बाजार में सामान खरीदते वक्त ग्राहकों के मन में अक्सर यह सवाल उठता है कि कहीं दुकानदार उनसे जरूरत से ज्यादा कीमत तो नहीं वसूल रहा है। यह दुविधा खासकर तब और बढ़ जाती है जब लोग कपड़े खरीदने निकलते हैं। कई बार सही जानकारी न होने की वजह से खरीदार तय कीमत से कहीं अधिक पैसे चुका आते हैं। सही तालमेल और समझदारी से खरीदारी की जाए तो किसी भी तरह के नुकसान से बचा जा सकता है और वाजिब दाम पर बेहतरीन कपड़े खरीदे जा सकते हैं।
बदलते दौर में खरीदारी और मोलभाव का गणित
जमुई जिले में कपड़ों का व्यापार करने वाले चंदन कुमार का कहना है कि मोलभाव को लेकर खरीदारों के बीच कई तरह की गलतफहमियां बनी रहती हैं। इन भ्रमों को दूर करके कोई भी व्यक्ति बहुत सहजता से अपनी खरीदारी पूरी कर सकता है। उनके अनुसार पुराने समय में जिस बड़े स्तर पर मोलभाव का चलन हुआ करता था, आज की परिस्थितियां वैसी बिल्कुल नहीं रह गई हैं। बाजार के स्वरूप में व्यापक बदलाव आया है और अब ग्राहक भी इन तकनीकी पहलुओं और बदलती व्यवस्था को गहराई से समझने लगे हैं।
फिक्स्ड प्राइस दुकानों से खरीदारी का विकल्प
चंदन कुमार का सुझाव है कि अगर कोई ग्राहक पूरी तरह उचित और पारदर्शी दाम पर कपड़े हासिल करना चाहता है, तो उसका सबसे सीधा और सुरक्षित रास्ता यह है कि मोलभाव वाली दुकानों के बजाय तय दर वाली दुकानों का रुख किया जाए। जिन दुकानों पर मोलभाव की गुंजाइश रखी जाती है, वहां किसी कपड़े का वास्तविक मूल्य तय कर पाना एक आम खरीदार के लिए बेहद पेचीदा काम बन जाता है।
वर्तमान समय में फिक्स्ड रेट मॉडल पर चलने वाले प्रतिष्ठानों का दायरा काफी बढ़ चुका है। ऐसे स्टोर्स में कपड़ों पर जब भी कोई विशेष छूट या ऑफर आता है, तो वहां 10% से लेकर 15% तक की सीधी रियायत दी जाती है। इस व्यवस्था का सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि खरीदार को किसी तरह की सौदेबाजी या बहस में समय नहीं गंवाना पड़ता। अधिकांश प्रतिष्ठित ब्रांड और आधुनिक आउटलेट्स इसी कार्यप्रणाली पर काम करते हैं, जो खरीदारी का एक तनावमुक्त जरिया साबित होता है।
पारंपरिक दुकानों पर मोलभाव का सही फार्मूला
यदि ग्राहक किसी ऐसे पारंपरिक बाजार में मौजूद हैं जहां सामान्य दुकानों पर मोलभाव करके ही सामान बेचा जाता है, तो वहां अतिरिक्त सतर्कता बरतनी जरूरी हो जाती है। ऐसी दुकानों पर विक्रेता आमतौर पर शुरुआत में ही वस्तु का दाम काफी बढ़ाकर बताते हैं। ऐसी स्थिति में खरीदार को चाहिए कि वह बताई गई कीमत से लगभग 30% तक कम करके अपना दाम लगाए।
मूल्य का यह अंतर अलग-अलग बाजारों और स्थानीय माहौल पर भी निर्भर करता है, क्योंकि कई जगहों पर व्यापारी अप्रत्याशित रूप से बहुत अधिक दर कोट कर देते हैं। इससे निपटने का सबसे सटीक उपाय यह है कि अंतिम फैसला लेने से पहले कम से कम दो-तीन अलग-अलग दुकानों पर जाकर संबंधित वस्तु की कीमतें जरूर जान लें। जब आप कई दुकानों से पड़ताल कर लेते हैं, तो आपको उत्पाद की वास्तविक बाजार कीमत का सटीक अंदाजा मिल जाता है।
उदाहरण के तौर पर यदि किसी कपड़े की कीमत दुकानदार की ओर से एक हजार रुपये बताई जा रही है, तो ग्राहक उसे सात सौ या साढ़े सात सौ रुपये का प्रस्ताव देकर आसानी से खरीद सकता है। इसके पीछे का व्यावहारिक कारण यह है कि सामान्य तौर पर खुदरा कपड़ों के व्यापार में इससे ज्यादा का मुनाफा मार्जिन उपलब्ध नहीं होता है। इस नियम का ध्यान रखकर खरीदारी करने पर कोई भी दुकानदार खरीदार को गुमराह नहीं कर पाएगा।



















