मानव शरीर को सीधा खड़ा रखने और संतुलन बनाए रखने में रीढ़ की बनावट बुनियादी आधार की तरह काम करती है। खोपड़ी के आधार से शुरू होकर नितंब के निचले छोर तक फैली यह अस्थि श्रृंखला कई अलग-अलग हिस्सों में विभाजित रहती है। सबसे ऊपरी हिस्से को ग्रीवा खंड यानी सर्वाइकल स्पाइन के नाम से जाना जाता है, जिसमें कुल सात अस्थि खंड परस्पर जुड़े होते हैं। इसके ठीक बाद छाती और पसलियों के पीछे स्थित वक्षीय भाग आता है, जिसमें बारह अस्थियों का विन्यास मौजूद होता है। इसके निचले भाग में कटि प्रदेश यानी लंबर स्पाइन की पांच अस्थियां आती हैं, जिसके नीचे सेक्रम की पांच परस्पर जुड़ी हुई हड्डियां एक मजबूत ढांचा तैयार करती हैं और सबसे अंत में टेलबोन अथवा कॉक्सिक्स मौजूद होती है। इन सभी हड्डियों के मध्य भाग में एक नली जैसी गुहा बनी होती है, जिसमें से होकर मस्तिष्क से निकलने वाले तमाम स्नायु सूत्र पूरे शरीर में फैलते हैं। यह स्नायु रज्जु समस्त शारीरिक अंगों से संकेतों को सिर तक पहुंचाने और वहां से कार्यवाहक संदेशों को वापस मांसपेशियों तक ले जाने का कार्य करती है।
शारीरिक गतिविधियों का समस्त गुरुत्वीय भार इसी अस्थि स्तंभ पर टिका रहता है। जब यह स्तंभ किसी कारणवश विकृत होने लगता है, तो समूचा तंत्रिका तंत्र प्रभावित हो जाता है। वर्तमान दौर में बीस से तीस वर्ष की आयु वाले युवाओं में ढांचागत विकृतियां तेजी से सामने आने लगी हैं, जिसके चलते कम आयु में ही शरीर झुका हुआ और शिथिल नजर आने लगा है। दैनिक दिनचर्या में स्क्रीन के अत्यधिक उपयोग और गतिहीन आदतों ने दो प्रमुख समस्याओं को जन्म दिया है, जिन्हें तकनीकी गर्दन का खिंचाव और बैठने की व्यापक आदत कहा जा सकता है। इन शारीरिक विकारों की प्रक्रिया और उनके जैविक प्रभावों को समझना रीढ़ की रक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
झुकी हुई गर्दन पर बढ़ता गुरुत्वाकर्षण का असाधारण दबाव
सामान्य स्थिति में जब मनुष्य बिना किसी झुकाव के सामने देखता है, तब सिर का प्राकृतिक भार साढ़े चार से साढ़े पांच किलोग्राम के आसपास मापा जाता है। इस मुद्रा में ग्रीवा की हड्डियों पर किसी प्रकार का अतिरिक्त खिंचाव नहीं होता क्योंकि कोण लगभग शून्य डिग्री रहता है। विपरीत इसके, जब कोई व्यक्ति मोबाइल अथवा लैपटॉप की स्क्रीन पर नजरें टिकाने के लिए सिर को साठ डिग्री के कोण तक नीचे झुकाता है, तब ग्रीवा की मांसपेशियों और अस्थियों पर पड़ने वाला प्रभावी दबाव सत्ताईस किलोग्राम तक पहुंच जाता है। यह अतिरिक्त भार रीढ़ के ऊपरी हिस्से के लिए एक लगातार चलने वाले तनाव का रूप ले लेता है।
लगातार इतने भारी जैविक भार का सामना करने से ग्रीवा क्षेत्र के टेंडन, स्नायुबंधन और मांसपेशीय रेशों में सूक्ष्म स्तर पर आंतरिक चोटें उत्पन्न होने लगती हैं। समय बीतने के साथ यह खिंचाव दीर्घकालिक सूजन में बदल जाता है। ग्रीवा की स्वाभाविक संरचना में एक हल्का घुमाव होता है जिसे सी आकार का मोड़ कहा जाता है। जब सिर बार-बार आगे की तरफ झुका रहता है, तो यह स्वाभाविक मोड़ सीधा होने लगता है, जिससे सर्वाइकल लॉर्डोसिस नामक संरचनात्मक विकृति विकसित हो जाती है। परिणामतः हड्डियों और जोड़ों का संतुलन बिगड़ने लगता है, स्नायु जड़ों पर असामान्य दबाव बनने लगता है और इंटरवर्टेब्रल डिस्क के घिसने या उभरने की गति असाधारण रूप से तेज हो जाती है।
गतिहीन कार्यशैली और कुर्सी पर निरंतर बिताए जाने वाले घंटे
शारीरिक निष्क्रियता की प्रवृत्ति अब एक गंभीर सामाजिक आदत बन चुकी है, जिसमें पेशेवर कामकाजी युवा अथवा अध्ययनरत छात्र प्रतिदिन आठ से बारह घंटे निरंतर कुर्सी पर बैठकर व्यतीत करते हैं। कार्यालयीन कार्यों के अतिरिक्त शेष समय भी सोफे पर बैठकर अथवा बिस्तर पर लेटकर डिजिटल माध्यमों को देखने में बीतता है। लेटकर स्क्रीन का संचालन करना रीढ़ की वक्रता के लिए और भी अधिक विनाशकारी सिद्ध होता है क्योंकि इससे अंगों का संरेखण पूरी तरह बिगड़ जाता है।
घंटों तक एक ही स्थान पर गतिहीन बैठे रहने से पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण का समस्त निचला दबाव कटि प्रदेश और श्रोणि भाग यानी पेल्विस पर केंद्रित हो जाता है। इस कारण से पीठ के निचले हिस्से के मांसपेशीय ऊतक शिथिल और निष्क्रिय पड़ने लगते हैं। गति के अभाव में रक्त का परिसंचरण मंद हो जाता है, मांसपेशियों का स्वाभाविक लचीलापन समाप्त होने लगता है और रीढ़ के विभिन्न खंडों के बीच स्थित गद्देदार डिस्क पर असंतुलित एकतरफा भार पड़ता है। इसके परिणामस्वरूप डिस्क समय से काफी पहले क्षीण होने लगती है। साथ ही शारीरिक चयापचय सुस्त पड़ जाने से वसा संचय, शर्करा असंतुलन और असमय रीढ़ के पुराने रोगों का प्रकोप तेजी से उभरने लगता है।
स्लिप डिस्क और तंत्रिकाओं के दबने से उत्पन्न तंत्रिका संबंधी संकट
शारीरिक यांत्रिकी के दृष्टिकोण से निरंतर बैठने की अस्वस्थ दिनचर्या ही अंततः गर्दन के इस अत्यधिक खिंचाव को जन्म देती है। जब इस तरह के शुरुआती दर्द को साधारण थकान मानकर अनदेखा कर दिया जाता है, तो इसके परिणाम तंत्रिका तंत्र के लिए घातक रूप ले सकते हैं। ग्रीवा और रीढ़ के अस्थि खंडों के मध्य जेल से भरी हुई कुशन जैसी संरचनाएं मौजूद होती हैं, जिन्हें इंटरवर्टेब्रल डिस्क कहा जाता है। यह संरचना झटकों को सोखने और हड्डियों को आपसी घर्षण से बचाने का कार्य करती है।
गलत शारीरिक मुद्राओं और निरंतर मांसपेशीय ऐंठन के कारण जब इन हिस्सों पर दबाव बना रहता है, तो इनके भीतर मौजूद चिकना जेल धीरे-धीरे सूखने लगता है। जेल के सूखने से डिस्क अपनी प्राकृतिक परिधि से बाहर की ओर खिसक जाती है और उसमें सूजन आ जाती है, जिसे हर्नियेटेड डिस्क अथवा स्लिप डिस्क की स्थिति कहा जाता है। यह अवस्था तीव्र पीड़ा का कारण बनती है। चूंकि मस्तिष्क से निकलने वाली प्रमुख तंत्रिकाएं इसी ग्रीवा मार्ग से होकर दोनों बाजुओं और पैरों तक जाती हैं, अतः इनके दब जाने पर हाथों और पैरों में सुन्नता आने लगती है।
गंभीर न्यूरोलॉजिकल प्रभाव और चलने-फिरने के संतुलन में गिरावट
तंत्रिका जड़ों पर निरंतर दबाव बने रहने की स्थिति में अंगों की संवेदी क्षमता के साथ-साथ पेशीय ताकत यानी मोटर पावर भी क्षीण होने लगती है। इसका सीधा अर्थ यह है कि व्यक्ति अपनी पूरी मानसिक इच्छाशक्ति लगाने के बावजूद हाथों की उंगलियों अथवा पैरों की मांसपेशियों से आवश्यक बल उत्पन्न नहीं कर पाता। हाथ से वस्तुएं छूटने लगती हैं और पकड़ कमजोर हो जाती है।
रोग की प्रगति के साथ पैरों का समन्वय भी डगमगाने लगता है, जिसके चलते सामान्य रूप से चलते समय व्यक्ति लड़खड़ाने लगता है। अति गंभीर परिस्थितियों में जब केंद्रीय तंत्रिका मार्ग अत्यधिक संकुचित हो जाता है, तब मूत्राशय और आंतों की क्रियाशीलता पर से मस्तिष्क का ऐच्छिक नियंत्रण तक समाप्त हो सकता है। मल-मूत्र त्याग के नियंत्रण का यह अभाव एक गंभीर चिकित्सीय आपातकाल का रूप ले लेता है, जिसके लिए तत्काल विशेषज्ञ हस्तक्षेप की आवश्यकता होती है। अतः मोबाइल स्क्रीन के उपयोग और बैठने की मुद्रा में तत्काल सुधार करना जीवन की गतिशीलता को सुरक्षित रखने का एकमात्र उपाय है।



















