देवघर जैसे इलाकों में किसान अब पारंपरिक फसलों के साथ-साथ ऐसे विकल्प तलाश रहे हैं जो कम समय में जेब भर सकें, और पैडी स्ट्रॉ मशरूम यानी पुआल मशरूम की खेती इसी कड़ी में सबसे आसान और सस्ता जरिया बनकर उभर रही है।
पारंपरिक खेती के साथ अतिरिक्त कमाई की तलाश
धान, गेहूं और सब्जियों तक सिमटी खेती अब बदल रही है। कोई किसान पशुपालन की तरफ रुख कर रहा है तो कोई मशरूम उत्पादन को कमाई का दूसरा रास्ता बना रहा है। खासकर वे फसलें और उत्पाद किसानों को ज्यादा पसंद आ रहे हैं जो कम समय में तैयार हो जाएं और जिनमें निवेश भी सीमित हो। इसी वजह से पुआल मशरूम की खेती की तरफ किसानों का ध्यान तेजी से बढ़ रहा है, क्योंकि इसमें लागत कम है और मुनाफा जल्दी मिलने लगता है।
कौन सी मशरूम प्रजाति है सबसे आसान
देवघर के मशरूम विशेषज्ञ रंजीत झा के मुताबिक मशरूम की कई किस्में हैं और हर किस्म को अलग मौसम और परिस्थितियों की जरूरत होती है। बटन मशरूम, ऑयस्टर मशरूम और पैडी स्ट्रॉ मशरूम इनमें सबसे ज्यादा उगाई जाने वाली प्रजातियां हैं। इनमें पैडी स्ट्रॉ मशरूम की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह बहुत जल्दी तैयार हो जाता है और इसके लिए धान की पुआल का इस्तेमाल होता है, जो गांवों में लगभग हर किसान के घर पहले से मौजूद रहती है। यही वजह है कि इसे शुरू करने के लिए किसानों को अलग से कोई बड़ा खर्च नहीं उठाना पड़ता, वे अपने खेत के ही संसाधनों से इसकी शुरुआत कर सकते हैं।
बड़े फार्म की जरूरत नहीं, एक कमरा ही काफी
रंजीत झा बताते हैं कि पुआल मशरूम की खेती के लिए महंगे या बड़े फार्म की कोई जरूरत नहीं होती। किसान अपने घर के किसी साफ-सुथरे कमरे में या एक छोटे नियंत्रित पॉलीहाउस में भी इसकी व्यवस्था कर सकते हैं। जगह चुनते समय इस बात का खास ध्यान रखना चाहिए कि वहां हवा का आना-जाना ठीक से हो, लेकिन सीधी तेज धूप मशरूम के बेड पर न पड़े। इस मशरूम के लिए गर्म वातावरण मुफीद माना जाता है और 30 से 35 डिग्री सेल्सियस के बीच का तापमान इसकी बढ़वार के लिए सबसे अच्छा रहता है।
पुआल भिगोने से बेड बनाने तक की पूरी प्रक्रिया
इस खेती में सबसे अहम भूमिका धान के पुआल की ही होती है। सबसे पहले पुआल को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटा जाता है और फिर उसे कुछ घंटों के लिए पानी में भिगो दिया जाता है। भिगोने के बाद पुआल को बाहर निकालकर उसका अतिरिक्त पानी निकाल दिया जाता है, ताकि वह पूरी तरह गीला न रहे। हालांकि इस दौरान यह ध्यान रखना जरूरी होता है कि पुआल पूरी तरह सूखा भी न हो, उसमें जरूरत के मुताबिक नमी बनी रहनी चाहिए। इसके बाद एक साफ जगह पर इसी नम पुआल की मदद से बेड तैयार किए जाते हैं। बेड बनाते समय पहले पुआल की एक परत बिछाई जाती है, फिर उसके ऊपर मशरूम का बीज यानी स्पॉन डाला जाता है। इसी तरीके से पुआल और स्पॉन की कई परतें एक के ऊपर एक जमाई जाती हैं और अंत में बेड को अच्छी तरह दबाकर व्यवस्थित किया जाता है, जिससे उसमें नमी और तापमान दोनों का संतुलन बना रहे। किसान अपने कमरे के आकार के हिसाब से एक साथ कई बेड तैयार कर सकते हैं, लेकिन इसकी सफलता पूरी तरह सफाई, सही नमी और नियमित देखभाल पर टिकी होती है।
सिर्फ 10 से 15 दिन में शुरू हो जाएगी कमाई
पैडी स्ट्रॉ मशरूम की सबसे खास बात यह है कि इसमें ज्यादा दिनों तक इंतजार नहीं करना पड़ता। अगर तापमान और नमी जैसी परिस्थितियां अनुकूल रहें, तो बेड तैयार करने के करीब 10 से 15 दिनों के भीतर ही मशरूम निकलना शुरू हो जाता है। रंजीत झा के मुताबिक तैयार मशरूम की तुड़ाई सही समय पर करना बेहद जरूरी है, वरना उसकी गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है। एक बेड से भी किसान को अच्छी मात्रा में उत्पादन मिल सकता है, जिसे स्थानीय बाजार में बेचकर वे अपनी अतिरिक्त कमाई कर सकते हैं।
देवघर के किसानों के लिए क्यों है फायदे का सौदा
देवघर और आसपास के इलाकों के किसानों के लिए यह खेती खासतौर पर मुफीद साबित हो सकती है। इसकी सबसे बड़ी वजह है कि इसमें बहुत ज्यादा जगह नहीं चाहिए, पुआल स्थानीय स्तर पर आसानी से मिल जाता है और फसल भी बहुत कम समय में तैयार हो जाती है। हालांकि विशेषज्ञ यह सलाह भी देते हैं कि खेती शुरू करने से पहले किसान मशरूम विशेषज्ञों से बाकायदा प्रशिक्षण लें और सही तकनीकी जानकारी हासिल करें, ताकि शुरुआत में ही किसी गलती से नुकसान न हो। अगर सही देखभाल और बाजार की सही योजना के साथ इसे किया जाए, तो पुआल मशरूम की खेती परंपरागत खेती के साथ-साथ किसानों के लिए कमाई का एक नया और भरोसेमंद रास्ता खोल सकती है।



















