बरसात का दौर खत्म हो जाने के बावजूद अगर मकान की भीतरी दीवारें नम बनी रहती हैं, छत के कोनों से पानी की बूंदें टपकती हैं या कमरों के भीतर एक अजीब सी दुर्गंध फैलने लगती है, तो इसे केवल मौसम का सामान्य असर मानकर नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है। विंध्य इलाके में हुई मूसलाधार बारिश के बाद बहुत से घरों में दीवारों के भीतर नमी बैठने और छत से पानी रिसने की गंभीर दिक्कतें सामने आई हैं। अधिकांश लोग ऐसी स्थिति में ऊपरी तौर पर नया पेंट लगवाकर तसल्ली कर लेते हैं, लेकिन कुछ ही हफ्तों के भीतर प्लास्टर फिर से फूलने लगता है और पपड़ी बनकर गिरने लगता है। इस खराबी को जड़ से समाप्त करने के लिए यह समझना अनिवार्य है कि पानी का प्रवेश कहां से हो रहा है और उसे रोकने के लिए कौन से ठोस तकनीकी कदम उठाए जाने चाहिए। सिविल इंजीनियर शुभम त्रिपाठी ने स्पष्ट किया है कि निर्माण कार्य के दौरान तय मानकों और आवश्यक चरणों का सही क्रम में पालन न करने के कारण ही बाद में सीलन तथा रिसाव का संकट विकराल रूप धारण कर लेता है।
नींव के स्तर पर डैम्प प्रूफ कोर्स तैयार करना क्यों है अनिवार्य
शुभम त्रिपाठी का कहना है कि जब नया घर बनता है, तब कई बार ठेकेदार, बिल्डर अथवा खुद मकान मालिक निर्माण के बेहद नाजुक चरणों को नजरअंदाज कर देते हैं या उनका क्रम बिगाड़ देते हैं। इस लापरवाही का खामियाजा इमारत खड़े होने के कुछ समय बाद भुगतना पड़ता है। जमीन के नीचे मौजूद प्राकृतिक नमी को दीवारों के जरिए ऊपर चढ़ने से रोकने के लिए नींव के स्तर पर डैम्प प्रूफ कोर्स यानी DPC का निर्माण बेहद आवश्यक होता है। इसे जमीन की सतह से कम से कम 150 मिलीमीटर की ऊंचाई पर एक ठोस और अभेद्य रुकावट के तौर पर तैयार किया जाता है। जब यह परत शुरुआत में ही सही सामग्री और पूरी तकनीकी सावधानी के साथ बिछा दी जाती है, तो भूजल का रिसाव ईंटों और गारे के जरिए पहली मंजिल या कमरों की दीवारों तक कभी नहीं पहुंच पाता, जिससे भविष्य की बड़ी सिरदर्दी पहले ही टल जाती है।
कंक्रीट ढलाई और छत के उचित ढलान पर विशेष निगरानी
मकान की छत डालते समय कंक्रीट के मिश्रण में प्रमाणित वॉटरप्रूफिंग लिक्विड का अनुपात सही रखना चाहिए। इस रसायन के प्रयोग से कंक्रीट के भीतर सूक्ष्म छिद्र नहीं बनते और उसमें पानी सोखने की क्षमता काफी घट जाती है। इसके साथ ही छत के निर्माण में सबसे अहम भूमिका उसके ढलान की होती है। छत की सतह ऐसी होनी चाहिए कि बारिश का पानी कहीं भी रुका न रहे, बल्कि तीव्र गति से सीधे ड्रेनेज पाइपों की तरफ बह जाए। रसोई और स्नानघर की पाइपलाइन बिछाने में भी बेहतरीन दर्जे की सामग्री का उपयोग करना चाहिए, क्योंकि पाइप के हल्के से जोड़ से होने वाला अदृश्य रिसाव धीरे-धीरे पूरी दीवार की आंतरिक संरचना को खोखला कर देता है।
बारिश की तेज बौछारें बाहरी दीवारों पर सीधे टकराकर भी भीतर नमी पहुंचा देती हैं। इस खतरे से निपटने के लिए बाहरी दीवार पर प्लास्टर चढ़ाते समय सीमेंट के घोल में उपयुक्त वॉटरप्रूफिंग केमिकल मिलाना चाहिए। ऐसा करने से दीवार के ऊपर पानी को रोकने वाला एक मजबूत सुरक्षा कवच बन जाता है। जिन दीवारों पर बारिश और तेज हवा का सीधा प्रहार होता है, वहां इस कार्य में तनिक भी ढिलाई नहीं बरती जानी चाहिए। यदि मकान में पहले से सीलन ने पैर पसार लिए हैं, तो रंग-रोगन का विचार छोड़कर सबसे पहले पानी के स्रोत की पहचान करनी चाहिए। चाहे वह छत की कोई महीन दरार हो, नाली अथवा पाइप की खराबी हो या स्नानघर की भीतरी लीकेज, जब तक मुख्य स्रोत की मरम्मत नहीं होगी, तब तक कोई भी सतही उपाय टिक नहीं पाएगा।
क्षतिग्रस्त दीवार की सफाई और दरारों की तकनीकी भराई
रिसाव के मुख्य स्रोत को ठीक कर लेने के पश्चात सीलन से प्रभावित दीवार की मरम्मत का कार्य क्रमबद्ध तरीके से किया जाना चाहिए। दीवार पर चढ़ा हुआ पुराना पेंट, कमजोर पुट्टी और फूल चुका प्लास्टर पूरी तरह खुरच कर बाहर निकाल देना जरूरी है। किसी पलटे अथवा स्क्रैपर की सहायता से सड़ी हुई परत को पूरी तरह साफ करें और दीवार की सतह की विधिवत घिसाई करें। जब ईंट और सीमेंट की ठोस सतह दिखने लगे, तब किसी प्रतिष्ठित कंपनी के डैम्प प्रूफ अथवा क्रैक फिलर पेस्ट की मदद से सभी खुली दरारों को गहराई तक भर देना चाहिए, जिससे पानी का आंतरिक रास्ता हमेशा के लिए बंद हो जाए।
वॉटरप्रूफिंग केमिकल की परतों के बीच सही समय अंतराल
सफाई और दरारों की भराई पूरी होने के बाद दीवार पर उच्च गुणवत्ता वाले वॉटरप्रूफिंग केमिकल का पहला कोट ब्रश के जरिए लगाया जाता है। निर्माता कंपनी के निर्देशों के अनुसार ही इस रसायन में पानी का मिश्रण तैयार किया जाना चाहिए। पहला कोट लगाने के बाद उसे पूरी तरह सूखने के लिए कम से कम 4 से 5 घंटे का वक्त देना अनिवार्य है। इसके उपरांत करीब 12 से 15 घंटे का अंतराल रखकर दूसरा कोट लगाना चाहिए, जिससे सतह पर एक समान और अटूट परत बन सके। यदि सीलन की स्थिति अत्यधिक विकट हो और नमी जमीन से लगातार ऊपर आ रही हो, तो अनुभवी इंजीनियर की देखरेख में दीवार के निचले हिस्से में इंजेक्शन ग्राउटिंग की आधुनिक तकनीक अपनाई जा सकती है।
दैनिक दिनचर्या और रख-रखाव की जरूरी सावधानियां
कमरों के भीतर हवा का निरंतर आवागमन सीलन को टिकने नहीं देता, इसलिए रोजाना कुछ घंटों के लिए खिड़कियां खोलकर ताजी हवा का रास्ता खोलना चाहिए। अत्यधिक नमी वाले स्नानघर और रसोई में एग्जॉस्ट फैन का नियमित इस्तेमाल करना नमी को दीवारों में जमने से रोकता है। इसके अतिरिक्त, बरसात के दिनों में छत पर किसी भी प्रकार का कबाड़, टूटे हुए गमले, रेत या निर्माण सामग्री जमा न होने दें, क्योंकि इनके आसपास पानी ठहरने लगता है। छत के ढलान की समय-समय पर जांच करते रहें ताकि किसी भी कोने में पानी का ठहराव न बने और घर की संरचना वर्षों तक मजबूत बनी रहे।



















