नई दिल्ली स्थित वीएमएमसी और सफदरजंग अस्पताल के कार्डियक सर्जन ने चिकित्सा क्षेत्र में एक ऐतिहासिक कीर्तिमान स्थापित किया है। डॉक्टरों ने जन्मजात रूप से उलटे दिल के साथ 39 वर्षों तक जीवन जीने वाले एक मरीज का अत्याधुनिक रोबोटिक तकनीक की मदद से सफलतापूर्वक वाल्व रिप्लेसमेंट किया है। यह अपनी तरह का दुनिया का पहला रोबोटिक ऑपरेशन है, जिसने चिकित्सा जगत में न्यूनतम इनवेसिव सर्जरी के नए द्वार खोल दिए हैं।
39 वर्षों की अनोखी शारीरिक संरचना और हृदय संबंधी चुनौती
मानव शरीर की सामान्य संरचना में हृदय के दाएं और बाएं हिस्से अलग-अलग भूमिकाएं निभाते हैं। सामान्य स्थिति में दिल का दायां भाग कम दबाव के साथ रक्त को केवल फेफड़ों तक ऑक्सीजन प्राप्त करने के लिए भेजता है। इसके विपरीत, बाएं हिस्से का मुख्य काम पूरे शरीर में ऑक्सीजन युक्त रक्त को मजबूती से पंप करना होता है।
हालांकि, इस 39 वर्षीय मरीज के मामले में जन्मजात रूप से दिल की बनावट किसी दर्पण में दिखने वाले चित्र (मिरर इमेज) की तरह एकदम उलटी थी। दिल का जो दायां हिस्सा केवल फेफड़ों के कम दबाव वाले तंत्र के लिए बना था, वह लगभग चार दशकों तक फेफड़ों के साथ-साथ पूरे शरीर में रक्त संचार की जिम्मेदारी संभालता रहा। निरंतर अत्यधिक दबाव झेलने के कारण 40 वर्ष की आयु के करीब पहुंचते-पहुंचते मरीज की कार्डियक मांसपेशियां कमजोर हो गईं और दिल का एक वाल्व खराब हो गया।
पारंपरिक ओपन हार्ट सर्जरी के स्थान पर रोबोटिक तकनीक की दूरदर्शिता
जब मरीज गंभीर स्थिति में वीएमएमसी और सफदरजंग अस्पताल पहुंचा, तो वहां के कार्डियोथोरेसिक विशेषज्ञों ने संपूर्ण जांच के बाद वाल्व प्रत्यारोपण का निर्णय लिया। सामान्यतः वाल्व बदलने की पारंपरिक सर्जरी में मरीज के सीने के बीचों-बीच लंबा चीरा लगाया जाता है और छाती की हड्डी (स्टर्नम) को काटना पड़ता है, जिससे अत्यधिक दर्द और लंबे समय तक अस्पताल में भर्ती रहने की आवश्यकता होती है।
मरीज की जटिल स्थिति को देखते हुए डॉक्टरों की टीम ने एक क्रांतिकारी रास्ता चुना। छाती की हड्डी काटने के बजाय, डॉक्टरों ने रोबोटिक सहायता से सीने में केवल 3 सेंटीमीटर का एक सूक्ष्म छेद किया। इसी छोटे से चीरे के माध्यम से रोबोटिक उपकरणों को नियंत्रित करते हुए खराब वाल्व को सफलतापूर्वक बदल दिया गया।
चार दिनों की सूक्ष्म रणनीति और उलटे तरीके से संपन्न ऑपरेशन
इस अभूतपूर्व ऑपरेशन का नेतृत्व सफदरजंग अस्पताल के कार्डियोथोरेसिक एवं वैस्कुलर सर्जरी (सीटीवीएस) विभाग के अध्यक्ष डॉ. अनुभव गुप्ता ने किया। चूंकि मरीज का दिल पूरी तरह उलटा था, इसलिए डॉक्टरों को शल्य चिकित्सा का हर मानक चरण और दिशा विपरीत क्रम में अपनानी पड़ी।
चिकित्सकों की टीम ने इस अनोखी चुनौती से निपटने के लिए चार दिनों तक विस्तृत पूर्व-समीक्षा और योजना बनाई। इसके बाद ऑपरेशन थियेटर में 3 से 4 घंटे चली इस जटिल सर्जरी को सफलतापूर्वक अंजाम दिया गया। डॉ. अनुभव गुप्ता ने बताया, "सर्जरी में बड़ी चीरा लगाने या हड्डी काटने की आवश्यकता नहीं पड़ी, जिससे मरीज को कुछ ही दिनों में स्वस्थ हालत में अस्पताल से छुट्टी दे दी गई।"
चिकित्सा विशेषज्ञों का मानना है कि यह सफलता सिद्ध करती है कि अब अत्याधुनिक तकनीक की मदद से जटिल से जटिल जन्मजात हृदय दोषों का इलाज भी बिना अत्यधिक दर्द, कम रक्तस्राव और त्वरित रिकवरी के साथ संभव है।


















