अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में लगातार पांच कारोबारी सत्रों की बढ़त के बाद कच्चे तेल की कीमतों में नरमी देखने को मिली है। एशियाई कारोबारी समय के दौरान वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट यानी डब्ल्यूटीआई कच्चा तेल फिसलकर लगभग 93.10 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर आ गया। बाजार पर यह दबाव उस समय बना जब ट्रंप प्रशासन की ओर से तथाकथित शैडो फ्लीट जहाजों पर लगे प्रतिबंधों में ढील देने पर विचार करने की बातें सामने आईं। यदि इन टैंकरों को राहत मिलती है, तो वैश्विक बाजार में तेल की आपूर्ति बढ़ सकती है, जिसके कारण कारोबारियों ने हालिया तेजी के बाद मुनाफावसूली का रुख अपनाया।
बाजार में आई इस ताजा गिरावट के बावजूद जानकार मान रहे हैं कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला बेहद नाजुक मोड़ पर खड़ी है। मध्य पूर्व और पूर्वी यूरोप दोनों ही प्रमुख ऊर्जा उत्पादक और ट्रांजिट क्षेत्रों में सैन्य संघर्ष नए और गंभीर स्तर पर पहुंच चुके हैं, जिससे तेल की कीमतों में किसी भी समय तेज उछाल आने का जोखिम बना हुआ है।
होर्मुज जलडमरूमध्य और खाड़ी क्षेत्र में गहराता समुद्री संकट
मध्य पूर्व के अहम जलमार्गों पर जहाजों को निशाना बनाए जाने की घटनाओं ने समुद्री परिवहन को भारी खतरे में डाल दिया है। होर्मुज जलडमरूमध्य में एक प्रोजेक्टाइल हमले का शिकार होने के बाद एक मालवाहक कंटेनर जहाज डूब गया। इसके साथ ही, ईरान समर्थित हूती बलों ने सऊदी अरब के विभिन्न ठिकानों पर लगातार मिसाइल और ड्रोन हमले जारी रखे हैं।
एमयूएफजी/बीटीएमयू के विश्लेषकों का कहना है कि मध्य पूर्व को लेकर बाजार में आम सहमति यह रही है कि ऊर्जा की कीमतों में गिरावट की संभावना कम है और मौजूदा स्थिति बनी रहने के आसार हैं। लेकिन उनका यह भी मानना है कि संकट के और अधिक बिगड़ने की आशंका बढ़ गई है, क्योंकि हूती विद्रोहियों के हमलों में कोई कमी नहीं दिख रही है। रिपोर्टों के अनुसार, हूती लड़ाकों ने धहरान स्थित सऊदी अरामको के मुख्यालय सहित कई अन्य शहरों को भी निशाना बनाया है। इन बढ़ते हमलों की वजह से कच्चे तेल की ढुलाई करने वाले कई बड़े टैंकर अब सामान्य लोडिंग क्षेत्रों में जाने से क परहेज कर रहे हैं, जिससे तेल के निर्यात का पूरा लॉजिस्टिक्स ढांचा बुरी तरह प्रभावित हो रहा है।
रूसी रिफाइनरियों पर हमले और ऊर्जा संघर्ष विराम का विवाद
यूक्रेन और रूस के बीच जारी युद्ध भी ऊर्जा आपूर्ति को सीधे तौर पर चोट पहुंचा रहा है। रूस ने यूक्रेन पर आरोप लगाया है कि उसने उसकी दो घरेलू तेल रिफाइनरियों को निशाना बनाया है। इनमें 4,00,000 बैरल प्रतिदिन की विशाल शोधन क्षमता वाला रियाज़ान संयंत्र भी शामिल है। मॉस्को का दावा है कि यह हमला राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा हाल ही में तय कराए गए तथाकथित ऊर्जा संघर्ष विराम का सीधा उल्लंघन है। यदि शोधन संयंत्रों पर हमले इसी तरह जारी रहते हैं, तो ईंधन के वैश्विक प्रवाह में भारी कमी आ सकती है।
अमेरिकी भंडारों में उम्मीद से बड़ी गिरावट
आपूर्ति की इस तनातनी के बीच अमेरिकी पेट्रोलियम संस्थान यानी एपीआई के साप्ताहिक आंकड़ों ने मांग में मजबूती का संकेत दिया है। ताजा आंकड़ों के अनुसार, अमेरिकी कच्चे तेल के भंडार में 11.12 मिलियन बैरल यानी 1.11 करोड़ से अधिक बैरल की भारी गिरावट आई है। यह कमी बाजार की पूर्व उम्मीदों से कहीं अधिक बड़ी है। आमतौर पर तेल भंडारों में इतनी भारी निकासी यह दर्शाती है कि रिफाइनरियों और उपभोक्ताओं की तरफ से मांग काफी मजबूत बनी हुई है, जो कीमतों को निचली सतह पर सहारा देने का काम कर सकती है।
कच्चे तेल के मानक और मूल्य निर्धारण का गणित
वैश्विक ऊर्जा बाजार में डब्ल्यूटीआई तेल एक अत्यंत महत्वपूर्ण बेंचमार्क माना जाता है। ब्रेंट और दुबई क्रूड के साथ यह दुनिया के तीन सबसे प्रमुख कच्चे तेल के प्रकारों में से एक है। अपेक्षाकृत कम घनत्व और सल्फर की अत्यंत अल्प मात्रा होने के कारण इसे हल्का और मीठा यानी लाइट और स्वीट कच्चा तेल कहा जाता है। यह उच्च गुणवत्ता वाला तेल माना जाता है जिसे परिष्कृत करना काफी सुगम होता है। इसे संयुक्त राज्य अमेरिका में निकाला जाता है और दुनिया के पाइपलाइन चौराहे के रूप में पहचाने जाने वाले कुशिंग केंद्र के माध्यम से वितरित किया जाता है।
किसी भी वित्तीय परिसंपत्ति की तरह डब्ल्यूटीआई की कीमतें भी मांग और आपूर्ति के मूलभूत नियमों पर चलती हैं। वैश्विक आर्थिक वृद्धि तेज होने पर इसकी मांग बढ़ती है, जबकि कमजोर वैश्विक वृद्धि मांग को घटा देती है। इसके अलावा युद्ध, राजनीतिक अस्थिरता और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध आपूर्ति में बाधा डालकर कीमतों को प्रभावित करते हैं। मूल्य निर्धारण में अमेरिकी डॉलर की भूमिका भी निर्णायक होती है, क्योंकि कच्चे तेल का अधिकांश वैश्विक व्यापार डॉलर में होता है। डॉलर कमजोर होने पर अंतरराष्ट्रीय खरीदारों के लिए तेल सस्ता पड़ता है, जबकि मजबूत डॉलर इसे महंगा बना देता है।
ओपेक और आधिकारिक भंडार रिपोर्टों का असर
कच्चे तेल के उत्पादन को नियंत्रित करने में 12 तेल उत्पादक देशों के संगठन ओपेक की भूमिका अत्यंत अहम रहती है। यह संगठन साल में दो बार होने वाली बैठकों में अपने सदस्य देशों के लिए उत्पादन कोटा तय करता है। जब ओपेक उत्पादन घटाता है, तो आपूर्ति तंग होने से कीमतें चढ़ती हैं, वहीं उत्पादन बढ़ाने पर कीमतें नरम पड़ती हैं। इसके अतिरिक्त ओपेक प्लस समूह में दस गैर-ओपेक उत्पादक भी शामिल हैं, जिनमें सबसे प्रमुख नाम रूस का है।
कीमतों के अल्पकालिक उतार-चढ़ाव में साप्ताहिक इन्वेंट्री डेटा का भी भारी महत्व है। एपीआई हर मंगलवार को अपनी रिपोर्ट जारी करता है, जबकि अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन यानी ईआईए बुधवार को आधिकारिक आंकड़े पेश करता है। लगभग 75 प्रतिशत मामलों में दोनों एजेंसियों के परिणाम एक प्रतिशत के दायरे में समान रहते हैं, हालांकि एक सरकारी एजेंसी होने के नाते ईआईए के आंकड़ों को बाजार अधिक प्रामाणिक मानता है।
मुद्रा, बांड, सोना और क्रिप्टोकरेंसी का हाल
वित्तीय बाजारों के अन्य हिस्सों में भी व्यापक हलचल देखने को मिल रही है। ऑस्ट्रेलिया में रोजगार के कमजोर आंकड़ों के कारण ऑस्ट्रेलियाई डॉलर अमेरिकी डॉलर के मुकाबले दबाव में रहा और साप्ताहिक निचले स्तर पर पहुंच गया। दूसरी ओर, अमेरिकी बांड यील्ड में गिरावट आने से अमेरिकी डॉलर अप्रैल 2025 के अपने उच्चतम स्तर से नीचे खिसका, जिससे जापानी येन के मुकाबले अमेरिकी डॉलर 158.00 के नीचे आ गया। येन के समर्थन में जापानी अधिकारियों द्वारा संभावित हस्तक्षेप की अटकलें भी तेज हैं।
कमजोर बांड यील्ड और डॉलर की नरमी से सोने में मजबूती लौटी और तीन दिनों की गिरावट का सिलसिला टूट गया। हालांकि, ऊर्जा की ऊंची कीमतों से महंगाई भड़कने और अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में बढ़ोतरी की आशंकाएं सर्राफा की बढ़त को सीमित रख सकती हैं। बांड बाजार जून के अंत से ही 2027 तक दरें बढ़ने की संभावनाओं को भुना रहा है। उधर, अमेरिका में सितंबर के उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में मुख्य मुद्रास्फीति 3.7 प्रतिशत रहने से, जो 3.6 प्रतिशत के अनुमान से अधिक थी, क्रिप्टो बाजार दबाव में दिखा। हालांकि खाद्य और ऊर्जा को छोड़कर कोर मुद्रास्फीति 2.6 प्रतिशत पर रही। इस आंकड़े के बाद बिटकॉइन गिर गया, जिसके लिए ग्लासनोड के अनुसार 80,000 डॉलर का स्तर सबसे अहम निगरानी बिंदु बना हुआ है।

















