घरेलू मुद्रा को अत्यधिक गिरावट से बचाने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक इस वर्ष कई मोर्चों पर सक्रिय दिखाई दे रहा है। विदेशी मुद्रा बाजार में स्थिरता बनाए रखने के उद्देश्य से केंद्रीय बैंक ने सीधे हस्तक्षेप से लेकर आयात से जुड़ी डॉलर मांग पर लगाम कसने तक के कई कदम उठाए हैं। सिंगापुर स्थित वित्तीय संस्थान डीबीएस के ताजा विश्लेषण के अनुसार, रुपये की रक्षा के लिए अपनाए गए इन उपायों से अमेरिकी डॉलर की तुलना में गिरावट की रफ्तार सीमित हुई है, हालांकि बुनियादी चुनौतियों के चलते लंबी अवधि में बड़ी मजबूती की गुंजाइश सीमित नजर आती है।
रिजर्व बैंक का बहुस्तरीय रक्षा तंत्र
केंद्रीय बैंक ने रुपये को संभालने के लिए पारंपरिक और गैर-पारंपरिक दोनों तरह के विकल्पों का एक साथ सहारा लिया है। इस व्यापक सुरक्षा तंत्र के भीतर हाजिर और वायदा विदेशी मुद्रा बाजारों में सीधी खरीद-बिक्री शामिल रही है। इसके साथ ही विनियामक नियमों में बदलाव, बैंकिंग तंत्र में नकदी का प्रबंधन और आयातकों की ओर से डॉलर की त्वरित मांग को व्यवस्थित करने जैसे प्रशासनिक उपाय भी लागू किए गए हैं। इन संयुक्त प्रयासों का प्राथमिक मकसद मुद्रा विनिमय में आने वाले अचानक झटकों को रोकना और बाजार को आश्वस्त करना है।
नियामक संस्थाओं ने संकेत दिए हैं कि उनकी निगरानी लगातार बनी हुई है और आवश्यकता पड़ने पर आगे भी दखल दिया जाएगा। रिजर्व बैंक के गवर्नर मल्होत्रा ने हाल ही में 13 अक्टूबर को दिए एक साक्षात्कार में मुद्रा को संतुलित रखने के सरकारी संकल्प को स्पष्ट किया था। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा था, “द रिजर्व बैंक इज डिटरमाइंड टू डू व्हाटएवर इज नेसेसरी टू इंश्योर ऑर्डरली मूवमेंट इन द फॉरेन एक्सचेंज मार्केट,” जिसका अर्थ है कि विदेशी मुद्रा बाजार में व्यवस्थित उतार-चढ़ाव सुनिश्चित करने के लिए केंद्रीय बैंक हर जरूरी कदम उठाने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।
वर्ष 2013 के संकट और 2026 के दौर में अंतर
आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि भले ही रुपये को स्थिरता प्रदान करने का लक्ष्य आज भी वही है जो पहले था, परंतु वर्तमान चुनौती का स्वरूप काफी बदल चुका है। वर्ष 2013 के दौरान भारत को संकट प्रबंधन की मुद्रा में आना पड़ा था क्योंकि उस वक्त देश के आंतरिक वृहद आर्थिक संतुलन कमजोर थे। उस समय चालू खाते का घाटा काफी व्यापक था, खुदरा महंगाई दर बेहद ऊंचे स्तर पर थी, राजकोषीय घाटा बढ़ा हुआ था और विदेशी मुद्रा भंडार का सुरक्षा घेरा अपेक्षाकृत सीमित था।
इसके विपरीत 2026 के मौजूदा दौर में स्थिति आंतरिक संकट की नहीं बल्कि बाहरी झटकों की अधिक है। आज की जंग मुख्य रूप से वैश्विक व्यापार की प्रतिकूल शर्तों और अमेरिकी डॉलर की अंतरराष्ट्रीय मजबूती से निपटने की है। घरेलू आर्थिक बुनियाद पहले की अपेक्षा कहीं अधिक मजबूत है, जिससे केंद्रीय बैंक को बाजार में रणनीतिक कदम उठाने के लिए बेहतर आधार मिला है। फिर भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर डॉलर के प्रभुत्व का सामना करना अपने आप में एक अलग किस्म की जटिलता पैदा करता है।
विनिर्माण प्रतिस्पर्धा और पूंजी प्रवाह की बाधाएं
रिजर्व बैंक के तमाम सुरक्षात्मक उपायों के बावजूद रुपये में सतत और लंबी मजबूती लौटने की संभावना सीमित मानी जा रही है। इसका मुख्य कारण भारत की विनिर्माण क्षमता और निर्यात व्यापार की अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धात्मकता है। यदि घरेलू मुद्रा अधिक मजबूत होती है, तो वैश्विक बाजार में भारतीय सामान महंगे हो सकते हैं, जिससे निर्यातकों की प्रतिस्पर्धा पर विपरीत प्रभाव पड़ सकता है।
इसके अतिरिक्त विदेशी पोर्टफोलियो प्रवाह का परिदृश्य भी लगातार चुनौतीपूर्ण बना हुआ है। कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में होने वाला उतार-चढ़ाव भारतीय मुद्रा के लिए हमेशा एक संवेदनशील बिंदु रहता है। जब भी कच्चे तेल के दाम चढ़ते हैं या अंतरराष्ट्रीय बाजारों में जोखिम से बचने की धारणा बलवती होती है, विदेशी निवेशक पूंजी निकालने लगते हैं। ऐसे माहौल में रुपये के धीरे-धीरे कमजोर होने का रास्ता खुला रहता है, जो पूरी तरह वैश्विक घटनाक्रमों पर निर्भर करेगा।
वैश्विक मुद्राओं और फेडरल रिजर्व का रुख
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बाजार में शुक्रवार के एशियाई कारोबारी सत्र के दौरान डॉलर की दिशा में हलचल देखी गई। ऑस्ट्रेलियाई डॉलर अमेरिकी मुद्रा के मुकाबले अपनी बढ़त को आगे बढ़ाते हुए 0.6950 के स्तर की ओर पहुंचा। अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व के चेयरमैन वॉर्श की ताजा टिप्पणियों से डॉलर पर बिकवाली का दबाव देखा गया। वॉर्श ने मूल्य स्थिरता हासिल करने के प्रति अपनी प्रतिबद्धता तो दोहराई, परंतु ब्याज दरों के भावी मार्ग पर कोई निश्चित संकेत नहीं दिया। उनकी इस अनिर्णायक टिप्पणी से अमेरिकी मुद्रा को झटका लगा।
इसी तरह जापानी येन के मुकाबले डॉलर का रुख भी कमजोर हुआ और शुक्रवार के एशियाई सत्र में डॉलर-येन की जोड़ी फिसलकर 158.00 के स्तर से नीचे आ गई। फेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीति को लेकर स्पष्टता के अभाव ने डॉलर की तेजी पर ब्रेक लगाने का काम किया।
सोने और क्रिप्टोकरेंसी बाजार की स्थिति
कमोडिटी बाजार में सोने की कीमतों में भी उतार-चढ़ाव का दौर जारी रहा। शुक्रवार को पीली धातु 4,200 डॉलर प्रति ट्रॉय औंस के अहम स्तर के नीचे दोनों तरफ झूलती नजर आई। अमेरिकी डॉलर में हल्की नरमी के बावजूद अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में मामूली सुधार देखने को मिला, जिससे सोने की चाल किसी एक स्पष्ट दिशा में आगे नहीं बढ़ सकी।
दूसरी ओर डिजिटल परिसंपत्तियों का बाजार भी अक्टूबर माह में दबाव में दिखाई दिया है। दुनिया की सबसे बड़ी क्रिप्टोकरेंसी बिटकॉइन इस सप्ताह की शुरुआत में फिसलकर 80,000 डॉलर के नीचे चली गई थी। हालांकि शुक्रवार को इसमें हल्का सुधार हुआ और यह 82,000 डॉलर के आसपास कारोबार करती दिखी। वृहद आर्थिक अनिश्चितताओं और संस्थागत मांग में आई नरमी ने क्रिप्टो बाजार की रफ्तार को धीमा कर रखा है।



















