हिमाचल प्रदेश के पहाड़ी इलाकों में प्रकृति ने एक बार फिर अपना रौद्र रूप दिखाया है। कांगड़ा जिले के शाहपुर इलाके में स्थित बोह घाटी में अचानक बादल फटने से भयानक तबाही का मंजर सामने आया है। इस प्राकृतिक आपदा ने सदियों पुरानी बसावटों को चंद घंटों में मलबे के ढेर में तब्दील कर दिया है। इतनी बड़ी तबाही और दर्जनों मकानों के जमींदोज होने के बावजूद एक बड़ी राहत की खबर यह रही कि इसमें किसी भी इंसान की जान नहीं गई। प्रशासन की त्वरित कार्रवाई और स्थानीय लोगों की अपनी सतर्कता के चलते समय रहते गांव खाली हो गए, जिससे एक बहुत बड़ा हादसा टल गया।
मलबे में समा गए पूरे के पूरे गांव
बादल फटने की इस घटना के बाद बोह घाटी का पूरा परिदृश्य ही बदल गया है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, इस भयावह आपदा से कुल 38 परिवार सीधे तौर पर प्रभावित हुए हैं। इसका मतलब है कि लगभग 200 लोग रातोंरात अपने आशियाने खो चुके हैं और बेघर हो गए हैं। बर्बादी का सबसे ज्यादा असर बोह घाटी के दो विशिष्ट गांवों पर पड़ा है। गढ़गूंन गांव में पानी और मलबे के तेज बहाव ने 12 परिवारों के मकानों को पूरी तरह से बहा दिया है। वहीं, इसके साथ लगते स्पैड़ा गांव का हाल भी ऐसा ही है, जहां 13 घर पूरी तरह से नष्ट होकर मलबे में दब चुके हैं।
नुकसान का यह आंकड़ा सिर्फ पूरी तरह तबाह हुए घरों तक ही सीमित नहीं है। प्रशासन ने पुष्टि की है कि इन दोनों गांवों में 9 अन्य मकान भी आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त हुए हैं। इसके अतिरिक्त 12 मकान ऐसे हैं जो अभी भी खतरे की जद में खड़े हैं और मौसम बिगड़ने पर कभी भी गिर सकते हैं। ग्रामीणों की आजीविका का मुख्य साधन रहे पशुधन को भी भारी नुकसान पहुंचा है। कई गौशालाएं मलबे के नीचे दब गई हैं। इसके अलावा प्रभावित परिवारों का सारा घरेलू सामान, रोजमर्रा का राशन और पहनने के कपड़े भी इसी भारी मलबे में दफन हो गए हैं।
राहत शिविर और विस्थापितों का इंतजाम
हालात की गंभीरता को देखते हुए स्थानीय प्रशासन ने एहतियात के तौर पर स्पैड़ा और गढ़गूंन दोनों गांवों को पूरी तरह से खाली करवा लिया है। जिन 200 लोगों के सिर से छत छिन गई है, उन्हें स्थानीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय में बनाए गए विशेष राहत शिविर में ठहराया गया है। सरकारी शिविर के अलावा कुछ प्रभावित परिवारों ने अपने रिश्तेदारों के घरों में भी शरण ली हुई है।
इन विस्थापित परिवारों की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए प्रशासनिक अमला लगातार काम कर रहा है। लोगों को राहत शिविरों में पहनने के कपड़े, खाना पकाने के बर्तन, राशन सामग्री और दैनिक उपयोग का हर जरूरी सामान उपलब्ध कराया जा रहा है ताकि इस मुश्किल वक्त में उनका जीवन किसी तरह चल सके।
वित्तीय सहायता और नई जमीन का वादा
इस भारी आपदा के तुरंत बाद, डीसी हेमराज बैरवा ने स्थिति का जायजा लेने के लिए प्रभावित क्षेत्रों का सघन दौरा किया। राहत और पुनर्वास कार्यों की समीक्षा करते हुए उन्होंने वित्तीय सहायता में बड़े इजाफे की घोषणा की। शुरुआत में प्रशासन ने पूरी तरह से नष्ट हुए मकानों के लिए 15 हजार रुपये की फौरी राहत देने का फैसला किया था। लेकिन मौके पर तबाही का भयावह मंजर देखने के बाद इस सहायता राशि को काफी बढ़ा दिया गया है। अब प्रभावित परिवारों को 50 हजार से लेकर एक लाख रुपये तक की नकद सहायता राशि बांटी जा रही है।
इसके साथ ही भविष्य के पुनर्वास को लेकर भी योजनाएं बनाई जा रही हैं। डीसी हेमराज बैरवा ने स्पष्ट किया कि मुख्यमंत्री सुक्खू और राजस्व मंत्री ने प्रभावित परिवारों की हरसंभव मदद करने का पक्का भरोसा दिया है। जिन परिवारों के मकान पूरी तरह बह गए हैं और जिनके पास अब रहने के लिए कोई सुरक्षित जमीन नहीं बची है, उनके लिए सरकार ने सरकारी भूमि चिह्नित कर ली है। प्रभावित लोगों से मांग पत्र मिलते ही उन्हें यह नई जमीन आवंटित करने की आधिकारिक प्रक्रिया तुरंत शुरू कर दी जाएगी। खुद मुख्यमंत्री सुक्खू भी बहुत जल्द इन प्रभावित गांवों का दौरा करके हालात का जायजा लेने वाले हैं।
सड़क संपर्क टूटा, मलबे में उतरी सेना
राहत और बचाव कार्यों के बीच सबसे बड़ी बाधा टूटी हुई सड़कें बन रही हैं। पंचायत मुख्यालय तक तो सड़क को किसी तरह बहाल कर दिया गया है, लेकिन उससे आगे का रास्ता अभी भी पूरी तरह कटा हुआ है। स्पैड़ा गांव तक पहुंचने के लिए बचाव कर्मियों को 10 से 15 मिनट पैदल चलना पड़ रहा है, जबकि गढ़गूंन पहुंचने के लिए 20 से 25 मिनट का दुर्गम पैदल सफर तय करना पड़ता है।
रास्ता खराब होने के कारण कोई भी भारी मशीनरी या बुलडोजर घटनास्थल तक नहीं पहुंच पा रहा है। इस वजह से मलबे को हटाने का पूरा काम हाथों से ही करना पड़ रहा है। प्रशासन के विशेष अनुरोध पर अब सेना की टीम ने भी मौके पर मोर्चा संभाल लिया है। सेना के जवान स्थानीय टीमों के साथ मिलकर हाथों से मलबा हटा रहे हैं और उसमें दबे लोगों के घरेलू सामान को सुरक्षित बाहर निकालने की भरपूर कोशिश कर रहे हैं।
खिसकती चट्टानों का खौफ और भविष्य की तैयारी
इतनी तबाही के बाद भी स्पैड़ा गांव पर खतरा टला नहीं है। गांव के ठीक ऊपर वाली पहाड़ी पर भूस्खलन के कारण दो से तीन बहुत विशाल चट्टानें बेहद अस्थिर स्थिति में लटकी हुई हैं, जो कभी भी नीचे गिर सकती हैं। प्रशासन की तकनीकी टीम ने इन खतरनाक चट्टानों का बारीकी से निरीक्षण कर लिया है। अब मौसम साफ होने का इंतजार किया जा रहा है। आसमान साफ होते ही नियंत्रित ब्लास्टिंग या मैनुअल चिपिंग तकनीक का इस्तेमाल करके इन चट्टानों को सावधानी से हटाया जाएगा ताकि भविष्य में कोई दूसरा बड़ा हादसा न हो।
डीसी हेमराज बैरवा ने तमाम सामाजिक संस्थाओं और दानदाताओं से एक विशेष अपील भी की है। उन्होंने कहा है कि लोग अपनी मर्जी से सामान भेजने के बजाय प्रशासन द्वारा तैयार की गई जरूरत की सूची के हिसाब से ही राहत सामग्री दान करें। इससे सही समय पर सही जरूरतमंद तक मदद पहुंच सकेगी। प्रशासन का मुख्य लक्ष्य इन बेघर हुए परिवारों को जल्द से जल्द उनके सामान्य जीवन में वापस लाना है।




















