झारखंड के रांची शहर से सामने आई एक प्रेरक पहल यह साबित करती है कि व्यापार केवल निजी संपत्ति जुटाने का जरिया नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव का सशक्त माध्यम भी हो सकता है। शहर की रहने वाली मीना सिंह ने बचपन में ही अपने माता-पिता को खो दिया था। इस गहरे व्यक्तिगत आघात और अभाव को उन्होंने एक सकारात्मक दिशा दी और अपने दिवंगत अभिभावकों की स्मृति को संजोए रखने के लिए हथकरघा और पारंपरिक परिधानों से जुड़ा उद्यम शुरू किया। उनके इस ब्रांड का नाम जग बुनकर है, जिसका प्राथमिक उद्देश्य पारंपरिक भारतीय कारीगरों को सम्मानजनक मंच दिलाना और कारोबार से अर्जित संपूर्ण लाभ को समाज के सबसे कमजोर तबकों तक पहुंचाना है।
मीना सिंह के जीवन की यह यात्रा बचपन से ही भारी कठिनाइयों के बीच शुरू हुई थी। बहुत कम उम्र में उनकी माता का देहांत हो गया था और इसके कुछ ही वर्षों बाद उनके पिता भी चल बसे। माता-पिता के साये से वंचित होने के बाद उनके दिव्यांग बड़े भाई ने अदम्य साहस दिखाते हुए पूरे परिवार की जिम्मेदारी संभाली। भाई ने एक पिता की तरह मीना की देखरेख की और परिवार को बिखरने नहीं दिया। इन्हीं संघर्षों और जीवन के अनुभवों ने मीना को यह अहसास कराया कि जीवन में हर काम केवल व्यक्तिगत लाभ या मुनाफे के लिए नहीं होता, बल्कि समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
चार राज्यों के कारीगरों को मिला प्रत्यक्ष मंच
जग बुनकर उद्यम के माध्यम से देश के चार प्रमुख राज्यों पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, झारखंड और बिहार के पारंपरिक कारीगरों को सीधे जोड़ा गया है। मीना सिंह बिचौलियों को हटाकर इन कारीगरों से सीधे उत्पाद तैयार करवाती हैं, जिससे शिल्पकारों को उनकी मेहनत का पूरा और उचित पारिश्रमिक मिलता है। वर्तमान में 100 से अधिक कुशल बुनकर इस उपक्रम के साथ सक्रिय रूप से जुड़कर अपनी आजीविका संवार रहे हैं।
इस संग्रह में हाथ से तैयार की गई कलात्मक साड़ियां, खूबसूरत दुपट्टे और पारंपरिक परांदा जैसी पारंपरिक चीजें शामिल हैं। उत्पादों की विविधता में विभिन्न राज्यों की सांस्कृतिक विरासत साफ नजर आती है। इसमें जहां एक ओर पश्चिम बंगाल का पारंपरिक ब्लॉक प्रिंट देखने को मिलता है, वहीं झारखंड का मशहूर तसर सिल्क और बिहार का विख्यात भागलपुरी सिल्क भी इन परिधानों की शोभा बढ़ाते हैं। इस विविधतापूर्ण समन्वय से न केवल कारीगरों की कला को व्यापक पहचान मिल रही है, बल्कि पारंपरिक बुनाई तकनीकों को भी नया जीवन मिला है।
कमाई का शत-प्रतिशत हिस्सा वृद्धाश्रम और शिक्षा को समर्पित
इस उद्यम का वित्तीय मॉडल पूरी तरह से जनकल्याणकारी सोच पर टिका हुआ है। आज इस कार्य से प्रति माह एक लाख रुपये से अधिक की शुद्ध आय होती है, लेकिन मीना सिंह इस कमाई से एक भी पैसा अपने निजी खर्च के लिए नहीं रखती हैं। उनका कहना है कि उनके घर में किसी जरूरी चीज की कमी नहीं है और वे सभी प्राथमिक सुविधाओं से संपन्न हैं। इसलिए उन्होंने पूरे मुनाफे का 100 प्रतिशत हिस्सा समाज सेवा में लगाने का दृढ़ संकल्प लिया है।
कारोबार से होने वाले शुद्ध मुनाफे का बड़ा हिस्सा वृद्धाश्रमों को दान किया जाता है। मीना का मानना है कि जिन बुजुर्गों के अपने परिवार या संतानें उनका सहारा नहीं बन पाते, उन्हें किसी प्रकार के अभाव का सामना न करना पड़े। अपने माता-पिता के प्रति सम्मान व्यक्त करने का उन्होंने यही मार्ग चुना है। इसके अलावा, इस आमदनी के माध्यम से 10 ऐसे स्कूलों को निरंतर वित्तीय सहायता दी जाती है जहां गरीब और वंचित तबके के बच्चे शिक्षा ग्रहण करते हैं। वंचित परिवारों के इन बच्चों के लिए यह सहायता उनकी पढ़ाई को जारी रखने में बड़ी भूमिका निभा रही है।
ग्राहकों का समर्थन और आगे की राह
समाज के दो बेहद संवेदनशील वर्गों असहाय बुजुर्गों और जरूरतमंद बच्चों को एक साथ संबल देने वाली इस अनोखी पहल को ग्राहकों की ओर से भी जबरदस्त समर्थन मिल रहा है। शुद्ध हथकरघा वस्त्रों की गुणवत्ता और इस प्रयास के पीछे छिपी नेक भावना के कारण लोग उत्साहपूर्वक इन उत्पादों को अपना रहे हैं। मीना सिंह का विश्वास है कि यदि उनके माता-पिता आज जीवित होते, तो सामाजिक बदलाव के इस रूप को देखकर बेहद प्रसन्न होते।





















