भाद्रपद महीने के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी यानी 14 सितंबर की शाम आकाश में एक बेहद मनमोहक और दुर्लभ दृश्य देखने को मिला, जब चंद्रमा के बिल्कुल समीप एक चमकदार रोशनी टिमटिमाती नजर आई। इस अनोखे नजारे को देखते ही पटना सहित विभिन्न क्षेत्रों में लोग अपने घरों की छतों पर पहुंच गए और मोबाइल फोन से तस्वीरें और वीडियो कैद करने लगे। यह घटना उस दिन हुई जब देश भर में गणेश चतुर्थी मनाई जा रही थी और बिहार के मिथिलांचल क्षेत्र में पारंपरिक चौरचन पर्व की रौनक थी। सोशल मीडिया पर इस चमकदार बिंदु को लेकर तरह-तरह के कयास लगने लगे, जहां कुछ लोगों ने इसे शुक्र ग्रह करार दिया तो कई अन्य लोगों ने इसे महज एक सामान्य खगोलीय घटना माना। इस प्राकृतिक दृश्य ने लोगों का ध्यान इस पावन पर्व की सांस्कृतिक और धार्मिक मान्यताओं की ओर गहराई से आकर्षित किया, जहां चंद्रमा केवल एक खगोलीय पिंड नहीं बल्कि आस्था का मुख्य आधार है।
मिथिलांचल की संस्कृति में चौरचन पर्व का महत्व
बिहार के सांस्कृतिक अंचल मिथिला में चौरचन को चौठ चन्द्र, चौथ चंद्र अथवा चौक चन्ना जैसे विभिन्न स्थानीय नामों से जाना जाता है। भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को आयोजित होने वाला यह त्योहार लोक आस्था और पारंपारिक रीति-रिवाजों का अनूठा संगम प्रस्तुत करता है। यह पर्व उसी पावन तिथि को पड़ता है जिस दिन देश के तमाम हिस्सों में गणेश चतुर्थी का उत्सव धूमधाम से मनाया जाता है। मिथिला के परिवारों में इस दिन का इंतजार पूरे वर्ष किया जाता है, क्योंकि इस पर्व का सीधा संबंध परिवार के कल्याण, प्रकृति प्रेम और आकाशीय शक्तियों के प्रति कृतज्ञता से जुड़ा हुआ है।
दिनभर का उपवास और पारंपरिक अरिपन की सजावट
इस पावन पर्व को लेकर घरों में सुबह के समय से ही विशेष तैयारियां प्रारंभ हो जाती हैं। परिवार की महिलाएं दिनभर निर्जला या फलाहार व्रत रखकर आराधना का संकल्प लेती हैं। जैसे ही शाम ढलने लगती है, घर के आंगन और छतों को पानी से धोकर पूरी तरह स्वच्छ किया जाता है। इसके पश्चात कच्चे चावल के घोल, जिसे स्थानीय भाषा में पिठार कहा जाता है, उससे जमीन पर पारंपरिक कलात्मक रेखाएं खींचकर सुंदर अरिपन उकेरे जाते हैं। इन लोक कलाकृतियों में चंद्रमा की विशेष आकृति भी बनाई जाती है। पूजा के लिए बांस से बने सूप और डगरा को अत्यंत सुरुचिपूर्ण ढंग से सजाया जाता है, जिसमें विभिन्न प्रकार के पारंपरिक व्यंजनों और मौसमी फलों को व्यवस्थित रूप से रखा जाता है।
पारंपरिक पकवान, मिट्टी की हांडी का दही और फल
चौरचन की पूजा में अर्पित की जाने वाली सामग्रियों की सूची अत्यंत समृद्ध और पारंपरिक होती है। बांस के सूप और डलिया में घर की रसोई में शुद्धता से तैयार की गई खीर, पूड़ी, ठेकुआ और मालपुआ सजाए जाते हैं। इसके साथ ही मौसमी फलों का विशेष स्थान होता है, जिनमें केला, खीरा और शरीफा प्रमुख रूप से शामिल रहते हैं। मिथिलांचल की अनूठी परंपरा में इस पूजा के दौरान मिट्टी के नए बर्तन में विशेष रूप से जमाई गई गाढ़ी दही का भोग लगाना अनिवार्य माना जाता है, जिसे अत्यंत पवित्र और शुभ माना जाता है।
गणेश वंदना और चंद्र देव को अर्घ्य देने का विधान
शाम के समय पूजा का विधिवत शुभारंभ सर्वप्रथम प्रथम पूज्य भगवान गणेश और पवित्र कलश के पूजन से होता है। विधि-विधान के अनुसार गणेश जी को सुगंधित चंदन, ताजे पुष्प और दूर्वा अर्पित की जाती है। इसके पश्चात जैसे ही आकाश में चंद्रमा उदित होता है, पूजा का मुख्य अनुष्ठान आरंभ होता है। व्रत करने वाली महिलाएं और परिवार के अन्य सदस्य प्रसाद और पकवानों से सजे बांस के सूप अथवा डलिया को अपने हाथों में उठाते हैं। इसके बाद दूध या शुद्ध जल की धार अर्पित करते हुए चंद्र देव को श्रद्धापूर्वक अर्घ्य प्रदान किया जाता है और समस्त फल व पकवान उन्हें समर्पित किए जाते हैं।
हाथ में फल लेकर चंद्र दर्शन करने की लोक मान्यता
चौरचन पर्व से जुड़ी एक अत्यंत रोचक और महत्वपूर्ण पौराणिक मान्यता भगवान गणेश और चंद्र देव के संबंधों से प्रेरित है। प्रचलित लोककथा और धार्मिक विश्वास के अनुसार, भगवान गणेश ने चंद्रमा को शाप दिया था, जिसके कारण भाद्रपद चतुर्थी की रात खुले आसमान में चंद्रमा को सीधे नंगी आंखों से देखने पर व्यक्ति पर झूठा कलंक लगने का भय रहता है। इसी कारण मिथिला में इस रात चंद्र दर्शन की एक अनूठी और व्यावहारिक परंपरा सदियों से चली आ रही है। लोग सीधे चांद को देखने के बजाय अपने हाथों में फल, पकवान या दही से भरा पात्र रखकर उसके सहारे से चंद्रमा के दर्शन करते हैं और इसके उपरांत ही अर्घ्य अर्पण की क्रिया संपन्न की जाती है।



















