पिछले कुछ दिनों से उत्तर और पूर्वी भारत के कई राज्यों में हो रही मूसलाधार बारिश ने आम जनजीवन को पूरी तरह से प्रभावित कर दिया है। इस खराब मौसम के बीच सोशल मीडिया और विभिन्न डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर एक नाम की बहुत अधिक चर्चा हो रही है, जिसे लोग 'साइक्लोन अर्नब' या 'अर्नब चक्रवात' कह रहे हैं। इंटरनेट पर लोग लगातार इस प्रणाली को लेकर तरह-तरह की शंकाएं और चिंताएं व्यक्त कर रहे हैं। हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा और दिलचस्प तथ्य यह है कि आधिकारिक मौसम वैज्ञानिकों ने इस मौसमी प्रणाली को चक्रवाती तूफान का दर्जा दिया ही नहीं है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग यानी IMD के अनुसार, यह केवल बंगाल की खाड़ी में बना एक गहरा अवदाब यानी Deep Depression था। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि यदि यह कोई आधिकारिक चक्रवात था ही नहीं, तो फिर 'अर्नब' नाम की इतनी चर्चा क्यों शुरू हुई, यह नाम कहां से आया, इसका अर्थ क्या है और मौसम प्रणालियों के वर्गीकरण का असली गणित क्या है?
चक्रवात और गहरे अवदाब का वैज्ञानिक अंतर
मौसम विज्ञान के सिद्धांतों के अनुसार, समुद्र या वायुमंडल में बनने वाले कम दबाव के क्षेत्रों को उनकी तीव्रता और हवा की गति के आधार पर अलग-अलग श्रेणियों में बांटा जाता है। जब कोई कम दबाव का क्षेत्र मजबूत होता है, तो वह डिप्रेशन यानी अवदाब में बदलता है। इस स्थिति में सतह पर हवा की अधिकतम निरंतर गति 31 से 50 किलोमीटर प्रति घंटा यानी 17 से 27 नॉट के बीच होती है और इसमें दो बंद समदाब रेखाएं पाई जाती हैं। जब यह प्रणाली और अधिक शक्तिशाली हो जाती है, तो इसे डीप डिप्रेशन यानी गहरा अवदाब कहा जाता है। गहरे अवदाब के दौरान हवा की गति 52 से 61 किलोमीटर प्रति घंटा यानी 28 से 33 नॉट तक पहुंच जाती है और इसमें तीन बंद समदाब रेखाएं होती हैं।
कोई भी गहरा अवदाब तब तक आधिकारिक तौर पर चक्रवाती तूफान यानी साइक्लोनिक स्टॉर्म नहीं कहलाता, जब तक कि उसकी 3 मिनट की औसत हवा की गति कम से कम 63 किलोमीटर प्रति घंटा यानी 34 नॉट या उससे अधिक न हो जाए। इसके साथ ही इस प्रणाली में चार या उससे अधिक बंद समदाब रेखाएं मौजूद होनी चाहिए। वर्तमान प्रणाली के मामले में हवा की रफ्तार लगातार 55 से 65 किलोमीटर प्रति घंटे के बीच ही घूमती रही, जिसके कारण यह चक्रवात की निर्धारित सीमा को पार नहीं कर सकी। यही वजह है कि IMD ने इसे तकनीकी रूप से चक्रवात घोषित नहीं किया, लेकिन इंटरनेट पर आगामी नाम की सूची को देखते हुए लोगों ने इसे पहले ही अर्नब पुकारना शुरू कर दिया।
बांग्लादेश से जुड़ा है 'अर्नब' नाम का अनोखा नाता
बहुत से लोगों के मन में यह सवाल उठ रहा है कि क्या 'अर्नब' किसी व्यक्ति का नाम है या इसका कोई फुल फॉर्म भी है। वैज्ञानिकों के अनुसार, यह कोई संक्षिप्त रूप या शॉर्ट फॉर्म नहीं है और न ही इसका कोई फुल फॉर्म होता है। यह वास्तव में बांग्लादेश द्वारा सुझाया गया एक बंगाली शब्द है। बंगाली भाषा में अर्नब का सीधा अर्थ महासागर, समुद्र या Ocean होता है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन यानी WMO की आधिकारिक सूची में इसका सही उच्चारण 'Ornab' के रूप में दर्ज किया गया है। इस प्रकार, इस नाम का किसी विशेष व्यक्ति से कोई संबंध नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर समुद्र के विशाल स्वरूप को दर्शाता है।
वैश्विक मौसम संगठन और 13 देशों का साझा फॉर्मूला
मौसम प्रणालियों और तूफानों के नामकरण की प्रक्रिया बेहद व्यवस्थित और अंतरराष्ट्रीय नियमों के तहत काम करती है। संयुक्त राष्ट्र की एक विशेष एजेंसी WMO, जिसका मुख्यालय स्विट्जरलैंड के जेनेवा में स्थित है, वर्ष 1950 से दुनिया भर के मौसम विभागों के समन्वय का कार्य करती है। उत्तर हिंद महासागर क्षेत्र, जिसमें अरब सागर और बंगाल की खाड़ी शामिल हैं, में उठने वाले तूफानों के नाम तय करने के लिए WMO/ESCAP पैनल का गठन किया गया है। ESCAP का पूरा नाम United Nations Economic and Social Commission for Asia and the Pacific है।
इस क्षेत्रीय समूह में कुल 13 देश शामिल हैं, जिनमें भारत, बांग्लादेश, पाकिस्तान, श्रीलंका, मालदीव, म्यांमार, थाईलैंड, ओमान, ईरान, सऊदी अरब, UAE, कतर और यमन शामिल हैं। नामकरण की इस व्यवस्था के तहत प्रत्येक देश अपनी ओर से 13-13 नामों का सुझाव भेजता है। इस तरह कुल 169 नामों की एक विस्तृत सूची तैयार की जाती है। जब भी इस क्षेत्र में कोई नया चक्रवात आकार लेता है, तो वर्णानुक्रम के अनुसार इस सूची में से एक-एक करके नाम आवंटित किए जाते हैं। इस बार की सूची में अगला स्थान बांग्लादेश द्वारा दिए गए नाम अर्नब का था। इसी वजह से जैसे ही बंगाल की खाड़ी में गहरा अवदाब बना, लोगों ने मान लिया कि यह चक्रवात बनेगा और इसे अर्नब कहना शुरू कर दिया। अब यदि भविष्य में इस क्षेत्र में कोई नया चक्रवात बनता है, तो उसे भारत द्वारा सुझाया गया नाम दिया जाएगा।
तबाही मचाने वाले नामों की विदाई और सुरक्षा के नियम
इस नामकरण प्रणाली की एक बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण विशेषता यह भी है कि यदि कोई चक्रवात अत्यधिक तबाही मचाता है और जान-माल का भारी नुकसान करता है, तो उस नाम को हमेशा के लिए सूची से हटा दिया जाता है। इतिहास में इसके कई उदाहरण मौजूद हैं, जैसे तितली, फानी और अम्फान जैसे चक्रवातों ने पूर्व में भारी तबाही मचाई थी, जिसके बाद इन नामों को भविष्य के लिए पूरी तरह से सेवानिवृत्त या रिटायर कर दिया गया। यह सूची वास्तव में सदस्य देशों के बीच एक पूर्व-निर्धारित सहमति की तरह काम करती है ताकि आपातकालीन स्थिति में सभी देशों के बीच चेतावनी जारी करना और सूचनाओं का आदान-प्रदान करना आसान हो सके।
बिना नाम वाले मौसम तंत्र भी ला सकते हैं बड़ी विपदा
आम जनता में अक्सर यह गलतफहमी देखी जाती है कि यदि किसी मौसमी प्रणाली को आधिकारिक तौर पर चक्रवात का नाम नहीं मिला है, तो वह खतरनाक नहीं है। मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि यह सोचना अत्यंत जोखिम भरा हो सकता है। कोई मौसमी तंत्र भले ही चक्रवात की श्रेणी में न आए, लेकिन एक गहरा अवदाब भी अपने साथ भारी नमी लेकर चलता है। इसके प्रभाव से मूसलाधार बारिश, निचले इलाकों में गंभीर जलभराव, नदियों के जलस्तर में अचानक उफान और पहाड़ी क्षेत्रों में भूस्खलन जैसी अत्यंत प्रतिकूल स्थितियां उत्पन्न हो सकती हैं।
इस विशिष्ट गहरे अवदाब ने भी अपनी ताकत का प्रदर्शन किया है। यह प्रणाली 23 और 24 सितंबर की मध्यरात्रि को आंध्र प्रदेश के कलिंगापटनम के पास तट से टकराई थी। इसके बाद नमी से भरी यह प्रणाली उत्तर भारत की ओर बढ़ी, जिसके कारण ओडिशा और आंध्र प्रदेश के तटीय इलाकों के साथ-साथ छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश और बिहार में पिछले 72 घंटों के दौरान भारी से अत्यंत भारी बारिश दर्ज की गई है। इसलिए, किसी भी मौसमी खतरे का आकलन केवल उसके नाम या श्रेणी से नहीं, बल्कि हवा की गति, बारिश की मात्रा के पूर्वानुमान और स्थानीय प्रशासन द्वारा जारी की गई सुरक्षा सलाह के आधार पर ही किया जाना चाहिए।


















