दिल्ली की बैठक ने खोला रास्ता
जो योजना 85 साल पहले एक सपने के तौर पर देखी गई थी, वह आज भी पूरी नहीं हो पाई है। कई बार दो राज्यों और केंद्र सरकार की ओर से इसे आगे बढ़ाने की कोशिश हुई, लेकिन हर बार बात अटक गई। अब मंगलवार को दिल्ली में मोदी सरकार, उत्तराखंड और हिमाचल के मुख्यमंत्रियों की बैठक में इस पर एक अहम फैसला हुआ है। बात हो रही है किशाऊ बांध परियोजना की, जो हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में प्रस्तावित है।
मंगलवार को दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और हिमाचल के सीएम सुक्खू की मुलाकात हुई और किशाऊ बांध परियोजना पर चर्चा हुई। इस मौके पर उत्तराखंड के सीएम धामी भी मौजूद रहे। बैठक में हिमाचल के हित में बड़ा फैसला लिया गया।
एशिया का दूसरा सबसे बड़ा बांध
किशाऊ बनने के बाद एशिया का दूसरा सबसे बड़ा बांध होगा। पहले नंबर पर टिहरी डैम है, जिसकी ऊंचाई 260 मीटर है। किशाऊ के लिए करीब 236 मीटर ऊंचा बांध प्रस्तावित है और इसके साथ करीब 32 किमी लंबी झील भी बनेगी।
1940 से अब तक का लंबा सफर
हिमाचल प्रदेश के सिरमौर और उत्तराखंड के देहरादून जिले की सीमा पर साल 1940 में पहली बार इस बांध का विचार सामने आया था। इसके बाद पंजाब सरकार ने 1944-45 में प्रोजेक्ट साइट पर सर्वे शुरू किया, लेकिन साल 1946 में कई कारणों से इसे रोक दिया गया। इसके बाद करीब 16 साल तक यह सर्वे ठंडे बस्ते में पड़ा रहा।
उत्तर प्रदेश सरकार ने 1962 में सर्वे दोबारा शुरू किया और 1965 में परियोजना की शुरुआती रिपोर्ट तैयार की गई। इस रिपोर्ट में बांध की ऊंचाई 235 बताई गई थी। रिपोर्ट केंद्र सरकार को सौंपी गई और 1965 में ही इस परियोजना को पंचवर्षीय योजना में शामिल कर लिया गया।
डीपीआर का अध्ययन करने के बाद जल कमीशन ने पाया कि किशाऊ गांव के पास परियोजना में दिक्कत है और सुझाव दिया कि रॉकफिल डैम के बजाय आर्क डैम बनाया जाए। इसके बाद उत्तर प्रदेश के सिंचाई विभाग ने 1970 में फिर सर्वे शुरू किया। 1978 में नई डीपीआर बनी और रॉकफिल डैम का प्रस्ताव केंद्रीय जल कमीशन को भेजा गया।
कमीशन ने इस डीपीआर को देखकर भी माना कि यह साइट रॉकफिल डैम के लिए उपयुक्त नहीं है, क्योंकि यहां भौगोलिक अड़चनें हैं। इसी आधार पर किशाऊ गांव के पास की साइट खारिज कर दी गई और अटाल, संभरखेड़ा तथा मोराड़ के पास साइट चुनने की सलाह दी गई। आगे चलकर संभरखेड़ा की साइट को 236 मीटर ऊंचा बांध बनाने के लिए उपयुक्त माना गया।
किशाऊ बांध परियोजना की वेबसाइट के अनुसार, संभरखेड़ा स्थान के लिए 1988 में डीपीआर बनी, जिसे 1998 में उत्तर प्रदेश सरकार ने रिवाइज कर केंद्रीय जल आयोग को सौंपा। उत्तराखंड के उत्तर प्रदेश से अलग होकर नया राज्य बनने के बाद अब इस परियोजना की देखरेख हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड सरकार कर रही हैं। इसके लिए 2017 में किशाऊ बांध कोर्पोरेशन लिमिटेड नाम से कंपनी बनाई गई। साइट को लेकर मंथन अब भी जारी है।
किस नदी पर बन रहा है और कितनी बिजली बनेगी
किशाऊ बांध परियोजना टौंस नदी पर प्रस्तावित है। इससे 660 मेगावाट बिजली का उत्पादन होगा। परियोजना पूरी होने पर दिल्ली, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश को इसका फायदा मिलेगा।
लागत 11500 करोड़ से बढ़कर 15000 करोड़ तक
परियोजना पर करीब 11500 करोड़ रुपये की लागत आएगी, हालांकि इसके अलावा भी काफी खर्च होने हैं। साल 2018 में केंद्रीय जल आयोग ने इसकी लागत 11500 करोड़ रुपये आंकी थी, लेकिन अब 2026 में यह करीब 15000 करोड़ रुपये तक पहुंच गई है।
किसे फायदा, कितने लोग होंगे प्रभावित
इस परियोजना से 97076 हेक्टेयर जमीन की सिंचाई के लिए पानी की व्यवस्था होगी, साथ ही पीने के लिए 617 MCM पानी उपलब्ध होगा। इसमें उत्तराखंड की 1452 हेक्टेयर और हिमाचल प्रदेश की 1498 हेक्टेयर जमीन इस्तेमाल होगी। दूसरी ओर, इस योजना के चलते उत्तराखंड के नौ गांव और हिमाचल के 8 गांव पानी में डूब जाएंगे और दोनों राज्यों के कुल 5484 लोग प्रभावित होंगे। यही वजह है कि कुछ लोग इस परियोजना का विरोध भी कर रहे हैं।
क्यों अटकी थी परियोजना और कैसे सुलझा विवाद
हिमाचल प्रदेश में पिछली भाजपा सरकार ने इस योजना में 800 करोड़ रुपये खर्च करने की हामी भरी थी। लेकिन अब अमित शाह के साथ बैठक में सीएम सुक्खू अपनी शर्तें मनवाने में कामयाब रहे और आठ साल से चल रहा वित्तीय विवाद सुलझ गया। नए समझौते के तहत हिमाचल प्रदेश अब परियोजना में पैसा खर्च नहीं करेगा। हिमाचल की करीब 2,000 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत दिल्ली, राजस्थान और हरियाणा वहन करेंगे। बदले में हिमाचल को करीब 600 करोड़ रुपये की सालाना आय होगी और 100 करोड़ बिजली यूनिट भी मिलेंगी। इसी मुद्दे पर पिछले 8 साल से बात अटकी हुई थी।
गौरतलब है कि फरवरी 2026 में हिमाचल सरकार ने इस परियोजना में आगे बढ़ने से इनकार कर दिया था। तब सीएम सुक्खू ने कहा था कि हिमाचल प्रदेश को भाखड़ा बांध का लंबित एरियर नहीं मिला है, इसलिए वह आगे नहीं बढ़ेंगे। हालांकि अब मंगलवार को अमित शाह के साथ बैठक में बात बन गई।
आगे की राह
इस परियोजना के लिए फिलहाल 8.10 करोड़ रुपये जारी किए गए हैं और शुरुआत होने के बाद इसे 96 महीने में पूरा करने की समयसीमा तय है। जून 2015 में हिमाचल और उत्तराखंड सरकार के बीच अनुबंध हो चुका है। साल 2008 में इस परियोजना को नेशनल प्रोजेक्ट का दर्जा दिया गया था, फिर भी यह अब तक लंबित बनी हुई है।













