कर्नाटक के चुनावी तंत्र ने मतदाता नामावलियों में अनुचित हस्तक्षेप करने की कोशिशों के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया है। राज्य निर्वाचन मशीनरी ने साफ निर्देश दिया है कि जो लोग अनधिकृत तरीके से दूसरों के नाम चुनावी सूची से विलोपित कराने के लिए झूठे आवेदन लगा रहे हैं, उनके विरुद्ध दंडात्मक प्रावधानों के तहत अभियोग दर्ज कराया जाएगा। यह कड़ा निर्देश राज्य के सभी दो सौ चौबीस विधानसभा क्षेत्रों में तैनात निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारियों और समूचे जिला निर्वाचन तंत्र को तत्काल अमल के लिए प्रेषित किया गया है।
झूठी आपत्तियों पर लोक प्रतिनिधित्व कानून के तहत नकेल
निर्वाचन अधिकारियों की प्राथमिक पड़ताल में यह तथ्य उजागर हुआ है कि कई हलकों में थोक के रूप में नाम विलोपन के आवेदन दाखिल किए जा रहे थे। जब ऐसे भारी तादाद में आए प्रपत्रों की बुनियादी जांच की गई, तो उनमें भारी विसंगतियां पाई गईं और वे नियमानुकूल नहीं थे। चुनावी प्राधिकरण ने स्थिति की गंभीरता को देखते हुए स्पष्ट किया है कि यदि कोई भी व्यक्ति सायास मिथ्या घोषणा करता है अथवा असत्य ब्योरा पेश करता है, तो उसके विरुद्ध लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम उन्नीस सौ पचास की धारा इकत्तीस के अंतर्गत औपचारिक एफआईआर दर्ज कराई जाएगी।
प्रशासनिक अधिकारियों को हिदायत दी गई है कि कानूनी कार्रवाई से पूर्व निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियमावली उन्नीस सौ साठ के नियम बीस के प्रावधानों का पालन करते हुए गहन तहकीकात पूरी की जाए। इसके अतिरिक्त निर्वाचन तंत्र ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि यह दंडात्मक व्यवस्था केवल नाम हटाने संबंधी आवेदन तक सीमित नहीं रहेगी। यदि किसी व्यक्ति ने नए पंजीकरण, विदेशी नागरिकों के नाम दर्ज कराने अथवा प्रविष्टियों में सुधार के लिए निर्धारित प्रपत्रों में भी जानबूझकर भ्रामक सूचनाएं दीं, तो उन पर भी समान गंभीरता से विधिक कार्रवाई होगी।
राजनीतिक गलियारों में गहराया साजिश का विवाद
मतदाता नामावली के पुनरीक्षण को लेकर छिड़ा यह प्रशासनिक संग्राम वास्तव में राज्य के राजनीतिक पटल पर हुए गंभीर खुलासों के बाद तेज हुआ है। गुरुवार, एक अक्टूबर दो हजार छब्बीस को इस मामले में तीखा हमला बोलते हुए कर्नाटक के मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने दावा किया था कि राज्य में करीब पचास लाख वैध मतदाताओं को मताधिकार से वंचित करने का संगठित षड्यंत्र चल रहा है। उन्होंने आशंका जताई थी कि विशेष पुनरीक्षण प्रक्रिया के बहाने चुनिंदा सामाजिक तबकों को मताधिकार सूची से बाहर धकेलने का प्रयास हो रहा है।
दावे के मुताबिक समाज के कमजोर तथा अल्पसंख्यक वर्गों को लक्ष्य बनाकर पहले से मुद्रित अथवा भरे हुए प्रपत्र व्यापक स्तर पर परिचालित किए जा रहे थे। इस संदर्भ में कुछ इलाकों के विशिष्ट आंकड़े भी सामने रखे गए, जिनमें बाबलेश्वर क्षेत्र में सोलह सौ से अधिक, विजयपुरा में चौदह हजार तथा भालकी विधानसभा क्षेत्र में बत्तीस सौ चौवालीस संदेहास्पद आवेदन पकड़े जाने की बात कही गई। इन आंकड़ों के आधार पर चुनावी निगरानी संस्था से तुरंत पुलिस केस दर्ज करने और साजिशकर्ताओं को हिरासत में लेने की मांग उठाई गई थी।
आम मतदाताओं के नागरिक अधिकारों की सुरक्षा
प्रशासन द्वारा मुकदमा दर्ज कराने के इस स्पष्ट फरमान से आम नागरिकों के मताधिकार को एक मजबूत सुरक्षा कवच मिलेगा। पूर्व में अक्सर यह आशंका बनी रहती थी कि संगठित तरीके से आपत्तियां दर्ज कराकर पात्र नागरिकों के नाम चुनावी सूची से चुपचाप हटवा दिए जाते थे। अब जबकि प्रत्येक संदिग्ध आवेदन की प्रामाणिकता की पड़ताल अनिवार्य कर दी गई है और गलत ब्योरा देने पर जेल तथा कानूनी मुकदमे का शिकंजा तय है, तब शरारती तत्वों द्वारा थोक में विलोपन आवेदन जमा करने की प्रवृत्ति पर प्रभावी रोक लगेगी। प्रत्येक वास्तविक मतदाता का संवैधानिक अधिकार अब प्रशासनिक जांच और कानूनी पहरेदारी से सुरक्षित रहेगा।
























