मुंह और गले से जुड़ी कई सामान्य दिखने वाली समस्याएं समय के साथ गंभीर मोड़ ले सकती हैं। खासकर जब मुंह या जीभ का कोई छाला हफ्तों तक न भरे, तो उसे मामूली चोट या पेट की गर्मी मानकर छोड़ देना जानलेवा साबित हो सकता है। ऐसे लक्षण यदि लगातार बने रहें, तो यह ओरल कैंसर का शुरुआती संकेत भी हो सकते हैं। छत्तीसगढ़ में तंबाकू, गुड़ाखू और अन्य निकोटीन उत्पादों के बढ़ते उपयोग ने इस खतरे को और अधिक संवेदनशील बना दिया है। युवाओं में धूम्रपान की बढ़ती आदत पर विशेषज्ञों ने गहरी चिंता जताई है और समय रहते जीवनशैली में बदलाव लाने पर जोर दिया है।
लगातार बना रहने वाला छाला सामान्य नहीं
आमतौर पर मुंह के अंदर होने वाले छाले कुछ ही दिनों में अपने आप या घरेलू देखभाल से ठीक हो जाते हैं। हालांकि, जब कोई छाला लगभग एक से डेढ़ महीने से ज्यादा समय तक बना रहे, तो तत्काल विशेषज्ञ से संपर्क करना चाहिए। जीभ पर, गालों के अंदरूनी हिस्से में अथवा मसूड़ों पर लगातार रहने वाले घाव ओरल कैंसर के प्राथमिक लक्षणों में शामिल होते हैं। इसके साथ ही यदि गले में कोई गांठ या सूजन महसूस हो रही हो, या निगलने में लगातार कोई अस्वाभाविक परेशानी बनी रहे, तो उसे बिल्कुल भी टालना नहीं चाहिए।
कई मामलों में शुरुआत में यह छाले कोई तीव्र दर्द पैदा नहीं करते। इसी वजह से लोग इसे गंभीरता से नहीं लेते और लंबे समय तक जांच टालते रहते हैं। दर्द न होने का मतलब यह नहीं है कि स्थिति पूरी तरह सुरक्षित है। बिना दर्द वाले ऐसे अल्सर ही आगे चलकर बड़ी बीमारी का रूप ले लेते हैं। यदि समय पर डॉक्टर से संपर्क किया जाए, तो वे क्लिनिकल परीक्षण के बाद आवश्यकतानुसार बायोप्सी की सलाह देते हैं। बायोप्सी के माध्यम से ऊतकों की जांच कर यह स्पष्ट रूप से तय किया जा सकता है कि कहीं वहां कैंसर कोशिकाएं तो सक्रिय नहीं हो रही हैं।
प्रारंभिक पहचान से ही संभव है प्रभावी उपचार
ओरल कैंसर के मामलों में बीमारी का पता जितनी जल्दी चले, मरीज के पूरी तरह स्वस्थ होने की संभावना उतनी ही अधिक होती है। शुरुआती चरण में पकड़े गए ट्यूमर का इलाज अपेक्षाकृत सरल और सटीक होता है। वहीं अगर लापरवाही के चलते बीमारी फैलने लगे, तो उपचार जटिल हो जाता है। कैंसर की पुष्टि होने पर मरीज की स्थिति और बीमारी के चरण के अनुसार एक संपूर्ण उपचार योजना तैयार की जाती है। इसमें स्थिति के मुताबिक सर्जरी, रेडिएशन और कीमोथेरेपी का समन्वित उपयोग किया जाता है।
अधूरा इलाज छोड़ना बढ़ा सकता है जोखिम
कैंसर के उपचार को लेकर समाज में कई तरह के भ्रम रहते हैं। अक्सर मरीज सोचते हैं कि केवल प्रभावित ट्यूमर को शल्य चिकित्सा द्वारा बाहर निकाल देना ही बीमारी का अंतिम इलाज है। हालांकि केवल ट्यूमर निकाल देना हर स्थिति में पर्याप्त समाधान नहीं होता। बीमारी की प्रकृति और उसके फैलाव को देखते हुए प्रभावित हिस्से के आसपास मौजूद लिम्फ नोड्स की सर्जरी करना भी आवश्यक हो सकता है। इसके अलावा कैंसर कोशिकाओं के सूक्ष्म अंशों को समाप्त करने के लिए रेडियोथेरेपी अथवा कीमोथेरेपी के पूरे चक्र को पूरा करना अनिवार्य होता है।
यदि मरीज बीच में ही उपचार छोड़ दे या निर्धारित प्रोटोकॉल पूरा न करे, तो बीमारी के दोबारा लौटने या शरीर के अन्य हिस्सों में फैलने की आशंका बहुत बढ़ जाती है। इलाज पूरा होने के बाद भी सतर्कता उतनी ही जरूरी रहती है। पांच वर्षों तक नियमित फॉलोअप कराना और समय-समय पर डॉक्टर से जांच कराते रहना अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है, ताकि किसी भी संभावित खतरे को समय रहते पकड़ा जा सके।
इलाज के बाद भी धूम्रपान जारी रखना खतरनाक
कैंसर का सफल उपचार प्राप्त कर लेने के बाद कई मरीज पुनः पुरानी अस्वस्थ आदतों की ओर लौट जाते हैं। यदि कोई व्यक्ति ठीक होने के बाद भी बीड़ी, सिगरेट, गुड़ाखू या तंबाकू का सेवन जारी रखता है, तो इससे कैंसर के पुनरागमन का खतरा अत्यधिक बढ़ जाता है। निकोटीन और तंबाकू के विषैले तत्व ठीक हो चुके ऊतकों पर दोबारा प्रतिकूल प्रभाव डालने लगते हैं। इसलिए स्थायी स्वास्थ्य लाभ के लिए जीवनशैली में पूर्ण और सकारात्मक बदलाव लाना अनिवार्य है।
धूम्रपान को स्टाइल मानना युवाओं के लिए बड़ा संकट
वर्तमान दौर में बहुत से युवा धूम्रपान और तंबाकू उत्पादों को किसी फैशन, स्टेटस सिंबल या लाइफस्टाइल का हिस्सा मानने लगे हैं। किसी फिल्म स्टार या अन्य साथियों की नकल करते हुए शुरू की गई यह लत बहुत जल्द शारीरिक निर्भरता में बदल जाती है। यह आदत आगे चलकर जानलेवा बीमारियों की नींव रखती है। तंबाकू से दूरी बनाने के लिए सबसे पहले व्यक्ति का मानसिक तौर पर दृढ़ होना जरूरी है। जब तक व्यक्ति स्वयं यह स्वीकार नहीं करता कि यह उत्पाद उसके शरीर को नष्ट कर रहे हैं, तब तक कोई भी बाहरी उपाय कारगर नहीं हो सकता।
धीरे-धीरे कम करें सेवन, निकोटीन रिप्लेसमेंट से लें मदद
जो लोग कई वर्षों से तंबाकू अथवा सिगरेट के आदी हैं, उनके लिए अचानक एक ही दिन में सब कुछ छोड़ देना अत्यधिक कठिन हो सकता है। ऐसी स्थिति में व्यवस्थित और क्रमिक तरीका अपनाना ज्यादा व्यावहारिक साबित होता है। उदाहरण के लिए, यदि कोई व्यक्ति प्रतिदिन 20 सिगरेट पीता है, तो उसे प्रतिदिन इसकी संख्या को क्रमशः घटाना चाहिए। साथ ही, सुबह जागने के बाद पहली सिगरेट पीने का समय भी आगे बढ़ाना चाहिए। इससे शरीर और मस्तिष्क पर निकोटीन की निर्भरता धीरे-धीरे कम होने लगती है।
इस प्रक्रिया के दौरान जब निकोटीन की तीव्र तलब सताए, तो निकोटीन रिप्लेसमेंट थेरेपी की सहायता ली जा सकती है। इसके अंतर्गत निकोटीन युक्त टैबलेट, च्युइंग गम और ट्रांसडर्मल पैच जैसे चिकित्सकीय विकल्प उपलब्ध हैं। हालांकि इन उत्पादों का इस्तेमाल भी डॉक्टर के उचित मार्गदर्शन और परामर्श के बाद ही किया जाना चाहिए। दवाओं और सहायक उपायों से कहीं अधिक महत्वपूर्ण मरीज का आत्मबल और नशा छोड़ने का पक्का संकल्प होता है।

















