घर पर दही जमाते समय अक्सर लोगों की यह शिकायत रहती है कि दही गाढ़ा नहीं जमता या जमने के बाद उसमें से पानी अलग होने लगता है। मिथिलांचल के खानपान में दही को एक विशेष स्थान प्राप्त है, जहां लोग सुबह के नाश्ते से लेकर दोपहर के भोजन और रात के खाने तक चूड़ा-दही बड़े चाव से खाते हैं। जब कभी भोजन में कुछ विशेष विकल्प नहीं होता, तब भी लोग दिन के किसी भी पहर चूड़ा-दही को प्राथमिकता देते हैं। पाचन तंत्र को दुरुस्त रखने और खाने के अंत में शुभता के प्रतीक के रूप में दही का सेवन आज व्यापक रूप से किया जाता है। मिथिला क्षेत्र में अपनाई जाने वाली पारंपरिक तरकीब न केवल दही को ठोस और गाढ़ा बनाती है, बल्कि उसका स्वाद भी कई गुना बढ़ा देती है।
मिट्टी के सकोरे की तैयारी और दूध का सटीक तापमान
मिथिलांचल में दही जमाने के लिए पारंपरिक तौर पर मिट्टी के बर्तन का ही उपयोग किया जाता है। प्रक्रिया की शुरुआत में मिट्टी के बर्तन को पानी से अच्छी तरह साफ किया जाता है। इसके बाद उसे थोड़ी देर के लिए आग पर हल्का सा सेंक लिया जाता है। ऐसा करने से बर्तन के भीतर बची नमी खत्म होती है और जब इसमें दही जमता है, तो उसमें सोंधी खुशबू समा जाती है। दूध को सबसे पहले तेज आंच पर अच्छी तरह उबाला जाता है और फिर उसे उसी मिट्टी के बर्तन में पलट दिया जाता है।
दूध को जमाने के लिए सबसे महत्वपूर्ण कड़ी उसका तापमान होती है। इसके लिए दूध को बार-बार उंगली से छूकर परखा जाता है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि वह अत्यधिक खौलता हुआ न हो। जब दूध सिर्फ गुनगुना रह जाता है और उंगली डालने पर जलन का अहसास नहीं होता, तब उसमें लगभग आधा चम्मच दही का जामन मिला दिया जाता है। जामन मिलाने के तुरंत बाद बर्तन को स्थिर तापमान देने के लिए आटे या चावल के बड़े डिब्बे के भीतर दबाकर रख दिया जाता है, जिससे गर्मी बनी रहती है और दही बिना हिले-डुले ठीक से जम जाता है।
हरी मिर्च और थोड़ी चीनी का देसी नुस्खा
दही जमाने की इस प्रक्रिया में एक और अनूठा तरीका काफी प्रचलित है, जिसमें हरी मिर्च का उपयोग किया जाता है। गुनगुने दूध के भीतर जामन के साथ एक साबुत हरी मिर्च डाल दी जाती है। कुछ लोग दूध में हल्की मिठास और बेहतर किण्वन के लिए मामूली सी चीनी भी मिला देते हैं। माना जाता है कि हरी मिर्च और चीनी का यह संयोजन दूध को तेजी से थक्के के रूप में बांधने में मदद करता है।
रात भर इस तरह रखे रहने के बाद जब अगले दिन दही बनकर तैयार होता है, तो उसमें मिट्टी के बर्तन का सौंधापन मौजूद रहता है। इस विधि से तैयार दही की बनावट बेहद ठोस रहती है और उसमें से पानी छूटने की गुंजाइश न के बराबर होती है। खाने में इसका स्वाद बाजार में मिलने वाले सामान्य दही की तुलना में कहीं अधिक स्वादिष्ट और क्रीमी महसूस होता है।


















