मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण प्रगति सामने आई है, जहां अत्याधुनिक तकनीक की मदद से डिप्रेशन जैसी गंभीर स्थिति का अनुमान लक्षण उभरने से काफी पहले लगाया जा सकता है। शेनझेन यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने एक नया डीप लर्निंग आधारित AI मॉडल विकसित किया है जो किसी व्यक्ति में मेजर डिप्रेसिव डिसऑर्डर का खतरा 4 साल पहले ही भांप सकता है। यदि समय रहते जोखिम का पता चल जाए, तो सही परामर्श और चिकित्सा के जरिए मरीज को बीमारी के गंभीर दौर में जाने से रोका जा सकता है।
डिप्रेशन की शुरुआती पहचान क्यों है जरूरी
विश्व स्वास्थ्य संगठन और स्वास्थ्य अध्ययनों के आंकड़ों के अनुसार, मेजर डिप्रेसिव डिसऑर्डर दुनिया भर में 33.2 करोड़ से अधिक लोगों को प्रभावित करता है। कई मामलों में जब तक इस बीमारी का निदान होता है, तब तक इसके लक्षण काफी जटिल हो चुके होते हैं, जिससे इलाज कठिन हो जाता है। ऐसे में अगर डिप्रेशन के शुरुआती जोखिम संकेत पहले ही मिल जाएं, तो शुरुआती चरण में ही निवारक उपाय और परामर्श शुरू किया जा सकता है। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए वैज्ञानिकों ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से यह नया मॉडल तैयार किया है।
यूरोपीय क्लिनिकल स्टडी और डेटा विश्लेषण
इस AI मॉडल को प्रशिक्षित और निर्मित करने के लिए वैज्ञानिकों ने यूरोप में आयोजित दो बड़े और लंबे क्लिनिकल अध्ययनों के डेटा का बारीकी से इस्तेमाल किया। इन अध्ययनों में किशोरों और युवाओं की मानसिक स्थिति का दीर्घकालिक मूल्यांकन किया गया था। शोध में शामिल प्रतिभागियों का 16 साल, 19 साल और 23 साल की उम्र में तीन अलग-अलग चरणों में गहन परीक्षण किया गया था। इस दौरान उनके मस्तिष्क के एमआरआई स्कैन, ब्लड टेस्ट और विस्तृत प्रश्नावली के उत्तरों का संकलन किया गया, जिससे यह समझा जा सके कि उम्र बढ़ने के साथ दिमाग की कार्यप्रणाली में क्या बदलाव आते हैं।
चेहरे के हावभाव और भावनात्मक प्रतिक्रिया
अध्ययन के दौरान शोधकर्ताओं ने प्रतिभागियों को अलग-अलग चेहरे के एक्सप्रेशन्स दिखाए, जिनमें खुश, गुस्से वाले और तटस्थ यानी सामान्य चेहरे शामिल थे। वैज्ञानिकों ने एमआरआई और अन्य जांचों के जरिए यह देखा कि दिमाग इन भावनात्मक संकेतों को किस तरह प्रोसेस करता है। सामान्य परिस्थितियों में कोई व्यक्ति मुस्कुराते हुए चेहरे को एक सकारात्मक संदेश मानता है। हालांकि, जिन युवाओं में भविष्य में डिप्रेशन विकसित होने का जोखिम था, उनमें दूसरों के भावों को नकारात्मक रूप से लेने की प्रवृत्ति देखी गई। उदाहरण के लिए, सामने वाले व्यक्ति के सामान्य या मुस्कुराते चेहरे को भी वे खुद के प्रति नाराजगी या विरोध के रूप में समझ लेते थे।
19 साल की उम्र में मिले अहम संकेत
शोध में पाया गया कि 19 साल की उम्र में जिन युवाओं में चेहरे के भावों को नकारात्मक रूप से आंकने की प्रवृत्ति ज्यादा थी, उनमें 23 साल की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते डिप्रेशन या गंभीर चिंता (एंग्जायटी) के लक्षण विकसित होने की संभावना काफी अधिक पाई गई। इसी पैटर्न के आधार पर शोधकर्ताओं ने डीप लर्निंग पर आधारित AI मॉडल तैयार किया जो यह समझता है कि मानव मस्तिष्क भावनात्मक जानकारी को किस तरह संसाधित करता है और भविष्य में मानसिक अस्वस्थता का जोखिम किस स्तर पर है।
टेस्टिंग के नतीजे और भविष्य की दिशा
शोधकर्ताओं ने तैयार किए गए AI मॉडल की सटीकता को जांचने के लिए इसे एक अन्य स्वतंत्र अध्ययन के डेटा सेट पर भी आजमाया। इस दूसरे समूह में डिप्रेशन के साथ-साथ नशे की लत और ईटिंग डिसऑर्डर जैसी समस्याओं से पीड़ित लोग शामिल थे। लगभग 400 किशोरों के डेटा परीक्षण के दौरान, क्लिनिकली मेजर डिप्रेसिव डिसऑर्डर से पीड़ित 134 लोगों में दिमाग द्वारा सूचना प्रोसेसिंग के असाधारण और असमान संकेत दर्ज किए गए। हालांकि, वैज्ञानिकों का स्पष्ट कहना है कि यह मॉडल अभी शुरुआती शोध चरण में है और इसे चिकित्सकीय उपयोग से पहले बड़े और विविधतापूर्ण समूहों पर और अधिक जांचने की आवश्यकता है।



















