झारखंड के कोडरमा जिले में धान की खेती कर रहे किसानों के लिए खरीफ मौसम में फसल की उचित देखभाल हेतु महत्वपूर्ण परामर्श जारी किया गया है। कृषि विज्ञान केंद्र के वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक डॉ. अजय कुमार राय ने किसानों को सलाह दी है कि रोपाई संपन्न होने के बाद शुरुआती दिनों में खेतों की निरंतर निगरानी करना अत्यंत आवश्यक है। उनका कहना है कि यदि शुरुआती दौर में ही कीटों और बीमारियों के लक्षणों की पहचान कर ली जाए, तो सही कदम उठाकर पूरी फसल को बड़े नुकसान से सुरक्षित बचाया जा सकता है।
फफूंद संक्रमण से बचाव और जड़ों का उपचार
कृषि वैज्ञानिक के अनुसार, धान की रोपाई पूरे होने के लगभग 20 से 25 दिनों की अवधि बीतने के बाद कीटों और फफूंदजनित रोगों के फैलने की आशंका काफी बढ़ जाती है। इस जोखिम को ध्यान में रखते हुए रोपाई के समय ही एहतियाती उपाय अपनाने की सिफारिश की गई है। किसान रोपाई से पहले पौधों की जड़ों को कार्बेन्डाजिम नामक फफूंदनाशी के घोल में कुछ समय के लिए डुबोकर उपचारित कर सकते हैं। जड़ों का यह शुरुआती उपचार पौधों को प्रारंभिक अवस्था में फफूंद से होने वाले रोगों से सुरक्षा प्रदान करता है।
संतुलित पोषण और तना छेदक कीट नियंत्रण
पौधों की जड़ों के सुदृढ़ विकास और पोषक तत्वों के अवशोषण के लिए डॉ. राय ने एजोटोबैक्टर जैविक उर्वरक का प्रयोग करने का सुझाव दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल कीटनाशकों के प्रयोग से ही बेहतर उत्पादन संभव नहीं है, बल्कि खेत की मिट्टी में संतुलित पोषक तत्वों की उपस्थिति भी उतनी ही जरूरी है। जब पौधों को आवश्यकता के अनुसार सही मात्रा में पोषण मिलता है, तो उनकी शारीरिक वृद्धि बेहतर होती है और फसल मजबूत बनती है।
विशेषज्ञ ने किसानों को तना छेदक कीट की गतिविधियों पर विशेष रूप से नजर रखने को कहा है। यदि खेत में तना छेदक कीट का प्रभाव दिखाई दे, तो किसानों को बिना जानकारी के बाजार से कोई भी दवा लाकर छिड़कने से बचना चाहिए। इसके बजाय कृषि विशेषज्ञ से परामर्श लेकर ही अनुशंसित कीटनाशक का उचित मात्रा में उपयोग करना चाहिए। इससे कीटनाशकों के अनावश्यक इस्तेमाल पर रोक लगेगी और किसानों का अतिरिक्त आर्थिक खर्च भी बचेगा।
जल प्रबंधन और जलनिकासी की व्यवस्था
धान की बेहतर पैदावार के लिए खेत में जल का सही स्तर बनाए रखना बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। दिए गए दिशा-निर्देशों के मुताबिक, रोपाई के समय खेत में पानी की गहराई लगभग 2 से 5 सेंटीमीटर रखनी चाहिए। इसके बाद, जब रोपाई के 15 से 20 दिन पूरे हो जाएं, तब खेत में पानी का स्तर बढ़ाकर 5 से 7 सेंटीमीटर तक रखा जा सकता है।
इसके साथ ही कृषि वैज्ञानिक ने चेतावनी दी है कि खेत में जरूरत से ज्यादा पानी एकत्र नहीं रहने देना चाहिए। यदि भारी बारिश या अत्यधिक सिंचाई की वजह से खेत में पानी भर जाता है, तो उसे बाहर निकालने के लिए जलनिकासी की समुचित व्यवस्था होनी चाहिए। खेत में लगातार पानी ठहरे रहने से पौधों की जड़ों और तनों में गलन की समस्या पैदा हो जाती है, जिससे पूरी फसल के नष्ट होने का खतरा बन जाता है।



















