घरेलू साज-सज्जा और लंबे समय तक चलने वाले इंटीरियर निर्माण में मजबूत फर्नीचर की भूमिका सबसे अहम होती है। जब भी नया मकान तैयार होता है या पुराने घर का नवीनीकरण कराया जाता है, तो टिकाऊ लकड़ी का चयन करना सबसे बड़ी चुनौती बन जाता है। कई बार लोग भारी रकम खर्च करके महंगी लकड़ी खरीद लाते हैं, लेकिन कुछ ही वर्षों के भीतर उसमें दरारें उभरने लगती हैं, दीमक का हमला हो जाता है या घुन लगने से ढांचा भीतर से खोखला होने लगता है। महंगे दामों पर खरीदी गई सामग्री का इस तरह असमय बेकार होना केवल लकड़ी की प्रजाति पर निर्भर नहीं करता, बल्कि उसकी सही तैयारी से जुड़ा विषय है।
सहारनपुर की काष्ठ कला और लकड़ी तैयार करने का वैज्ञानिक तरीका
उत्तर प्रदेश का सहारनपुर जिला दुनिया भर में अपनी उत्कृष्ट काष्ठ नक्काशी और लकड़ी उद्योग के लिए विशेष पहचान रखता है। यहां के अनुभवी कारीगरों और व्यापारियों के स्पष्ट अनुभव बताते हैं कि केवल उत्तम किस्म की लकड़ी चुन लेना ही लंबे जीवन का भरोसा नहीं देता। लकड़ी का वास्तविक टिकाऊपन इस बात पर टिका होता है कि कटाई के बाद उसका रासायनिक उपचार और वैज्ञानिक विधि से सीजनिंग का काम कितने व्यवस्थित ढंग से पूरा किया गया है।
सागवान और शीशम के अलावा अन्य विकल्पों की उपयोगिता
भारतीय जलवायु परिस्थितियों और रोजमर्रा के उपयोग को देखते हुए सागवान यानी टीक वुड और शीशम को घरेलू फर्नीचर के लिए सबसे बेहतरीन विकल्प स्वीकार किया जाता है। इन दोनों ही लकड़ियों की प्राकृतिक बुनावट काफी घनी और ठोस होती है, जिसके चलते सामान्य प्रजातियों के मुकाबले इनमें घुन लगने का जोखिम बेहद कम पाया जाता है। इसके साथ ही विशेष प्रकार के सजावटी उत्पादों, हैंडीक्राफ्ट और घरेलू सामानों को तैयार करने के लिए नीम और आम की लकड़ी का भी व्यापक इस्तेमाल होता है। विदेशी बाजारों के भीतर बड़े फर्नीचर के स्थान पर आम की लकड़ी और बबूल से तैयार किए गए गिफ्ट आइटम्स और हैंडीक्राफ्ट उत्पादों की भारी मांग देखने को मिलती है।
बोरिक और बोरेक्स रसायन से मिलता है सुरक्षा चक्र
कच्ची लकड़ी को कीटों और मौसम के असर से सुरक्षित रखने के लिए विशेष रासायनिक प्रक्रिया अपनाई जाती है। लकड़ी की सीजनिंग के क्षेत्र में सक्रिय स्थानीय विशेषज्ञ तंजीम नवाज के अनुसार, बोरिक और बोरेक्स रसायनों का उचित मिश्रण लकड़ी के संरक्षण के लिए सबसे असरदार उपाय साबित होता है। यह रासायनिक घोल लकड़ी के आंतरिक रेशों तक गहराई से प्रवेश कर जाता है, जिससे दीमक और घुन के पनपने की गुंजाइश पूरी तरह समाप्त हो जाती है। व्यवस्थित केमिकल ट्रीटमेंट मिलने के बाद किसी भी सामान्य स्तर की लकड़ी की कार्यशील उम्र में तत्काल 10 से 15 साल का सीधा इजाफा हो जाता है।
प्राकृतिक नमी को 95 प्रतिशत से घटाकर मानक स्तर पर लाना
आरा मशीनों या जंगलों से जब ताजी कटी लकड़ी पहुंचती है, तो उसमें लगभग 95 प्रतिशत तक प्राकृतिक नमी मौजूद रहती है। यदि इस अत्यधिक गीली लकड़ी से सीधे टेबल, कुर्सी या अलमारी तैयार कर दी जाए, तो हवा के संपर्क में सूखने पर वह मुड़ जाएगी, तिरछी हो जाएगी और उसमें गहरी दरारें पड़ जाएंगी। तंजीम नवाज स्पष्ट करते हैं कि आधुनिक ड्रायर और तकनीकी सीजनिंग चैंबरों की मदद से इस प्राकृतिक गीलेपन को धीरे-धीरे सुखाया जाता है। मानक प्रक्रिया पूरी होने के बाद लकड़ी के भीतर नमी का स्तर घटकर केवल 10, 12 या अधिकतम 14 प्रतिशत तक ही बचता है। इस निर्धारित नमी स्तर पर पहुंचने के बाद ही लकड़ी बारीक नक्काशी और मजबूत ढांचा तैयार करने योग्य मानी जाती है।
अवैध भट्टियों और गैर-मानक तरीकों से होने वाला नुकसान
बाजार में हाल के समय में बिना मानक वाली अवैध भट्टियों और गैर-प्रमाणित चैंबरों के संचालन से तैयार लकड़ी की गुणवत्ता पर गंभीर असर पड़ा है। सही वैज्ञानिक चैंबरों के स्थान पर साधारण भट्टियों में जबरन अत्यधिक आंच देकर सुखाई गई लकड़ी ऊपर से तो सख्त नजर आती है, मगर उसका आंतरिक संतुलन बिगड़ जाता है। ऐसी लकड़ी बाद में घर के सामान्य वातावरण में आते ही दोबारा नमी सोखने लगती है और फर्नीचर फूलने या चटकने लगता है। इसलिए टिकाऊ फर्नीचर तैयार करवाते समय हमेशा वैज्ञानिक रूप से सीजन की गई और पूरी तरह प्रमाणित लकड़ी का ही चयन करना चाहिए।


















