असम के सबसे प्रमुख शहर गुवाहाटी में पक्षियों की मौजूदगी को लेकर एक नया अध्ययन सामने आया है। नवंबर 2023 से जुलाई 2025 के बीच चलाए गए इस वैज्ञानिक सर्वेक्षण के दौरान शहर के अलग-अलग हिस्सों में उल्लुओं की आठ प्रजातियां पाई गई हैं। शोधकर्ताओं ने एक-एक वर्ग किलोमीटर के कुल 33 ग्रिड तय किए थे, जिनमें से 24 ग्रिडों में इन निशाचर पक्षियों की मौजूदगी के सीधे प्रमाण मिले। इस पूरे आकलन को वैज्ञानिक पत्रिका अर्बन इकोसिस्टम्स में प्रकाशित किया गया है।
सड़क का शोर बना सर्वेक्षण में सबसे बड़ा रोड़ा
इस पूरी निगरानी के दौरान सामने आया कि शहर का यातायात और निर्माण कार्यों की तेज आवाजें इन पक्षियों की निगरानी में भारी बाधा डाल रही हैं। गाड़ियों की लगातार आवाजाही से पैदा होने वाली ध्वनि के कारण उल्लुओं की स्वाभाविक आवाजें दब जाती हैं। इसका अर्थ यह निकाला गया कि यदि किसी चिन्हित इलाके में सर्वेक्षण टीम को कोई पक्षी सुनाई नहीं दिया, तो इसका सीधा मतलब यह नहीं है कि वहां उल्लू मौजूद ही नहीं हैं। ऐसे जटिल शहरी वातावरण में वन्यजीवों की वास्तविक संख्या का सटीक अंदाजा लगाना हमेशा कठिन साबित होता है।
कौन-सी प्रजातियां सबसे ज्यादा दिखीं
अध्ययन के आंकड़ों के अनुसार, पूरे इलाके में बार्न आउल और स्पॉटेड आउलेट सबसे आम तौर पर पाए गए। इसके अलावा छह अन्य प्रजातियों की पहचान भी की गई, जिनमें ब्राउन हॉक आउल, ब्राउन फिश आउल, कॉलर्ड स्कोप्स आउल, माउंटेन स्कोप्स आउल, ओरिएंटल स्कोप्स आउल और एशियन बार्ड आउलेट शामिल हैं। पर्यावरण की दृष्टि से ये पक्षी बेहद उपयोगी माने जाते हैं क्योंकि ये चूहों की आबादी को प्राकृतिक रूप से नियंत्रित करने में अहम भूमिका निभाते हैं।
असम के वन मंत्री ने जैव विविधता पर दिया जोर
असम के वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री जयंत मल्ला बरुआ ने बुधवार को इस शोध के अहम ब्योरे साझा किए। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि कंक्रीट के फैलाव के बीच भी शहरी इलाके कई ऐसे वन्यजीवों का आशियाना बने रहते हैं, जो आम नागरिकों की रोजमर्रा की नजरों से अक्सर ओझल रहते हैं। जयंत मल्ला बरुआ ने सोशल मीडिया मंच X पर इस संबंध में जानकारी देते हुए कहा कि उल्लुओं के आवासों को बचाना शहर की जैव विविधता और आम नागरिकों दोनों के लिए लाभकारी साबित होगा।
शहरी नियोजन में प्राकृतिक संतुलन की मांग
गुवाहाटी के तेजी से होते विस्तार को देखते हुए बुनियादी ढांचे के विकास और प्रकृति संरक्षण के बीच संतुलन साधने पर विशेष जोर दिया जा रहा है। विशेषज्ञों और वन विभाग का मानना है कि पुराने और बड़े पेड़ों, दलदली जमीनों तथा प्राकृतिक हरियाली के पैच को सुरक्षित रखकर ही जीवों के रहने की जगह को बचाया जा सकता है। इसके साथ ही, भविष्य के मास्टर प्लान में शोर प्रदूषण पर नियंत्रण और वन्यजीवों की निरंतर निगरानी को अनिवार्य रूप से शामिल करने की बात कही गई है, ताकि विकास के साथ-साथ प्राकृतिक आवास भी सुरक्षित रह सकें।



















