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प्रदर्शन करना संवैधानिक हक, फिर पुलिस से मंजूरी क्यों जरूरी: हिरासत और गिरफ्तारी में क्या फर्क है, जानिए अपने कानूनी अधिकारपड़ताल
10 अक्तू॰ 2026, 10:49 pm (1 घंटे पहले)· 0

प्रदर्शन करना संवैधानिक हक, फिर पुलिस से मंजूरी क्यों जरूरी: हिरासत और गिरफ्तारी में क्या फर्क है, जानिए अपने कानूनी अधिकार

दिल्ली में 10 अक्टूबर को आयोजित प्रदर्शन के दौरान कई नेताओं और कार्यकर्ताओं को पुलिस द्वारा रोके जाने के बाद शांतिपूर्ण प्रदर्शन, अनुमति की अनिवार्यता, निषेधाज्ञा और हिरासत से जुड़े कानूनी प्रावधानों पर महत्वपूर्ण कानूनी ब्योरा सामने आया है।

लोकतांत्रिक व्यवस्था में असहमति दर्ज कराना और शांतिपूर्ण सभा करना नागरिकों का अहम अधिकार माना जाता है, लेकिन अक्सर पुलिस सुरक्षा व्यवस्था या कानून का हवाला देकर प्रदर्शनकारियों को रोक देती है। दिल्ली में 10 अक्टूबर को कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन के दौरान पुलिस की कार्रवाई के बाद यह कानूनी बहस एक बार फिर तेज हो गई है। इस कार्रवाई के तहत अभिजीत दीपके, सौरव दास और आशुतोष रांका को उड़ान से उतारा गया, जबकि अरविंद केजरीवाल, ममता बनर्जी और पिनाराई विजयन जैसे पूर्व मुख्यमंत्रियों को हिरासत में लिया गया। पुलिस का तर्क है कि इस कार्यक्रम के लिए पूर्व अनुमति नहीं दी गई थी और नई दिल्ली इलाके में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता यानी बीएनएसएस की धारा 163 प्रभावी थी। इसके विपरीत प्रदर्शनकारियों का कहना है कि शांतिपूर्वक अपनी बात रखना प्रत्येक नागरिक का बुनियादी अधिकार है। ऐसे में यह समझना आवश्यक हो जाता है कि संविधान इस अधिकार को किस सीमा तक मान्यता देता है, अनुमति की कानूनी भूमिका क्या है, और हिरासत व गिरफ्तारी के दौरान नागरिकों के पास क्या सुरक्षा उपाय मौजूद होते हैं।

संवैधानिक प्रावधान: शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार और उसकी सीमाएं

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(ए) देश के नागरिकों को अभिव्यक्ति और भाषण की स्वतंत्रता प्रदान करता है। इसी के साथ अनुच्छेद 19(1)(बी) बिना हथियारों के शांतिपूर्वक एकत्र होने का अधिकार सुनिश्चित करता है। इन प्रावधानों के आधार पर नागरिकों को अपनी मांगों या असहमति को शांतिपूर्ण ढंग से सार्वजनिक मंचों पर रखने की पूरी स्वतंत्रता मिलती है।

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हालांकि, संविधान में यह अधिकार असीमित नहीं रखा गया है। अनुच्छेद 19(3) में स्पष्ट किया गया है कि सार्वजनिक व्यवस्था और लोक शांति के हित में सरकार इस अधिकार पर युक्तिसंगत प्रतिबंध लगा सकती है। इसका अर्थ यह है कि जहां नागरिकों को अपनी बात कहने की छूट है, वहीं प्रशासन के पास कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए नियम तय करने का अधिकार भी सुरक्षित है।

प्रदर्शन के लिए पुलिस अनुमति की अनिवार्यता और कानूनी स्थिति

प्रदर्शन से पहले पुलिस अनुमति लेने की व्यवस्था को सुप्रीम कोर्ट भी स्पष्ट कर चुका है। वर्ष 2018 में मजदूर किसान शक्ति संगठन (एमकेएसएस) बनाम भारत सरकार के मामले में शीर्ष अदालत ने यह व्यवस्था दी थी कि शांतिपूर्ण ढंग से अपनी शिकायतें उचित मंच तक पहुंचाना बुनियादी अधिकार है। इसी के साथ कोर्ट ने यह भी माना कि पुलिस आयुक्त या अधिकृत अधिकारी से पूर्व अनुमति मांगने की प्रणाली लागू की जा सकती है।

सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता भरत चुघ के अनुसार अनुमति लेने की प्रक्रिया का प्राथमिक उद्देश्य सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम करना होता है, न कि किसी जायज प्रदर्शन को पूरी तरह रोकना। इसके अतिरिक्त, प्रशासन या पुलिस को अनुमति से जुड़े अपने प्रत्येक निर्णय के पीछे कानूनी रूप से वैध कारण स्पष्ट करने होते हैं।

दिल्ली पुलिस के नियम: आवेदन का समय और स्थान सीमा

दिल्ली पुलिस के स्टैंडिंग ऑर्डर के तहत राष्ट्रीय राजधानी में किसी भी प्रदर्शन के आयोजन के लिए नियम तय किए गए हैं। सामान्य प्रक्रिया के अनुसार आयोजकों को कार्यक्रम की तारीख से कम से कम 10 दिन पहले पुलिस उपायुक्त यानी डीसीपी के समक्ष आवेदन प्रस्तुत करना होता है।

यदि किसी स्थिति में 10 दिन से कम समय में आवेदन दिया जाता है, तो उस पर भी विचार किया जा सकता है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि संबंधित स्थान पर जगह उपलब्ध है या नहीं और पुलिस के पास आवश्यक व्यवस्थाएं करने के लिए पर्याप्त समय बचा है। इसका अर्थ यह है कि 10 दिन की समयसीमा अपने आप में कोई पूर्ण रुकावट नहीं है।

अनुमति के आवेदनों पर पहले आओ, पहले पाओ के सिद्धांत के आधार पर विचार किया जाता है। निर्णय लेने से पहले स्पेशल ब्रांच, ट्रैफिक पुलिस और नई दिल्ली जिला पुलिस से विस्तृत रिपोर्ट मांगी जाती है। डीसीपी इस बात की समीक्षा करते हैं कि प्रस्तावित प्रदर्शन से यातायात बाधित होगा या नहीं, और क्या इससे सार्वजनिक शांति या सुरक्षा को कोई खतरा उत्पन्न हो सकता है।

स्थान की दृष्टि से जंतर मंतर पर अधिकतम 1,000 लोगों के एकत्र होने की अनुमति दी जाती है। यदि प्रदर्शनकारियों की संख्या इससे अधिक होने की संभावना हो, तो रामलीला मैदान का विकल्प रखा जाता है, जहां 50,000 लोगों के जुटने की क्षमता दर्ज है। 10 अक्टूबर के इस मामले में पुलिस का कहना है कि सीजेपी ने 7 अक्टूबर को आवेदन दिया था, जो कि आयोजन से महज तीन दिन पहले था, और इसी आधार पर अनुमति अस्वीकार की गई।

अनुमति निरस्त होने पर आयोजकों के पास उपलब्ध कानूनी रास्ते

यदि पुलिस प्रशासन किसी प्रदर्शन की अनुमति देने से इनकार कर देता है, तो आयोजकों के सामने दो मुख्य कानूनी रास्ते होते हैं। पहला रास्ता पुलिस के समक्ष दोबारा संपर्क करने का है। आयोजक पुलिस द्वारा गिनाए गए अस्वीकृति के कारणों का समाधान प्रस्तुत कर सकते हैं, जैसे भीड़ की संख्या सीमित करना, कार्यक्रम का समय घटाना या किसी अन्य स्थान का प्रस्ताव रखना।

दूसरा रास्ता न्यायपालिका का दरवाजा खटखटाने का है। स्टैंडिंग ऑर्डर में हालांकि डीसीपी के निर्णय को अंतिम और बाध्यकारी बताया गया है और किसी अलग अपील का प्रावधान नहीं दिया गया है, लेकिन यदि आयोजकों को लगता है कि निर्णय मनमाना है या शांतिपूर्ण सभा के अधिकार का हनन करता है, तो वे संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत दिल्ली उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर सकते हैं।

धारा 163 की प्रकृति और इसे अदालत में चुनौती देने की प्रक्रिया

प्रशासन किसी क्षेत्र में प्रदर्शन को नियंत्रित करने या रोकने के लिए निषेधाज्ञा का भी उपयोग करता है। यह प्रावधान पहले दंड प्रक्रिया संहिता यानी सीआरपीसी की धारा 144 के रूप में जाना जाता था, जो अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 163 के तहत लागू होता है। इस नियम के अंतर्गत मजिस्ट्रेट एक लिखित आदेश जारी कर किसी क्षेत्र में पांच या उससे अधिक लोगों के जमावड़े पर रोक लगा सकता है। दिल्ली पुलिस ने 2 अक्टूबर को पूरी नई दिल्ली में धारा 163 लागू की थी।

इस आदेश के खिलाफ भी कानूनी सुरक्षा मौजूद है। बीएनएसएस की धारा 163(5) के तहत कोई भी प्रभावित व्यक्ति संबंधित आदेश जारी करने वाले मजिस्ट्रेट के समक्ष इसे रद्द करने या संशोधित करने का आवेदन कर सकता है। मजिस्ट्रेट को इस आवेदन पर त्वरित सुनवाई का अवसर देना अनिवार्य होता है, और यदि वह आवेदन खारिज करता है, तो उसे इसके लिखित कारण दर्ज करने पड़ते हैं।

सुप्रीम कोर्ट के वकील विराग गुप्ता का कहना है कि यदि धारा 163 को चुनौती देने के बाद भी उसे रद्द करने का कोई आदेश नहीं आता है, तो पांच से अधिक लोगों का जुटना या प्रदर्शन करना गैरकानूनी माना जाता है। हालांकि, धारा 163 को उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय में भी चुनौती दी जा सकती है, जिसमें विरोध प्रदर्शन के संवैधानिक अधिकार, इंटरनेट बंदी और सार्वजनिक परिवहन रोकने से आम जनता के बुनियादी अधिकारों के उल्लंघन जैसे आधार शामिल हो सकते हैं।

अदालतें पहले भी स्पष्ट कर चुकी हैं कि इस तरह की निषेधाज्ञा मनमाने तरीके से लागू नहीं की जा सकती। वर्ष 2012 के रामलीला मैदान मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि इस प्रकार के निवारक कदम वास्तविक और गंभीर खतरे की स्थिति में ही पूरी सावधानी के साथ उठाए जाने चाहिए। इससे पहले 1961 के बाबूलाल पराते मामले में भी संविधान पीठ ने माना था कि प्रभावित नागरिकों को मजिस्ट्रेट के आदेश को चुनौती देने का पूरा अधिकार है।

बिना अनुमति प्रदर्शन करने के संभावित कानूनी परिणाम

यदि तय प्रक्रिया और अनुमति के बिना कोई प्रदर्शन आयोजित किया जाता है, तो कानून के तहत दंडात्मक कदम उठाए जा सकते हैं। सरकारी आदेश की जानबूझकर अवज्ञा करने पर भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 223 के तहत मामला दर्ज किया जा सकता है। यह प्रावधान पूर्ववर्ती भारतीय दंड संहिता यानी आईपीसी की धारा 188 का नया रूप है, जिसमें कारावास या जुर्माने की सजा हो सकती है। इसके अलावा पुलिस भीड़ को तितर-बितर करने के लिए लोगों को हिरासत में ले सकती है और उन्हें बिना कोई मामला दर्ज किए दूर किसी इलाके में छोड़ भी सकती है।

प्रदर्शन के दौरान पुलिस वीडियो रिकॉर्डिंग भी करती है। स्टैंडिंग ऑर्डर के नियमों के अनुसार नियमों के उल्लंघन का पूरा रिकॉर्ड सुरक्षित रखा जाता है, जिसका उपयोग भविष्य में उस संगठन या व्यक्ति को नई अनुमति देने के फैसले के दौरान किया जा सकता है।

हिरासत और गिरफ्तारी: कानूनी अंतर और पुलिसिया प्रक्रिया

अक्सर प्रदर्शनों के दौरान हिरासत और गिरफ्तारी के बीच भ्रम पैदा होता है। गिरफ्तारी एक औपचारिक कानूनी प्रक्रिया है, जिसमें पुलिस किसी अपराध के सिलसिले में व्यक्ति को आधिकारिक रूप से पकड़ती है और आपराधिक कार्यवाही शुरू हो जाती है। इसके साथ ही संविधान और कानून द्वारा दिए गए सभी सुरक्षा अधिकार तुरंत लागू हो जाते हैं।

इसके विपरीत, बीएनएसएस में कस्टडी यानी पुलिस अभिरक्षा शब्द की कोई सीधी परिभाषा नहीं दी गई है। कानून पुलिस को अधिकार देता है कि वह शांति बनाए रखने के लिए लोगों को रोक सकती है, मौके से हटा सकती है या कुछ समय के लिए अपने पास रख सकती है। प्रदर्शनों के दौरान आमतौर पर यही होता है, जहां लोगों को कुछ घंटों के लिए बसों में रखकर थाने या अस्थायी केंद्र ले जाया जाता है, कोई एफआईआर दर्ज नहीं होती और शाम तक रिहा कर दिया जाता है। प्रदर्शनकारियों को यह गिरफ्तारी जैसी लगती है, लेकिन पुलिस इसे एहतियाती कदम बताती है ताकि औपचारिक गिरफ्तारी से जुड़ी अदालती निगरानी से बचा जा सके। वरिष्ठ अधिवक्ता संजय हेगड़े के अनुसार कस्टडी में मौजूद लोगों को जाने की इजाजत नहीं होती, फिर भी वे औपचारिक रूप से गिरफ्तार नहीं माने जाते।

बीएनएसएस की धारा 170 के तहत यदि पुलिस को लगता है कि कोई व्यक्ति कोई संज्ञेय अपराध करने की योजना बना रहा है और उसे किसी अन्य तरीके से नहीं रोका जा सकता, तो वह बिना मजिस्ट्रेट के आदेश या वारंट के उसे गिरफ्तार कर सकती है। संज्ञेय अपराध वह होता है जिसमें पुलिस बिना वारंट गिरफ्तारी करने का अधिकार रखती है। वहीं बीएनएसएस की धारा 172 के तहत पुलिस ऐसे व्यक्ति को हटा सकती है या हिरासत में ले सकती है जो कानूनी निर्देश मानने से इनकार करता है। इसके बाद उसे मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना होता है या छोटे मामलों में 24 घंटे के भीतर छोड़ना पड़ता है। आमतौर पर प्रदर्शनकारियों को बसों में भरकर नरेला या किंग्सवे कैंप जैसी जगहों पर ले जाने की कार्रवाई किसी तय कानूनी प्रावधान के तहत दर्ज नहीं होती।

हिरासत या गिरफ्तारी के समय नागरिक के बुनियादी अधिकार

जब किसी व्यक्ति को पुलिस पकड़ती है, तो उसके पास कानूनन कई अहम अधिकार होते हैं

  • 24 घंटे के भीतर पेशी: संविधान के अनुच्छेद 22 के अनुसार गिरफ्तार किए गए किसी भी व्यक्ति को 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना अनिवार्य होता है।
  • कारण जानने का अधिकार: सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों के तहत गिरफ्तारी का आधार लिखित में बताना आवश्यक है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि अनुच्छेद 22 के सुरक्षा नियमों का उल्लंघन करने वाली गिरफ्तारी असंवैधानिक मानी जाएगी।
  • वकील से परामर्श का अधिकार: पकड़े गए व्यक्ति को अपनी पसंद के वकील से मिलने और कानूनी मदद लेने की पूरी छूट होती है। यदि कोई व्यक्ति वकील का खर्च वहन नहीं कर सकता, तो उसे मुफ्त कानूनी सहायता दी जाती है। बीएनएसएस की धारा 38 पूछताछ के दौरान वकील से मिलने की सुविधा देती है, हालांकि वकील पूरी पूछताछ के दौरान लगातार उपस्थित रहने का दावा नहीं कर सकता।
  • महिलाओं के लिए विशेष सुरक्षा: बीएनएसएस की धारा 43(5) के अनुसार किसी भी महिला को सूर्यास्त के बाद और सूर्योदय से पहले गिरफ्तार नहीं किया जा सकता। अत्यंत असाधारण परिस्थितियों में न्यायिक मजिस्ट्रेट की पूर्व अनुमति से ही ऐसा किया जा सकता है।
  • डी.के. बसु दिशानिर्देश (1997): ये दिशानिर्देश गिरफ्तारी और हिरासत दोनों स्थितियों में लागू होते हैं। कार्रवाई करने वाले पुलिस अधिकारी की नेम प्लेट स्पष्ट रूप से दिखनी चाहिए, गवाह की मौजूदगी में अरेस्ट मेमो तैयार होना चाहिए, चोटों का मेडिकल रिकॉर्ड दर्ज होना चाहिए और परिवार को तुरंत सूचित किया जाना चाहिए। अदालत साफ कर चुकी है कि इन नियमों की अनदेखी पर विभागीय कार्रवाई या अवमानना की प्रक्रिया शुरू हो सकती है।

सवाल-जवाब

क्या भारत में बिना पुलिस अनुमति के विरोध प्रदर्शन किया जा सकता है?
नहीं, सुप्रीम कोर्ट के 2018 के फैसले के अनुसार शांतिपूर्ण प्रदर्शन बुनियादी अधिकार है, लेकिन प्रशासन सुरक्षा और व्यवस्था के लिए पूर्व अनुमति की व्यवस्था लागू कर सकता है।
दिल्ली में प्रदर्शन की अनुमति के लिए कितने दिन पहले आवेदन करना होता है?
दिल्ली पुलिस के स्टैंडिंग ऑर्डर के अनुसार आयोजन से कम से कम 10 दिन पहले डीसीपी के पास आवेदन देना होता है, हालांकि विशेष परिस्थितियों में देर से आए आवेदनों पर भी विचार हो सकता है।
जंतर मंतर और रामलीला मैदान में अधिकतम कितने लोगों को प्रदर्शन की अनुमति है?
जंतर मंतर पर अधिकतम 1,000 लोगों के जमावड़े की अनुमति होती है, जबकि अधिक भीड़ होने पर 50,000 की क्षमता वाले रामलीला मैदान का विकल्प दिया जाता है।
हिरासत और औपचारिक गिरफ्तारी में मुख्य अंतर क्या होता है?
गिरफ्तारी में व्यक्ति के खिलाफ कानूनी अपराध दर्ज कर अदालती प्रक्रिया शुरू होती है, जबकि हिरासत में शांति व्यवस्था के लिए व्यक्ति को कुछ समय रोककर बिना केस दर्ज किए छोड़ दिया जाता है।
बीएनएसएस की धारा 163 क्या है और यह पुराने किस कानून की जगह आई है?
यह पूर्ववर्ती सीआरपीसी की धारा 144 का नया स्वरूप है, जिसके तहत मजिस्ट्रेट किसी इलाके में पांच या उससे अधिक लोगों के जुटने पर निषेधाज्ञा जारी कर सकता है।
क्या किसी महिला को रात के समय गिरफ्तार किया जा सकता है?
बीएनएसएस की धारा 43(5) के तहत सूर्यास्त के बाद और सूर्योदय से पहले महिला को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता, केवल न्यायिक मजिस्ट्रेट की विशेष पूर्व अनुमति से ही अपवाद संभव है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

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