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जैन खान-पान में कंदमूल क्यों वर्जित हैं, अभिनेता सानंद वर्मा के सवाल पर सुधा सागरजी महाराज ने दी आध्यात्मिक व्याख्याजीवनशैली
19 सित॰ 2026, 11:15 pm (35 मिनट पहले)· 0

जैन खान-पान में कंदमूल क्यों वर्जित हैं, अभिनेता सानंद वर्मा के सवाल पर सुधा सागरजी महाराज ने दी आध्यात्मिक व्याख्या

धारावाहिक भाभीजी घर पर हैं के अभिनेता सानंद वर्मा और मुनिपुंगवश्री सुधा सागरजी महाराज के बीच बातचीत का एक वीडियो सामने आया है, जिसमें प्याज, लहसुन और जड़ वाली सब्जियों से परहेज के आध्यात्मिक व अहिंसा के सिद्धांतों को समझाया गया।

लोकप्रिय धारावाहिक 'भाभीजी घर पर हैं' के अभिनेता सानंद वर्मा और जैन संत मुनिपुंगवश्री सुधा सागरजी महाराज के बीच खान-पान के नियमों को लेकर हुई एक चर्चा का वीडियो इंटरनेट पर सामने आया है। इस बातचीत के दौरान अभिनेता ने महाराज से सीधे तौर पर यह सवाल किया कि जैन परंपरा में प्याज, लहसुन और जमीन के भीतर उगने वाली अन्य कंदमूल सब्जियों के सेवन की मनाही के पीछे क्या मुख्य वजह है। इसके जवाब में संत ने जैन परंपरा से जुड़े आध्यात्मिक सिद्धांतों और अहिंसा के दर्शन को विस्तार से सामने रखा।

सानंद वर्मा के सवाल पर संत की व्याख्या

इस बातचीत में अभिनेता सानंद वर्मा ने सबसे पहले सुधा सागरजी महाराज का आशीर्वाद लिया और फिर उनसे पूछा कि जैन समाज में प्याज और लहसुन को भोजन का हिस्सा क्यों नहीं बनाया जाता। इसके जवाब में महाराज ने हल्के-फुल्के अंदाज में संवाद करते हुए बुद्धि और खान-पान के आपसी संबंध पर अपनी व्यक्तिगत समझ साझा की। उन्होंने कहा कि जो चीजें जमीन के नीचे पैदा होती हैं, वे अंधेरे, नमी और मिट्टी के सीधे संपर्क में रहती हैं। इसके विपरीत, जमीन के ऊपर विकसित होने वाले फल और सब्जियों को धूप, खुली हवा और ऑक्सीजन की पूरी प्राप्ति होती है।

महाराज ने अपनी बात आगे बढ़ाते हुए कहा कि उनके दृष्टिकोण के अनुसार जमीन के भीतर उगने वाली चीजों का संबंध मुख्य रूप से शारीरिक शक्ति से होता है, जबकि जमीन के ऊपर प्रकाश और हवा में फलने-फूलने वाले खाद्य पदार्थ बुद्धि से जुड़े होते हैं। हालांकि, बातचीत में कही गई इन बातों को महाराज की अपनी व्यक्तिगत व्याख्या या टिप्पणी के रूप में ही देखा जाना चाहिए, क्योंकि इन्हें वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित तथ्य नहीं माना जा सकता है। इस संवाद को लेकर सोशल मीडिया पर भी एक पोस्ट साझा की गई, जिसमें इस चर्चा के विभिन्न पहलुओं का उल्लेख किया गया था।

जड़ वाली सब्जियों से परहेज और सूक्ष्मजीवों की सुरक्षा

संवाद के दौरान मुनिपुंगवश्री सुधा सागरजी महाराज ने कंदमूल न खाने के पीछे जैन दर्शन का एक और महत्वपूर्ण पहलू स्पष्ट किया। उन्होंने बताया कि जब किसी पौधे की जड़ को मिट्टी से पूरी तरह उखाड़ा जाता है, तो उस प्रक्रिया में जमीन के भीतर रहने वाले असंख्य सूक्ष्मजीवों को चोट पहुंचने अथवा नष्ट होने की प्रबल आशंका रहती है। जैन परंपरा में इस बात पर जोर दिया जाता है कि भोजन प्राप्त करने के लिए किसी भी जीव को अनावश्यक पीड़ा न पहुंचे। इसी कारण आलू, प्याज, लहसुन, गाजर और मूली जैसी तमाम जड़ वाली फसलों को उखाड़ने से होने वाली संभावित हिंसा से बचने के लिए जैन समुदाय इनके सेवन से पूरी तरह दूरी बनाए रखता है।

अहिंसा का सिद्धांत और आध्यात्मिक अनुशासन

जैन धर्म के मूल में अहिंसा का सिद्धांत सबसे ऊंचा स्थान रखता है। इस दर्शन के अनुसार संसार के प्रत्येक छोटे-बड़े जीव में आत्मा का वास होता है और किसी भी जीवित प्राणी को बिना किसी ठोस कारण के कष्ट पहुंचाना हिंसा की श्रेणी में आता है। यह दृष्टिकोण केवल मानवीय आचरण या बातचीत तक सीमित नहीं रहता, बल्कि रोजमर्रा के भोजन चयन पर भी पूरी तरह लागू होता है। इसी कारण जैन परंपरा में भोजन का चुनाव अत्यंत सतर्कता से किया जाता है, ताकि किसी भी जीव को न्यूनतम क्षति हो। इसके अतिरिक्त, सात्विक खान-पान को मन, इंद्रियों के संयम और आंतरिक आध्यात्मिक साधना को सुदृढ़ करने का साधन भी माना जाता है।

गृहस्थों और साधु-संतों के लिए खान-पान के नियम

भारतीय रसोई में जहां प्याज और लहसुन का प्रयोग रोजमर्रा के खान-पान में आम बात है, वहीं जैन परंपरा में इसे साधारण स्वाद या स्वास्थ्य के नजरिए से नहीं देखा जाता। जैन साधु और साध्वियों के लिए भोजन संबंधी आचार संहिता सामान्य गृहस्थों की तुलना में कहीं अधिक कठोर और अनुशासित होती है। इसलिए प्याज, लहसुन, आलू और अन्य कंदमूल से परहेज को केवल खान-पान की निजी पसंद समझने के बजाय जैन धर्म की गहरी अहिंसक परंपरा, जीवन रक्षा के संकल्प और आध्यात्मिक अनुशासन के व्यापक परिप्रेक्ष्य में समझना आवश्यक है।

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सवाल-जवाब

सानंद वर्मा ने सुधा सागरजी महाराज से क्या सवाल पूछा था?
सानंद वर्मा ने पूछा कि जैन समुदाय में प्याज, लहसुन और अन्य जड़ वाली सब्जियों को खाने से परहेज क्यों किया जाता है।
जैन धर्म में जड़ वाली सब्जियों को खाने से क्यों बचा जाता है?
जड़ वाली सब्जियों को जमीन से उखाड़ते समय मिट्टी के सूक्ष्मजीवों को नुकसान पहुंचने की संभावना रहती है, इसलिए अहिंसा के पालन हेतु इनसे परहेज किया जाता है।
जैन परंपरा में कौन सी मुख्य जड़ वाली सब्जियां नहीं खाई जाती हैं?
जैन परंपरा में आलू, प्याज, लहसुन, गाजर और मूली जैसी कंदमूल सब्जियों का सेवन नहीं किया जाता है।
सुधा सागरजी महाराज ने जमीन के ऊपर और नीचे उगने वाली चीजों के बारे में क्या कहा?
उन्होंने कहा कि जमीन के नीचे उगने वाली चीजें अंधेरे और नमी में रहती हैं जबकि ऊपर उगने वाली चीजें धूप और हवा में पलती हैं, जिसे उन्होंने क्रमशः शारीरिक शक्ति और बुद्धि से जोड़ा।
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टिप्पणियाँ 1

Nyra Kaif@nyra-kaif·14 मिनट पहले

यह बातचीत दिखाती है कि सेलिब्रिटी संस्कृति और पारंपरिक जीवनशैली के बीच संवाद कैसे नए डिजिटल ट्रेंड बन रहे हैं। जब मुख्यधारा के कलाकार ऐसे आध्यात्मिक विषयों पर सवाल उठाते हैं, तो यह सामग्री सोशल मीडिया पर तेज़ी से वायरल होती है और आधुनिक जीवन में माइंडफुल इटिंग या अहिंसक आहार जैसी प्राचीन अवधारणाओं की प्रासंगिकता पर एक नई बहस छेड़ देती है।

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