घर के आंगन या बगीचे में मोरिंगा यानी सहजन का पेड़ लगाना पोषण और हरियाली दोनों लिहाज से बेहद फायदेमंद साबित होता है। इस पौधे की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह तेज धूप और गर्म मौसम में बहुत तेजी से फलता-फूलता है। अगर आप चाहते हैं कि आपके पेड़ पर फलियां लदकर आएं, तो केवल पौधा लगा देना ही पर्याप्त नहीं है। इसके लिए मौसम का सही चुनाव, जमीन की तैयारी, जल निकासी का उचित प्रबंध, संतुलित खाद और समय पर डालियों की छंटाई जैसे बुनियादी पहलुओं को समझना बेहद आवश्यक है।
मोरिंगा लगाने के लिए सबसे मुफीद मौसम
सहजन की बुवाई का समय स्थानीय जलवायु और फूलों के चक्र पर गहराई से निर्भर करता है। तमिलनाडु एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी के दिशानिर्देशों के मुताबिक, जुलाई से लेकर अक्टूबर तक का समय मोरिंगा लगाने के लिए सबसे उपयुक्त माना गया है। वहीं कुछ विशेष भौगोलिक क्षेत्रों में किसान इसकी रोपाई जून के महीने में भी शुरू कर देते हैं।
उत्तर भारत के मैदानी भागों में मौसम का मिजाज देखकर ही पौधे की रोपाई करनी चाहिए, जहां स्थानीय तापमान और बारिश के दिनों का विशेष ध्यान रखना पड़ता है। रोपाई करते समय ऐसे निचले स्थानों से बिल्कुल बचना चाहिए जहां बारिश या सिंचाई का पानी ठहरता हो। जलभराव की स्थिति सहजन की कोमल जड़ों को सड़ा सकती है, जिससे पूरा पौधा सूखने की कगार पर पहुंच जाता है।
मिट्टी की तैयारी और पीएच का सही संतुलन
सहजन का पौधा विभिन्न प्रकार की जमीनों में अपनी जड़ें जमाने में सक्षम होता है, लेकिन बेहतर बढ़वार के लिए रेतीली बलुई-दोमट मिट्टी को सबसे उत्तम श्रेणी में रखा जाता है। तमिलनाडु एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक आंकड़ों के अनुसार, यह पौधा 6.5 से लेकर 8 पीएच मान वाली मिट्टी में सबसे शानदार विकास दर्शाता है।
जमीन तैयार करते समय सामान्य मिट्टी में अच्छी तरह से सड़ी हुई गोबर की खाद या जैविक कंपोस्ट मिलाना मिट्टी की संरचना को सुधार देता है। इससे जमीन की उर्वरता बढ़ती है और अतिरिक्त पानी आसानी से रिसकर नीचे निकल जाता है, जिससे पौधे की जड़ों को सांस लेने में रुकावट नहीं आती।
बीज बोने की सही गहराई और गमले में उगाने का तरीका
सहजन उगाने के लिए स्वस्थ और उत्तम गुणवत्ता वाले बीजों का चयन पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। बीजों को जमीन में लगभग 2.5 से 3 इंच की गहराई में दबाना सबसे सही रहता है। वैज्ञानिक पद्धति से खेतों में खेती करने के दौरान एक गड्ढे के भीतर दो से तीन बीज डालने की संस्तुति की जाती है, ताकि अंकुरण की सफलता के आधार पर बाद में स्वस्थ पौधे को रखकर अतिरिक्त पौधों का प्रबंधन किया जा सके।
यदि आप इसे किसी गमले या कंटेनर में छत पर उगा रहे हैं, तो बड़े आकार के गमले का चयन करें ताकि जड़ों के फैलाव के लिए पर्याप्त जगह मिल सके। साथ ही, गमले के तलवे में पानी की निकासी वाले छिद्र खुले और साफ होने चाहिए। मोरिंगा को रोजाना भरपूर और सीधी धूप मिलना अनिवार्य है, इसलिए गमले को हमेशा खुली छत या धूप वाली बालकनी में ही रखें।
शुरुआती पोषण, पिंचिंग और पानी देने का नियम
जब पौधा अपनी शुरुआती अवस्था में बढ़ रहा हो, तब जरूरत के हिसाब से संतुलित जैविक खाद देनी चाहिए। पौधे के थोड़ा बड़ा और स्थिर हो जाने के बाद उसके मुख्य तने की ऊपरी कली यानी शीर्ष टहनी की छंटाई करना बहुत लाभदायक होता है। तमिलनाडु एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी का सुझाव है कि मुख्य तने की ऊपरी टहनी को समय पर पिंच करने से पौधे का सीधा बढ़ना रुकता है और अगल-बगल से नई शाखाएं फूटती हैं। जितनी अधिक शाखाएं विकसित होंगी, आगे चलकर फूलों और फलियों की संख्या भी उतनी ही ज्यादा मिलेगी। इसके साथ ही मिट्टी में नमी का नियमित आकलन करते रहें और केवल आवश्यकता पड़ने पर ही पानी दें, क्योंकि जरूरत से ज्यादा सिंचाई पौधे को भारी नुकसान पहुंचाती है।
किस्मों के हिसाब से फलियां आने का समय
सहजन के पेड़ पर फलियां कब लगेंगी, यह पेड़ की देखभाल के अलावा उसकी चुनी गई किस्म और उस क्षेत्र के मौसम पर निर्भर करता है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के शोध के अनुसार, सहजन की भिन्न-भिन्न किस्मों में फूल आने और फलियों के तैयार होने की अवधि एक जैसी नहीं होती। मिसाल के तौर पर, थार हर्ष और थार तेजस जैसी उन्नत किस्मों की फलियां अलग-अलग समयावधि में पककर तैयार होती हैं, इसलिए किस्म की विशेषताओं को जानकर की गई बागवानी हमेशा बेहतर परिणाम देती है।



















