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मंडी में सांसद कंगना रनौत के तीखे रुख पर सुक्खू सरकार हमलावर, मुख्यमंत्री के सलाहकार नरेश चौहान ने मर्यादित आचरण की दी सलाहहिमाचल प्रदेश
7 सित॰ 2026, 3:12 pm (49 मिनट पहले)· 2

मंडी में सांसद कंगना रनौत के तीखे रुख पर सुक्खू सरकार हमलावर, मुख्यमंत्री के सलाहकार नरेश चौहान ने मर्यादित आचरण की दी सलाह

दिशा समिति की बैठक के दौरान मंडी सांसद कंगना रनौत के आक्रामक रुख पर हिमाचल प्रदेश में राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। मुख्यमंत्री के प्रधान मीडिया सलाहकार नरेश चौहान ने सांसद के व्यवहार को गैर-संसदीय बताते हुए उन्हें सकारात्मक और मर्यादित रवैया अपनाने की नसीहत दी है।

हिमाचल प्रदेश की राजनीति में मंडी लोकसभा सीट से भारतीय जनता पार्टी की सांसद कंगना रनौत और प्रदेश सरकार के बीच जुबानी जंग तेज हो गई है। हाल ही में जिला विकास समन्वय और निगरानी समिति (दिशा) की बैठक में सांसद के उग्र तेवरों पर मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के प्रधान मीडिया सलाहकार नरेश चौहान ने तीखा हमला बोला है। उन्होंने सांसद के आचरण को अमर्यादित करार देते हुए प्रशासनिक और राजनीतिक शिष्टाचार बनाए रखने की सलाह दी है।

दिशा समिति की बैठक पर विवाद और चौहान का हमला

नरेश चौहान ने दिशा समिति की बैठक के घटनाक्रम का उल्लेख करते हुए कहा कि सार्वजनिक बैठकों में सांसद का व्यवहार लोकतांत्रिक गरिमा के अनुकूल नहीं था। उन्होंने कहा कि लगातार विवादों में घिरे रहने से सांसद के राजनीतिक अनुभव की कमी साफ झलकती है। चौहान के अनुसार, कंगना रनौत मूल रूप से सिनेमा जगत से संबंध रखती हैं और उन्हें राजनीति के क्षेत्र में जबरदस्ती लाया गया है। उन्होंने कहा कि मंडी और हिमाचल प्रदेश का प्रतिनिधित्व संसद में इस तरह से होना दुर्भाग्यपूर्ण है, क्योंकि सांसद के तौर-तरीकों और बयानों का नुकसान मंडी की जनता को उठाना पड़ रहा है और इससे पूरे प्रदेश की छवि भी प्रभावित होती है।

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सांसद निधि और प्रशासनिक समन्वय पर सवाल

सांसद निधि के कथित रूप से सही उपयोग न होने और विकास कार्यों में देरी पर कंगना रनौत द्वारा उठाए गए सवालों पर नरेश चौहान ने कहा कि किसी भी सांसद को प्रशासनिक कमियों को उजागर करने का पूरा अधिकार प्राप्त है। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि समीक्षा बैठकों का उद्देश्य हंगामा करना नहीं, बल्कि अधिकारियों के साथ योजनावार गंभीर चर्चा करना होता है।

चौहान ने सुझाव दिया कि सांसद को अधिकारियों से बिंदुवार सवाल पूछने चाहिए थे कि किस योजना में किस स्तर पर त्रुटि रही, उसके पीछे क्या कारण थे और उन्हें किस तरह दूर किया जा सकता है। अधिकारियों के साथ सार्वजनिक रूप से दुर्व्यवहार करने के स्थान पर एक जिम्मेदार जनप्रतिनिधि की तरह सभ्य और सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए। उन्होंने सांसद के इस रवैये को पब्लिसिटी स्टंट करार दिया।

कैग रिपोर्ट और राजनीतिक चंदे पर जांच की मांग

नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट पर विपक्ष के हमलों का जवाब देते हुए नरेश चौहान ने कहा कि हर साल आने वाली कैग रिपोर्ट में विभिन्न विभागों पर तकनीकी आपत्तियां और टिप्पणियां होती रहती हैं। उन्होंने प्रदेश की वित्तीय स्थिति के लिए पिछली सरकारों के कुप्रबंधन को जिम्मेदार ठहराया। चौहान ने आश्वासन दिया कि यदि रिपोर्ट में किसी पुराने मामले में वित्तीय सुधार या कार्रवाई की जरूरत पाई जाती है, तो सुक्खू सरकार उस पर ठोस कदम उठाएगी।

इसके अतिरिक्त, नरेश चौहान ने राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल उठाए। डिजिटल प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया पर प्रसारित हो रही खबरों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि यदि चंदे से जुड़ी अनियमितताओं के दावे सच हैं, तो यह राष्ट्र के लिए अत्यंत गंभीर विषय है। उन्होंने मांग की कि राजनीतिक दलों के वित्तीय स्रोतों की जांच के लिए संसद या सुप्रीम कोर्ट के स्तर पर एक उच्चस्तरीय समिति गठित की जानी चाहिए, हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि सोशल मीडिया पर चल रहे दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।

विपक्ष की भूमिका और बिजली परियोजनाओं का मुद्दा

पूर्व मुख्यमंत्री और नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर के उस बयान पर भी चौहान ने पलटवार किया, जिसमें उन्होंने भविष्य में सरकार बनने पर मौजूदा पांच साल के कार्यकाल की समीक्षा करने की बात कही थी। चौहान ने कहा कि विपक्ष की जिम्मेदारी केवल हर फैसले की आलोचना करना नहीं है, बल्कि प्रदेश के विकास के लिए सकारात्मक सुझाव देना भी है। उन्होंने कहा कि आने वाले चुनावों में हिमाचल की जनता स्वयं तय करेगी कि किस सरकार ने राज्य के हितों की सच्ची सेवा की है।

अंत में चौहान ने भाखड़ा ब्यास प्रबंध बोर्ड (बीबीएमबी) और जलविद्युत परियोजनाओं में हिमाचल के अधिकारों की लड़ाई का मुद्दा उठाया। उन्होंने आरोप लगाया कि जयराम ठाकुर के नेतृत्व वाली पिछली सरकार ने बिजली परियोजनाओं से जुड़े समझौतों में प्रदेश के दूरगामी हितों से समझौता किया था। चौहान ने स्पष्ट किया कि आने वाले समय में पावर प्रोजेक्ट्स, राज्य के अधिकार और पिछली सरकारों के फैसले प्रमुख चुनावी मुद्दे बनेंगे और अंतिम फैसला प्रदेश के मतदाता ही करेंगे।

सवाल-जवाब

दिशा समिति (DISHA) की बैठक में क्या विवाद हुआ था?
मंडी सांसद कंगना रनौत द्वारा विकास योजनाओं और सांसद निधि के कथित गैर-इस्तेमाल को लेकर कड़ा रुख अपनाने पर सुक्खू सरकार के साथ विवाद शुरू हुआ।
मुख्यमंत्री के सलाहकार नरेश चौहान ने सांसद कंगना रनौत पर क्या आरोप लगाए?
उन्होंने सांसद पर अमर्यादित व्यवहार का आरोप लगाते हुए कहा कि उन्हें राजनीति में जबरदस्ती लाया गया है और उनके बयानों से प्रदेश की छवि प्रभावित हो रही है।
सांसद निधि के मुद्दे पर सुक्खू सरकार ने क्या सलाह दी?
नरेश चौहान ने कहा कि कमियों को सार्वजनिक रूप से उठाने के बजाय अधिकारियों के साथ योजनावार बैठकर सकारात्मक चर्चा की जानी चाहिए।
कैग रिपोर्ट पर नरेश चौहान का क्या रुख रहा?
उन्होंने कहा कि कैग रिपोर्ट में हर साल आपत्तियां आती हैं और यदि किसी पुराने मामले में सुधार की आवश्यकता हुई तो सरकार निश्चित ही कार्रवाई करेगी।
राजनीतिक चंदे को लेकर क्या मांग की गई है?
चौहान ने राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे में पारदर्शिता लाने के लिए संसद या सुप्रीम कोर्ट के स्तर पर जांच समिति गठित करने की मांग की।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 2

Rohan Verma@rohan-verma·25 मिनट पहले

हिमाचल प्रदेश की इस राजनीतिक तनातनी से यह स्पष्ट होता है कि सांसद और प्रशासनिक मशीनरी के बीच समन्वय की कमी का सीधा असर क्षेत्रीय विकास पर पड़ रहा है। दिशा समिति जैसी महत्वपूर्ण बैठकों में इस तरह के टकराव से न केवल विकास कार्यों की गति धीमी होती है, बल्कि जनता के मुद्दों से ध्यान भटककर बहस व्यक्तिगत बयानों और राजनीतिक छींटाकशी तक सीमित रह जाती है। आने वाले समय में यदि इस गतिरोध को संवाद के जरिए नहीं सुलझाया गया, तो मंडी संसदीय क्षेत्र की बुनियादी परियोजनाओं को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·24 मिनट पहले

एक क्राइम और एडमिनिस्ट्रेटिव मामलों के रिपोर्टर के तौर पर, मेरा मानना है कि जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों के बीच सार्वजनिक मंचों पर इस तरह का टकराव जमीनी स्तर पर गवर्नेंस को कमजोर करता है। जब दिशा समिति जैसी वैधानिक निगरानी बैठकों में बहस गरिमा के दायरे से बाहर निकलकर व्यक्तिगत बयानों और तीखी झड़पों में बदल जाती है, तो इसका सीधा असर जनता के विकास कार्यों की मॉनिटरिंग पर पड़ता है। यदि इस गतिरोध को विधिवत संवाद और प्रशासनिक समन्वय के जरिए तुरंत नहीं सुलझाया गया, तो आने वाले दिनों में यह विवाद कानूनी और राजनीतिक शिकायतों का रूप ले सकता है, जिससे प्रशासनिक प्रक्रियाएं और अधिक बाधित होंगी।

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