हिमाचल प्रदेश के प्रमुख पर्वतारोही विशाल ठाकुर ने हिमालय की ज़ांस्कर रेंज में स्थित बेहद कठिन और तकनीकी रूप से चुनौतीपूर्ण नून पीक पर सफलता का परचम लहराया है। समुद्र तल से 23,409 फीट यानी 7,135 मीटर की ऊंचाई पर स्थित इस पर्वत चोटी को विशाल ठाकुर और उनके तीन अन्य सदस्यों वाले दल ने केवल चार दिनों की छोटी अवधि में फतह कर लिया। इस दल में महिला पर्वतारोही सहित कुल चार सदस्य शामिल थे, जिन्होंने प्रतिकूल मौसम और दुर्गम चढ़ाई का सामना करते हुए इस अभियान को बिना किसी हादसे के पूरा किया।
अभियान का पूरा घटनाक्रम और समय सीमा
इस कठिन पर्वतारोहण अभियान की शुरुआत कारगिल जिले में स्थित तांगोल गांव से हुई थी। चार सदस्यीय दल 26 अगस्त 2026 को तांगोल गांव से नून पीक की चढ़ाई के लिए रवाना हुआ था। इस टीम में विशाल ठाकुर के अलावा राहुल, निकिता ठाकुर और राकेश सिंह नेगी शामिल थे। चारों सदस्यों ने आपसी समन्वय और उत्कृष्ट शारीरिक क्षमता का प्रदर्शन करते हुए निर्धारित मार्ग से नून पीक के शिखर तक पहुंचने में सफलता पाई। शिखर पर तिरंगा फहराने के बाद पूरी टीम 30 अगस्त 2026 को सुरक्षित रूप से वापस तांगोल गांव लौट आई, जिसके साथ ही यह ऐतिहासिक चढ़ाई संपन्न हुई।
नून पीक का इतिहास और तकनीकी चुनौतियां
नून पीक ज़ांस्कर रेंज के प्रसिद्ध नून कुन मैसिफ का सर्वोच्च बिंदु है। इसी पर्वत समूह में नून पीक की बहन मानी जाने वाली माउंट कुन चोटी भी स्थित है, जिसकी ऊंचाई 7,077 मीटर है। नून कुन मैसिफ के इतिहास पर नजर डालें तो इस क्षेत्र में पहला सफल पर्वतारोहण वर्ष 1953 में एक स्विस अभियान दल द्वारा किया गया था। तब से लेकर आज तक यह संपूर्ण इलाका वैश्विक पर्वतारोहियों के लिए भारतीय हिमालय के सबसे प्रतिष्ठित और कठिन ट्रैक्स में गिना जाता है।
नून पीक को अंतरराष्ट्रीय पर्वतारोहण मानकों के अनुसार एक उच्च तकनीकी श्रेणी की चोटी माना जाता है। 7,000 मीटर से अधिक की ऊंचाई पर पर्वतारोहियों को अत्यंत कम ऑक्सीजन, बर्फीली हवाएं, अप्रत्याशित मौसम बदलाव और खड़ी बर्फ की दीवारों का सामना करना पड़ता है। ऐसी परिस्थितियों में केवल साधारण ट्रैकिंग का अनुभव काफी नहीं होता, बल्कि विशेष पर्वतारोहण उपकरणों का सही उपयोग, तकनीकी क्लाइंबिंग स्किल्स और विपरीत समय में सही फैसले लेने की परिपक्वता आवश्यक होती है।
अनुमति, प्रशिक्षण और विशाल ठाकुर का करियर
इस जोखिम भरे अभियान को अंजाम देने से पहले टीम ने नई दिल्ली स्थित इंडियन माउंटेनियरिंग फाउंडेशन से नियमानुसार सभी जरूरी परमिट और कानूनी स्वीकृतियां प्राप्त की थीं। विशाल ठाकुर मूल रूप से हिमाचल प्रदेश के हमीरपुर जिले के रहने वाले हैं और वर्तमान में चंडीगढ़ में निवास करते हैं। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत सामान्य ट्रैकिंग से की थी, लेकिन बाद में उन्होंने इसे पूर्णकालिक करियर के रूप में अपनाया।
विशाल ठाकुर ने पर्वतारोहण का औपचारिक और कठिन प्रशिक्षण उत्तरकाशी स्थित प्रतिष्ठित नेहरू इंस्टीट्यूट ऑफ माउंटेनियरिंग से प्राप्त किया है। वे अब नए पर्वतारोहियों को प्रशिक्षण देने का कार्य भी करते हैं। नून पीक से पहले विशाल ठाकुर कई अन्य प्रसिद्ध अभियानों को सफलतापूर्वक अंजाम दे चुके हैं। पिछले वर्ष उन्होंने हिमाचल प्रदेश के स्पीति क्षेत्र में स्थित मणिरंग पीक को रिकॉर्ड समय में फतह किया था। इसके अतिरिक्त वे उत्तराखंड की कठिन मानी जाने वाली ब्लैक पीक, मनाली की फ्रेंडशिप पीक और लद्दाख की युनाम पीक पर भी सफलतापूर्वक चढ़ाई कर चुके हैं।
टीमवर्क और भारतीय माउंटेनियरिंग का भविष्य
अभियान की सफलता पर बात करते हुए विशाल ठाकुर ने बताया कि इतनी ऊंचाई पर पहाड़ हर क्षण आपकी परीक्षा लेता है। विशाल ठाकुर ने कहा, “चार दिनों में अभियान पूरा करना और पूरी टीम के साथ सुरक्षित वापस लौटना मेरे लिए इस सफलता का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है।”
विशाल ठाकुर का मानना है कि भारतीय हिमालयी क्षेत्र में विश्व स्तरीय पर्वतारोहण केंद्र बनने की अपार क्षमताएं मौजूद हैं। वे अपने अभियानों और प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से भारत में युवाओं को तकनीकी पर्वतारोहण के प्रति जागरूक कर रहे हैं, ताकि देश में एक मजबूत और सुरक्षित माउंटेनियरिंग संस्कृति का निर्माण हो सके।



















