जमशेदपुर के कागल नगर क्षेत्र में सुबह की शुरुआत होते ही खान-पान के शौकीनों की हलचल शुरू हो जाती है। कागल नगर पार्क के ठीक सामने रोजाना सुबह 7:30 बजे एक छोटा सा नाश्ता स्टॉल सजता है, जहां पिछले 10 वर्षों से राजेश लोगों को गरमा-गरम और खस्ता छोला-भटूरा परोस रहे हैं। सूरज ढलने से पहले ही यहां सुबह-सुबह ग्राहकों का तांता लगने लगता है। केवल आसपास के रहने वाले ही नहीं, बल्कि शहर के दूर-दराज इलाकों से भी लोग खासतौर पर यहां के खास छोले का स्वाद चखने के लिए पहुंचते हैं। स्थानीय लोगों के मुताबिक राजेश के छोले का स्वाद पारंपरिक छोलों से काफी अलग और यादगार होता है।
भुने हुए मसालों से तैयार होता है खास स्वाद
राजेश की इस 10 साल पुरानी दुकान की सफलता का सबसे बड़ा रहस्य उनकी रसोई में इस्तेमाल होने वाली विशेष मसाला रेसिपी है। राजेश बताते हैं कि वे बाजार के बने-बनाये मसालों पर निर्भर रहने के बजाय खुद मसाले तैयार करते हैं। छोले में डालने से पहले वे खड़े मसालों को धीमी आंच पर अच्छी तरह गर्म यानी भूनते हैं। इसके बाद उन्हें पीसकर छोले में मिलाया जाता है। इस पारंपरिक तरीके से मसालों का तेल और प्राकृतिक सुगंध सक्रिय हो जाती है, जिससे छोले में एक अनूठी महक और गहरा स्वाद आता है। यही खास स्वाद पिछले एक दशक से लोगों को इस स्टॉल की ओर खींच रहा है।
20 रुपये से 40 रुपये तक की यात्रा
स्टॉल के शुरुआती दिनों को याद करते हुए राजेश कहते हैं कि जब उन्होंने 10 साल पहले कागल नगर पार्क के पास यह काम शुरू किया था, तब एक प्लेट छोला-भटूरा की कीमत सिर्फ 20 रुपये हुआ करती थी। समय बीतने के साथ-साथ कच्चे माल, कुकिंग ऑयल और ईंधन की कीमतों में इजाफा हुआ, जिससे उन्हें भी प्लेट के दाम बढ़ाने पड़े। वर्तमान में एक प्लेट छोला-भटूरा 40 रुपये में मिलता है। इस वाजिब दाम में ग्राहकों को दो बड़े, फूले हुए और खस्ता भटूरे दिए जाते हैं। भटूरों के साथ गाढ़े और मसालेदार छोले, तीखा अचार, कटा हुआ कच्चा प्याज और तीखी हरी मिर्च परोसी जाती है। कम पैसों में पेट भरने वाला स्वादिष्ट और ताजा नाश्ता मिलने के कारण यहां हर वर्ग के लोग आते हैं।
ग्राहकों की पहली पसंद बना पार्क के सामने का स्टॉल
यहां नियमित रूप से नाश्ता करने वाले ग्राहक हर्ष का कहना है कि उन्होंने जमशेदपुर शहर के कई प्रसिद्ध रेस्टोरेंट और दुकानों पर छोला-भटूरा खाया है, लेकिन जो स्वाद और सुगंध राजेश के स्टॉल पर मिलती है, वह कहीं और नहीं है। हर्ष बताते हैं कि जैसे ही छोले की गर्म प्लेट सामने आती है, भुने हुए मसालों की मनमोहक सुगंध भूख को और बढ़ा देती है। स्वाद इतना बेजोड़ है कि वे हफ्ते में कई बार यहां खींचे चले आते हैं। राजेश के अनुसार, 10 सालों के इस सफर में उनके कई ग्राहक अब परिवार के सदस्य जैसे बन चुके हैं। कई लोग तो रोजाना सुबह वॉक के बाद सीधे यहीं नाश्ता करने पहुंचते हैं। छोटा सा यह ठेला आज अपने खास जायके के कारण पूरे इलाके का लैंडमार्क बन चुका है।


















