूर्ण या नकारात्मक घटना के बारे में पढ़ता है, तो उसका मन शांत होने के बजाय विचारों के भंवर में उलझ जाता है। रात को आराम पाने के लिए केवल स्क्रीन की रोशनी से बचना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि सोने से पहले आप किस प्रकार की सामग्री देख रहे हैं। मानसिक रूप से अशांत वातावरण में गहरी और सुकून भरी नींद आना लगभग असंभव हो जाता है।
स्क्रीन से दूरी बनाने के व्यावहारिक उपाय
रात के समय मोबाइल के इस नकारात्मक प्रभाव से बचने के लिए कुछ आसान आदतों को अपनाना बेहद कारगर साबित हो सकता है। सबसे पहले यह नियम बनाएं कि सोने के तय समय से कम से कम 30 से 60 मिनट पहले फोन को खुद से अलग कर दें। फोन को बिस्तर के बिल्कुल पास रखने के बजाय कमरे में किसी दूर की मेज पर रखें, जिससे बार-बार हाथ बढ़ाकर स्क्रीन ऑन करने की आदत कम हो सके। यदि जरूरत महसूस हो तो रात के समय अनावश्यक नोटिफिकेशन बंद कर दें। अलार्म लगाने के लिए फोन का उपयोग करते हैं, तब भी उसे बिस्तर से दूर रखें ताकि सुबह उठकर उसे बंद करने के लिए बिस्तर छोड़ना पड़े। अगर किसी अनिवार्य कारण से रात में फोन देखना ही पड़े, तो स्क्रीन की ब्राइटनेस कम रखें और वार्म डिस्प्ले या नाइट मोड का इस्तेमाल करें। हालांकि यह ध्यान रखना आवश्यक है कि नाइट मोड स्क्रीन के असर को पूरी तरह समाप्त नहीं करता, इसलिए सबसे सुरक्षित समाधान स्क्रीन टाइम को घटाना और एक नियमित स्लीप रूटीन का पालन करना ही है।

















