मिट्टी के बर्तन और चूल्हे का कमाल
पान के शौकीन जानते हैं कि पान की असली जान उसमें लगने वाला चूना है। मिथिलांचल में आज भी पारंपरिक तरीके से चूना तैयार करने की एक अनूठी परंपरा जीवित है। यह प्रक्रिया काफी धैर्य की मांग करती है और इसे पूरा होने में 24 घंटे का समय लग जाता है। इसमें मुख्य रूप से डोका यानी घोंघे के खोल या छिलकों का इस्तेमाल किया जाता है।
कैसे तैयार होता है शुद्ध चूना
TrendKia की जानकारी के अनुसार, इस प्रक्रिया में मिट्टी के चूल्हे का उपयोग किया जाता है। अनुराग मिश्रा ने, जो मधुबनी के नवटोल के निवासी हैं, इस पारंपरिक कला को संरक्षित करने के लिए एक डॉक्यूमेंट्री भी बनाई है। प्रक्रिया के दौरान, मिट्टी के चूल्हे में लकड़ियों और घोंघे के छिलकों की कई परतें बनाई जाती हैं। आग लगाने के बाद, ये छिलके राख के रूप में सफेद और मोटे दिखने लगते हैं। इसके बाद, इन्हें साफ करके मिट्टी के बर्तन में पानी के साथ 24 घंटे के लिए भिगोकर छोड़ दिया जाता है, जिसके बाद यह चूना खाने के लिए तैयार हो जाता है।
मिथिलांचल की संस्कृति और पान
मिथिलांचल में पान का महत्व मछली और मखाना की तरह ही है। हालांकि समय के साथ पान खाने वालों की संख्या में बदलाव आया है, लेकिन आज भी शादी-विवाह, तिलक समारोह और पूजा-पाठ जैसे अवसरों पर पान की विशेष भूमिका होती है। पहले हर घर के आंगन में पान का पौधा दिखाई देता था और लोग इसे खुद ही तैयार करते थे। यह पारंपरिक चूना शुद्धता का प्रतीक माना जाता है और अब बहुत कम घरों में इस पुराने तरीके को देखा जाता है।













