झारखंड के बोकारो और चास इलाके में किसान बड़े स्तर पर शकरकंद की खेती करते हैं. मानसूनी मौसम की लगातार बारिश के दौरान इस नकदी फसल में कई तरह के गंभीर संक्रमण और बीमारियां फैलने का जोखिम काफी बढ़ जाता है. अगर समय रहते इन विकृतियों की पहचान कर उचित कदम न उठाए जाएं, तो पैदावार गिरने से किसानों को भारी आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ सकता है. इसी संदर्भ में बोकारो चास के तकनीकी कृषि प्रबंधक संदीप कुमार ने शकरकंद की फसल को नुकसान पहुंचाने वाले मुख्य रोगों, उनके विशिष्ट लक्षणों तथा बचाव के वैज्ञानिक उपायों का विवरण साझा किया है.
फ्यूजेरियम विल्ट और गलन रोग से बचाव के तरीके
बरसात के दिनों में शकरकंद के खेतों में सबसे ज्यादा नुकसान गलन रोग के कारण दर्ज किया जाता है. तकनीकी कृषि प्रबंधक संदीप कुमार के मुताबिक यह समस्या मुख्य रूप से फ्यूजेरियम विल्ट जैसे फफूंदजनित संक्रमणों के फैलने से उत्पन्न होती है. जब यह बीमारी पौधे को अपनी चपेट में लेती है, तो सबसे पहले पत्तियां पीली पड़ने लगती हैं और धीरे-धीरे पूरा पौधा मुरझाने लगता है. इसके असर से बेलों की सामान्य बढ़वार पूरी तरह रुक जाती है.
खेत में पानी का अनावश्यक ठहराव इस फफूंद के पनपने का सबसे बड़ा कारण बनता है. इसलिए किसानों को अपने खेतों में जल निकासी की सुदृढ़ व्यवस्था सुनिश्चित करनी चाहिए ताकि बारिश का पानी तुरंत बाहर निकल सके. इसके अतिरिक्त रोपाई का काम शुरू करने से पहले कृषि विशेषज्ञ की सिफारिश के अनुसार सही फफूंदनाशी दवा से बीज अथवा रोपण सामग्री का वैज्ञानिक उपचार करना अनिवार्य है.
स्कर्फ रोग के लक्षण और नियंत्रण
शकरकंद की गुणवत्ता को बिगाड़ने वाला दूसरा बड़ा विकार स्कर्फ रोग है, जो किसानों के मुनाफे पर सीधा असर डालता है. इस बीमारी का असर जमीन के भीतर तैयार हो रहे कंदों पर साफ देखा जा सकता है. प्रभावित कंद की बाहरी त्वचा पर गहरे भूरे और काले रंग के धब्बे उभर आते हैं या फिर एक जालीदार खुरदरी परत बनने लगती है.
यह विकार मिट्टी में पहले से मौजूद हानिकारक फफूंद के सक्रिय होने की वजह से फैलता है. इस संक्रमण से बचने के लिए हमेशा प्रमाणित और पूरी तरह स्वस्थ बीज कंदों का ही चयन करना चाहिए. साथ ही केवल निरोगी बेलों से तैयार की गई रोपण सामग्री ही खेत में लगानी चाहिए. किसी भी स्थिति में संक्रमित या संदिग्ध पौध सामग्री को खेत में नहीं लगाना चाहिए.
वायरस जनित संक्रमण और रस चूसक कीट
बरसात के मौसम में शकरकंद में वायरल बीमारियों का प्रकोप भी काफी देखने को मिलता है. जब फसल वायरस की चपेट में आती है, तो पत्तियों की सतह पर पीले और हरे रंग के चितकबरे चकत्ते स्पष्ट दिखाई देने लगते हैं. इसके प्रभाव से पत्तियां मुड़ने और सिकुड़ने लगती हैं तथा पौधे का विकास अत्यंत कमजोर रह जाता है.
यह घातक वायरस न केवल पहले से संक्रमित रोपण सामग्री के जरिए फैलता है, बल्कि खेत में मौजूद एफिड जैसे रस चूसने वाले सूक्ष्म कीट भी इसे तेजी से एक पौधे से दूसरे पौधे तक पहुंचाते हैं. इस समस्या की रोकथाम के लिए प्रमाणित रोगमुक्त पौध सामग्री रोपना जरूरी है. इसके अलावा किसानों को समय-समय पर खेत का मुआयना करते हुए रस चूसने वाले कीटों की निगरानी और उनके नियंत्रण की व्यवस्था रखनी चाहिए.
ब्लैक रॉट की रोकथाम और सावधानी
कंदों को सीधे सड़ाने वाली बीमारियों में ब्लैक रॉट बेहद खतरनाक साबित होता है. इस रोग के पनपने पर शकरकंद की ऊपरी सतह पर काले या गहरे भूरे रंग के धब्बे उभरते हैं, जो धीरे-धीरे भीतर तक फैलकर पूरे गूदे को सड़ा देते हैं. इसका मुख्य कारण संक्रमित बीज सामग्री का उपयोग और मिट्टी में सक्रिय रोगाणु फफूंद होते हैं.
ब्लैक रॉट से बचाव का सबसे कारगर तरीका यह है कि बुवाई के लिए केवल स्वस्थ और बेदाग कंदों का ही प्रयोग किया जाए. कटे, फटे या चोटिल कंदों को कभी भी रोपाई के लिए काम में न लाएं. यदि खेत में कोई भी पौधा या कंद इस रोग से ग्रसित नजर आए, तो उसे तुरंत उखाड़कर खेत से दूर ले जाकर नष्ट कर देना चाहिए ताकि अन्य पौधों में संक्रमण न फैले.
अत्यधिक नमी और जलभराव से सतर्कता
कृषि प्रबंधक संदीप कुमार ने जोर देकर स्पष्ट किया कि बरसात के पूरे सीजन में खेतों में अत्यधिक नमी और पानी का जमाव ही अधिकांश फफूंद और सड़न रोगों की मुख्य जड़ होता है. अत्यधिक गीली मिट्टी में रोगाणु बहुत तेजी से अपनी संख्या बढ़ाते हैं.
किसानों को सलाह दी गई है कि वे खेत की मेड़ों और नालियों को दुरुस्त रखें ताकि जलभराव न हो सके. इसके साथ ही बुवाई के लिए हमेशा कृषि विशेषज्ञों के परामर्श से उन्नत और रोग प्रतिरोधी किस्मों के बीजों का ही चयन करें. इन वैज्ञानिक और व्यावहारिक सावधानियों को अपनाकर किसान अपनी शकरकंद की फसल को बर्बादी से बचा सकते हैं और बेहतर मुनाफा प्राप्त कर सकते हैं.





















