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बुरहानपुर के जीरा-आलू केले के पापड़: निमाड़ के इस पारंपरिक स्वाद ने कैसे बदला महिलाओं की आजीविका का जरियाजीवनशैली
25 अग॰ 2026, 10:12 am (65 दिन पहले)· 4

बुरहानपुर के जीरा-आलू केले के पापड़: निमाड़ के इस पारंपरिक स्वाद ने कैसे बदला महिलाओं की आजीविका का जरिया

मध्य प्रदेश के बुरहानपुर में मानसून के सीजन के दौरान पारंपरिक जीरा-आलू केले के पापड़ की मांग में भारी उछाल आता है। स्थानीय महिलाएं इसे बड़े पैमाने पर तैयार करती हैं जो अब उनके लिए कमाई का जरिया भी बन गया है।

मध्य प्रदेश के ऐतिहासिक बुरहानपुर शहर में मानसून की दस्तक के साथ ही पारंपरिक व्यंजनों की खुशबू घरों से महकने लगती है। निमाड़ अंचल की अपनी अनूठी संस्कृति और खानपान की शैली है, जिसमें यहां के पारंपरिक पकवानों का एक अलग ही मुकाम है। इस क्षेत्र में बरसात का मौसम शुरू होते ही घरों में खास तैयारियां शुरू हो जाती हैं, जिनमें सबसे प्रमुख नाम जीरा-आलू केले के पापड़ का आता है। इन खास पापड़ों को यहां के लोग पारंपरिक रूप से बड़े चाव के साथ तैयार करते हैं और भोजन के साथ इसका आनंद उठाते हैं। साल दर साल इस स्थानीय व्यंजन की लोकप्रियता कम नहीं हुई है, बल्कि बरसात के दिनों में इसकी डिमांड सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच जाती है। लोग अपने घरों में तो इन्हें बनाते ही हैं, साथ ही ऑर्डर देकर भी कारीगर महिलाओं से इन्हें तैयार करवाते हैं। इन पापड़ों की सबसे बड़ी खूबी यह है कि अगर इन्हें सही तरीके से बनाया जाए और धूप में अच्छी तरह सुखाया जाए, तो ये करीब तीन महीने तक बिल्कुल खराब नहीं होते और सुरक्षित बने रहते हैं।

स्थानीय निवासी कविता बाई ने इस पारंपरिक कला के बारे में विस्तार से बताते हुए कहा कि यही कारण है कि लोग इन्हें थोक के भाव में बनाकर अपने घरों में स्टोर कर लेते हैं और जरूरत पड़ने पर खाने के साथ परोसते हैं। वहीं एक अन्य स्थानीय निवासी दया बाई पिछले करीब 30 वर्षों से इस हुनर से जुड़ी हुई हैं और लगातार आलू और जीरे केले के पापड़ बना रही हैं। शुरुआत के दिनों में उन्होंने यह काम केवल अपने घर की जरूरतों को पूरा करने के लिए शुरू किया था। लेकिन धीरे-धीरे उनके हाथ के बने इन पापड़ों का स्वाद आसपास के लोगों को इतना भाया कि उन्हें बाहर से भी आर्डर मिलने लगे। आज यह घरेलू खानपान का पारंपरिक शौक उनके लिए स्व-रोजगार और आर्थिक आत्मनिर्भरता का एक मजबूत जरिया बन चुका है।

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दया बाई के अनुभवों के अनुसार, मानसून का सीजन आते ही लोग उनसे संपर्क साधना शुरू कर देते हैं और पापड़ तैयार करने के नए ऑर्डर देते हैं। इसके अलावा जब भी क्षेत्र में कोई बड़ा त्योहार आता है, तो इन पापड़ों की मांग में और भी ज्यादा बढ़ोतरी देखने को मिलती है। घरों में जब मेहमान आते हैं या रोजमर्रा के खाने की थाली सजती है, तो इन्हें विशेष रूप से परोसा जाता है। बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक हर वर्ग के लोगों में इन स्वादिष्ट पापड़ों को लेकर खासा क्रेज देखा जाता है।

इन पारंपरिक पापड़ों को बनाने की प्रक्रिया में मुख्य तौर पर उबले हुए आलू, जीरा और तेल का इस्तेमाल किया जाता है। सबसे पहले आलू को खास तरीके से तैयार किया जाता है और उसमें जीरा मिलाकर हाथों या मशीनों की मदद से पापड़ का गोल आकार दिया जाता है। आकार देने के बाद इन्हें कड़ी धूप में पर्याप्त समय तक सुखाया जाता है ताकि नमी पूरी तरह खत्म हो जाए और इन्हें महीनों तक सुरक्षित रखा जा सके। बुरहानपुर के ये प्रसिद्ध आलू-जीरे के पापड़ आज भी निमाड़ की प्राचीन रसोई परंपरा और देसी स्वाद को जीवंत रखे हुए हैं। साथ ही यह व्यंजन दया बाई जैसी मेहनती महिलाओं के जीवन में आर्थिक मजबूती और आत्मनिर्भरता की नई कहानी भी लिख रहा है।

सवाल-जवाब

बुरहानपुर में आलू-जीरे के पापड़ सबसे ज्यादा कब बनाए जाते हैं?
बरसात के मौसम और त्योहारों के दौरान बुरहानपुर में आलू-जीरे के पापड़ की मांग सबसे अधिक होती है।
ठीक से सुखाए गए आलू-जीरे के पापड़ कितने समय तक सुरक्षित रहते हैं?
सही तरीके से तैयार और धूप में सुखाए गए पापड़ करीब तीन महीने तक आसानी से सुरक्षित रखे जा सकते हैं।
दया बाई कितने वर्षों से आलू और जीरे के पापड़ बना रही हैं?
दया बाई पिछले करीब 30 वर्षों से पारंपरिक आलू और जीरे के पापड़ बनाने का काम कर रही हैं।
इन पापड़ों को तैयार करने में मुख्य रूप से किन चीजों का इस्तेमाल होता है?
इन पारंपरिक पापड़ों को बनाने में मुख्य रूप से आलू, जीरा और तेल का इस्तेमाल किया जाता है।
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