दैनिक कामकाज के दौरान अक्सर लोग अपनी छोटी-मोटी गलतियों को सामान्य भूल या अनाड़ीपन मानकर टाल देते हैं। कभी हथेली से अचानक मोबाइल फिसलकर नीचे गिर जाता है, कभी शर्ट के छोटे बटन लगाने में उंगलियां कांपने या अटकने लगती हैं, तो कभी लिखते समय कलम पर सही पकड़ नहीं बन पाती। परिवार और दोस्त इसे लापरवाही या सुस्ती का नाम दे देते हैं, और व्यक्ति खुद भी यही मान लेता है कि ध्यान न देने की वजह से ऐसा हुआ। असल में यह स्थिति केवल शारीरिक ढिलाई नहीं होती। शरीर में जब मस्तिष्क और अंगों के बीच तालमेल बिगड़ने लगे, तो इसके पीछे रीढ़ की हड्डी यानी स्पाइनल कॉर्ड में पनप रही कोई गंभीर समस्या जिम्मेदार हो सकती है।
तंत्रिका तंत्र और रीढ़ की हड्डी के बीच का सीधा संवाद
मानव शरीर की पूरी कार्यप्रणाली मस्तिष्क और विभिन्न अंगों के बीच लगातार होने वाले संदेशों के आदान-प्रदान पर टिकी होती है। रीढ़ की हड्डी यानी स्पाइनल कॉर्ड इस पूरे संचार तंत्र का मुख्य राजमार्ग है। दिमाग से निकलने वाली अधिकतर तंत्रिकाएं इसी रास्ते से होकर बाजुओं, हाथों की उंगलियों, धड़, पैरों और पंजों तक पहुंचती हैं। जब तक यह मार्ग पूरी तरह सुरक्षित और खुला रहता है, तब तक सोचने की प्रक्रिया के साथ ही अंग तुरंत हरकत में आ जाते हैं और उंगलियों की पकड़ मजबूत बनी रहती है। जब गर्दन के हिस्से में मौजूद सर्वाइकल स्पाइन पर किसी भी वजह से असामान्य खिंचाव आता है या रीढ़ की हड्डी दब जाती है, तो संदेशों की आवाजाही में रुकावट आने लगती है।
स्पाइन सर्जरी विशेषज्ञ डॉ. हितेश गर्ग के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति के हाथ से लगातार चीजें छूट रही हैं और उसके साथ हथेलियों में झनझनाहट, सुन्नपन या चलने में असंतुलन जैसे लक्षण दिखाई दे रहे हैं, तो असल परेशानी उंगलियों या हथेलियों में नहीं बल्कि गर्दन और रीढ़ के ऊपरी हिस्से में मौजूद हो सकती है। चिकित्सीय भाषा में गर्दन के पास रीढ़ की हड्डी पर पड़ने वाले इस दबाव को सर्वाइकल मायलोपैथी कहा जाता है। नसों पर दबाव बनने से मस्तिष्क के निर्देश हाथों और उंगलियों तक पूरी तीव्रता से नहीं पहुंच पाते, जिससे मांसपेशियों का नियंत्रण कमजोर पड़ जाता है।
सर्वाइकल मायलोपैथी और सर्वाइकल स्पॉन्डिलोटिक मायलोपैथी के प्रमुख लक्षण
सर्वाइकल मायलोपैथी या सर्वाइकल स्पॉन्डिलोटिक मायलोपैथी के लक्षण अचानक सामने आने के बजाय धीरे-धीरे उभरते हैं। शुरुआत में गर्दन में हल्का दर्द और अकड़न महसूस हो सकती है, जिसे लोग थकान समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। समय बीतने के साथ ही हाथों और हथेलियों पर नियंत्रण घटने लगता है। मरीज को बारीक काम करने में भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है। उदाहरण के लिए, शर्ट के बटन लगाना, सुई में धागा डालना, चम्मच या कांटा पकड़कर खाना खाना, अथवा किसी वस्तु को मजबूती से थामे रखना बेहद कठिन हो जाता है।
इसके अलावा, बाहों और हथेलियों में बीच-बीच में सुन्नपन या अजीब सी झनझनाहट महसूस होने लगती है। मांसपेशियों में कमजोरी आने से सामान्य वजन उठाने में भी हाथ कांपने लगते हैं। यह विकार केवल हाथों तक सीमित नहीं रहता, क्योंकि रीढ़ की हड्डी से होकर ही नसें पैरों और पंजों तक जाती हैं। जब दबाव गहराने लगता है, तो पैरों की नसों में भी संचार बाधित होता है। इसका सीधा असर व्यक्ति के चलने-फिरने पर पड़ता है, उसका शारीरिक संतुलन बिगड़ने लगता है और चलते समय लड़खड़ाहट महसूस होने लगती है।
किन कारणों से दबने लगती है स्पाइनल कॉर्ड
गर्दन की रीढ़ की हड्डी पर दबाव बनने के पीछे कई शारीरिक और जीवनशैली से जुड़े कारक होते हैं
- उम्र का बढ़ना: बढ़ती उम्र के साथ हड्डियों और जोड़ों में स्वाभाविक घिसाव होने लगता है, जिससे रीढ़ की नसों के लिए जगह संकरी हो जाती है।
- अर्थराइटिस की समस्या: जोड़ों में सूजन और अर्थराइटिस की स्थिति रीढ़ की हड्डियों के आसपास असामान्य बदलाव लाती है।
- डिस्क की समस्याएं: रीढ़ की हड्डियों के बीच मौजूद कुशन जैसी डिस्क में कोई खराबी आ जाना या डिस्क का अपनी जगह से बाहर निकल जाना (डिस्क बल्ज) नसों पर सीधा दबाव बनाता है।
- हड्डियों की असामान्य बढ़ोतरी: रीढ़ के किनारों पर हड्डियों का अतिरिक्त बढ़ना भी तंत्रिकाओं के मार्ग को संकरा कर देता है।
- सोने और बैठने की गलत मुद्रा: सोते समय सिर और गर्दन की अनुचित स्थिति या खराब तकिए का उपयोग रीढ़ पर अनावश्यक दबाव डालता है।
जांच, चिकित्सकीय विकल्प और बचाव के उपाय
डॉ. हितेश गर्ग बताते हैं कि सर्वाइकल मायलोपैथी का उपचार इस बात पर निर्भर करता है कि रीढ़ की हड्डी पर दबाव कितना ज्यादा है और समस्या कितनी पुरानी हो चुकी है। रोग की सही स्थिति जानने के लिए एमआरआई जांच अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। एमआरआई रिपोर्ट से यह स्पष्ट हो पाता है कि डिस्क, हड्डी या सूजन में से कौन सा तत्व नसों को दबा रहा है। शुरुआती अवस्था में पहचान होने पर कई मरीजों को नियमित फिजियोथेरेपी और शारीरिक सावधानियों की मदद से राहत मिल जाती है। यदि दबाव बहुत गंभीर हो और तंत्रिकाएं स्थायी रूप से क्षतिग्रस्त होने का जोखिम हो, तो कुछ मामलों में सर्जरी कराने की जरूरत पड़ सकती है।
इस जटिल स्थिति से बचने और इसे नियंत्रित रखने के लिए रीढ़ की हड्डी की सुरक्षा को प्राथमिकता देना जरूरी है। रीढ़ पर किसी तरह का अतिरिक्त तनाव न पड़ने दें और उठते-बैठते समय पीठ व गर्दन को सीधा रखने का अभ्यास करें। सोते समय गर्दन को सहारा देने वाले उचित तकिए का ही चयन करें। मोबाइल फोन का लगातार और अत्यधिक इस्तेमाल गर्दन को लगातार नीचे झुकाए रखता है, जिससे सर्वाइकल स्पाइन पर भारी दबाव पड़ता है, अतः फोन के अत्यधिक उपयोग से बचना चाहिए। इसके साथ ही दैनिक दिनचर्या में नियमित व्यायाम को शामिल करने से शरीर लचीला बना रहता है और रीढ़ की सेहत सुरक्षित रहती है।

















