डेयरी और पशुपालन में गाय अथवा भैंस के प्रसव के तुरंत बाद नवजात बच्चे की देखभाल सबसे संवेदनशील चरण माना जाता है। पशु विशेषज्ञ डॉ. रंजना सिन्हा के अनुसार, बछड़े के जन्म लेते ही उसे मां का पहला गाढ़ा दूध यानी खीस उपलब्ध कराना उसकी शुरुआती सेहत और संपूर्ण शारीरिक बनावट की मजबूत नींव रखता है। आदर्श स्थिति यही है कि जन्म के आधे घंटे के भीतर ही नवजात को खीस पिला दी जाए, और किसी भी परिस्थिति में इसमें दो घंटे से अधिक का विलंब नहीं होना चाहिए। इस शुरुआती दूध में मौजूद विशेष एंटीबॉडीज और इम्यूनोग्लोबुलिन नवजात शिशु को बाहरी वातावरण के घातक संक्रमणों से जीवनरक्षक सुरक्षा कवच प्रदान करते हैं।
गर्भकालीन पोषण और जन्म के बाद की जैविक ढाल
गर्भकाल के दौरान बछड़े के संपूर्ण शारीरिक अंगों का निर्माण मां से मिलने वाले रक्त संचार और पोषक तत्वों पर निर्भर करता है। हालांकि, जन्म के तुरंत बाद जब बछड़ा बाहरी दुनिया के बैक्टीरिया और वायरस के सीधे संपर्क में आता है, तब उसकी रोग प्रतिरोधक प्रणाली पूरी तरह निष्क्रिय जैसी स्थिति में होती है। इस नाजुक मोड़ पर मां का पहला दूध ही उसे प्राकृतिक इम्युनिटी देता है। सामान्य दूध की तुलना में खीस में विटामिन ए, प्रोटीन, आवश्यक ऊर्जा और इम्यूनोग्लोबुलिन की मात्रा कई गुना अधिक पाई जाती है, जो नवजात के टिशू निर्माण और तेजी से शारीरिक विकास में मदद करती है।
दूध की बदलती संरचना और आंतों की अवशोषण क्षमता
पशुपालकों को यह समझना आवश्यक है कि ब्याने के बाद थन से निकलने वाले तरल का पोषण चक्र हर घंटे बदलता रहता है। पहले दिन के दूध में इम्यूनोग्लोबुलिन की सघनता सबसे अधिक होती है। इसके बाद दूसरे और तीसरे दिन इसकी रासायनिक संरचना तेजी से सामान्य दूध की ओर अग्रसर होने लगती है। लगभग तीन से चार दिनों के भीतर यह संक्रमण काल पूरा हो जाता है और थन से सामान्य दूध आने लगता है।
नवजात बछड़े के पाचन तंत्र की एक अनोखी जैविक सीमा होती है। जन्म के शुरुआती कुछ घंटों तक ही बछड़े की आंतों की आंतरिक परत इतनी पारगम्य होती है कि वह बड़े इम्यूनोग्लोबुलिन प्रोटीन अणुओं को सीधे रक्त में सोख सके। जैसे-जैसे घंटे बीतते हैं, आंतों की यह विशेष अवशोषण क्षमता तेजी से बंद होने लगती है। यदि पशुपालक लापरवाही बरतते हुए खीस पिलाने में देर कर देते हैं, तो बहुमूल्य पोषक तत्व बछड़े के पेट में जाने के बावजूद बिना अवशोषित हुए बाहर निकल जाते हैं, जिससे बछड़ा जीवन भर कमजोर और बीमारियों की चपेट में रहने वाला बन सकता है।
जेर गिरने का अंधविश्वास और वैज्ञानिक सच्चाई
ग्रामीण अंचलों में आज भी कई पशुपालकों में यह पारंपरिक भ्रांति घर किए हुए है कि जब तक गाय या भैंस की जेर यानी प्लेसेंटा पूरी तरह बाहर न निकल जाए, तब तक थनों से दूध नहीं निकालना चाहिए। इस गलत मान्यता के फेर में बछड़े को चार से छह घंटे या उससे भी अधिक समय तक भूखा रख दिया जाता है। डॉ. रंजना सिन्हा स्पष्ट करती हैं कि किसानों को इस तरह के पुराने अंधविश्वासों को छोड़कर विशुद्ध वैज्ञानिक तथ्यों पर अमल करना चाहिए। जेर गिरने का इंतजार किए बिना ही बछड़े की खुराक का प्रबंध तुरंत किया जाना चाहिए।
थनैला और मिल्क फीवर से बचाव के उपाय
पशुपालकों के मन में यह सवाल उठता है कि क्या प्रसव के बाद थन से सारा दूध निचोड़ लेना चाहिए। विशेषज्ञ की सलाह है कि थन को पूरी तरह खाली करने के बजाय आवश्यकतानुसार थोड़ा दूध निकालकर कटोरी या बोतल से बछड़े को पिलाएं और बाकी दूध थन में ही रहने दें या बछड़े को सीधे मां का थन पकड़ने दें। यदि थन में दूध का भारी दबाव लंबे समय तक बना रहे या गलत तरीके से दूध छोड़ा जाए, तो थन में गांठ, कड़ापन और गंभीर मैस्टाइटिस यानी थनैला रोग पनप सकता है। इस बीमारी की वजह से मवेशी को उठने, बैठने और चलने-फिरने में असहनीय दर्द झेलना पड़ता है। इसके अतिरिक्त, ब्याने के फौरन बाद पशु के शरीर में अचानक कैल्शियम के स्तर में गिरावट आने से मिल्क फीवर की गंभीर समस्या पैदा हो सकती है, जिसकी निगरानी पशुपालकों को नियमित रूप से करनी चाहिए।



















