उत्तराखंड के बागेश्वर समेत पूरे कुमाऊं के पहाड़ी इलाकों में आज भी कई ऐसे पारंपरिक और पुराने मकान मौजूद हैं जो पिछले 90 से 100 साल या उससे भी अधिक समय से बेहद मजबूती के साथ खड़े हुए हैं। इन ऐतिहासिक घरों की सबसे खास बात यह है कि इनके निर्माण में आज के दौर में इस्तेमाल होने वाले सीमेंट और आधुनिक कंक्रीट का बिल्कुल भी उपयोग नहीं किया गया था। इसके बावजूद ये मकान हर साल भारी बारिश, बर्फबारी, कड़ाके की ठंड और क्षेत्र के कठिन पहाड़ी मौसम का डटकर मुकाबला करते चले आ रहे हैं।
पत्थरों और स्थानीय सामग्री से बनती थीं दीवारें
इस विषय पर जानकारी देते हुए स्थानीय जानकार किशन मलड़ा बताते हैं कि इन पुराने और टिकाऊ मकानों की मजबूती के पीछे मुख्य रूप से स्थानीय संसाधनों और पारंपरिक निर्माण तकनीक का बहुत बड़ा योगदान है। उस दौर में पहाड़ों पर घर बनाने के लिए आसपास ही आसानी से उपलब्ध पत्थरों का मुख्य रूप से इस्तेमाल किया जाता था। कारीगर पत्थरों को एक खास और वैज्ञानिक तरीके से आपस में जमाकर काफी मोटी दीवारें तैयार करते थे। इन दीवारों को लंबे समय तक मजबूत बनाए रखने के लिए चूना, चिकनी मिट्टी और अन्य स्थानीय प्राकृतिक सामग्रियों का खुलकर प्रयोग किया जाता था। इसके अलावा घरों के दरवाजों, चौखटों, खिड़कियों और मकान के अंदरूनी ढांचे को तैयार करने के लिए देवदार और तून जैसी बेहद मजबूत और टिकाऊ लकड़ियों का चयन किया जाता था।
ढलानदार छतें और बेहतरीन जल निकासी प्रणाली
इन पारंपरिक पहाड़ी मकानों की वास्तुकला की एक बहुत बड़ी खासियत उनकी विशेष ढलानदार छतें होती थीं। इन छतों के ऊपर स्लेट या फिर पत्थर की मजबूत पट्टियां व्यवस्थित ढंग से लगाई जाती थीं। पहाड़ों पर होने वाली भारी बारिश और बर्फबारी को ध्यान में रखते हुए ही छत को ढलानदार बनाया जाता था ताकि पानी या बर्फ छत पर ज्यादा देर तक टिक न सके। ऐसा होने से मकान की दीवारों और छत पर नमी का बुरा असर बहुत कम पड़ता था। घर बनाते समय इसकी नींव की मजबूती के साथ-साथ आसपास के क्षेत्र में पानी की उचित निकासी पर भी विशेष रूप से ध्यान दिया जाता था ताकि बारिश का पानी मकान के पास इकट्ठा न हो सके। पानी के ठहराव को रोकने से नींव कमजोर होने और दीवारों में सीलन आने का खतरा काफी हद तक टल जाता था।
भूकंपीय जोन में लचीला और सुरक्षित ढांचा
भौगोलिक रूप से कुमाऊं क्षेत्र भूकंप के लिहाज से काफी संवेदनशील माना जाता है। ऐसे समय में पुराने समय के कुशल कारीगर वहां की स्थानीय परिस्थितियों और आसपास मिलने वाली सामग्री के आधार पर ही मकानों का नक्शा और ढांचा तैयार करते थे। लकड़ी और पत्थरों का यह संतुलित और समझदारी भरा इस्तेमाल मकान के पूरे ढांचे को लचीला और आपदा प्रतिरोधी बनाने में बहुत मददगार साबित होता था। इन पारंपरिक भवनों की शैली के पीछे लोगों का सालों का स्थानीय अनुभव और पीढ़ियों से चली आ रही निर्माण की गहरी समझ छिपी होती थी जो आज भी किसी अजूबे से कम नहीं लगती है।
गांवों में आज भी आबाद हैं ये मजबूत आशियाने
विशेषज्ञों के अनुसार किसी भी पुराने मकान की लंबी उम्र केवल उसमें इस्तेमाल होने वाली सामग्री पर ही पूरी तरह निर्भर नहीं करती है। समय-समय पर छत की सही मरम्मत करवाना, पत्थरों की दीवारों की लगातार देखभाल करना, लकड़ी को दीमक या नमी से बचाना और पानी की निकासी को दुरुस्त रखना भी उतना ही अहम होता है। बागेश्वर और कुमाऊं के तमाम ग्रामीण इलाकों में ऐसे पुराने मकान आज भी लोगों के रहने के काम आ रहे हैं और अपनी मजबूती की कहानी खुद ब खुद कह रहे हैं।
आधुनिक युग में पारंपरिक इंजीनियरिंग का महत्व
आज के इस आधुनिक दौर में जहां पक्के मकान बनाने के लिए सीमेंट, लोहे के सरिए और कंक्रीट का धड़ल्ले से व्यापक इस्तेमाल किया जा रहा है, वहीं पहाड़ के ये सदियों पुराने मकान पारंपरिक वास्तुकला और स्थानीय इंजीनियरिंग की बेहतरीन समझ का अनूठा उदाहरण पेश करते हैं। इन घरों के निर्माण में वहां की स्थानीय जलवायु, प्रकृति में उपलब्ध संसाधनों और पहाड़ी जीवनशैली के साथ सामंजस्य बिठाने की एक ऐसी नायाब तकनीक देखने को मिलती है जिसे आज के समय में आने वाली पीढ़ियों के लिए संरक्षित करके रखना भी बेहद आवश्यक हो चला है ताकि हमारी पुरानी विरासत संजोई जा सके।



















