सार्वजनिक जीवन और शासन व्यवस्था में 25 वर्ष का लंबा सफर तय करने के ऐतिहासिक पड़ाव पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के व्यक्तित्व की बुनियाद एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। इस खास अवसर को भारतीय जनता पार्टी की तरफ से जनसेवा दिवस के रूप में चिन्हित किया गया है। ढाई दशक के इस कार्यकाल के दौरान देश की नीतियों और व्यवस्था में कई बड़े बदलाव दर्ज किए गए हैं, लेकिन इस पूरे सफर में उनकी सबसे बड़ी नैतिक ताकत उनकी मां हीराबेन मोदी की दी हुई परवरिश रही है। प्रधानमंत्री ने कई अलग-अलग मंचों पर इस बात को रेखांकित किया है कि उनकी मां के सिद्धांतों ने उन्हें एक संवेदनशील नागरिक और समर्पित जनसेवक के तौर पर तराशने का काम किया।
पद संभालने से पहले मिली थी ईमानदारी की कड़ी हिदायत
सार्वजनिक पद पर बैठने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए शुचिता सबसे बड़ी परीक्षा होती है। जब नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री का पदभार संभालने जा रहे थे, तब उनकी मां ने उन्हें एक बेहद सरल किंतु कड़े अनुशासन से भरी सलाह दी थी। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि कभी किसी से रिश्वत मत लेना। यह एक ऐसा बुनियादी वाक्य था जिसने उनके पूरे प्रशासनिक और राजनीतिक जीवन के सिद्धांतों की दिशा तय कर दी। प्रधानमंत्री ने अक्सर अपने भाषणों और बातचीत में यह दोहराया है कि मां की यह हिदायत उनके जीवन के मूलभूत आचरण का अटूट हिस्सा बन गई, जिसे उन्होंने कभी भी अपने रास्ते से हटने नहीं दिया।
कठिन परिस्थितियों को मात देने का जरिया बना अनवरत परिश्रम
हीराबेन मोदी का निजी जीवन निरंतर संघर्षों और चुनौतियों से भरा हुआ था। बेहद सीमित संसाधनों और कमजोर आर्थिक हालात के बावजूद उन्होंने कभी हिम्मत नहीं हारी और लगातार मेहनत करते हुए अपने पूरे परिवार की जिम्मेदारी उठाई। इस कठिन दौर से उन्होंने अपने बच्चों को यह सबक दिया कि दुनिया में कोई भी मुश्किल ऐसी नहीं है जिसे कड़ी मेहनत से हल न किया जा सके। प्रधानमंत्री के मुताबिक उनकी मां का मानना था कि विषम हालात से बाहर निकलने का सबसे सटीक और अचूक रास्ता सिर्फ और सिर्फ निरंतर परिश्रम करना ही है।
दिखावे से दूरी और सादगी से सीखी जमीन पर टिके रहने की कला
आधुनिक जीवन में जहां वैभव और संपत्ति को प्रतिष्ठा का पैमाना माना जाता है, वहीं हीराबेन का पूरा जीवन सादगी की मिसाल बना रहा। उनके पास न तो कोई बड़ी संपत्ति थी और न ही उन्हें महंगे आभूषणों या दिखावे वाली चीजों का कोई शौक था। उन्होंने ताउम्र एक बेहद साधारण दिनचर्या अपनाई। इसी आचरण को देखकर नरेंद्र मोदी ने यह सीखा कि सत्ता या प्रभाव के शिखर पर पहुंचने के बाद भी इंसान को हमेशा जमीन से जुड़ा रहना चाहिए और विनम्रता को कभी नहीं छोड़ना चाहिए। अपनी मां के 100वें जन्मवर्ष के मौके पर लिखे गए एक भावुक ब्लॉग में भी उन्होंने इस सादगी भरे जीवन के प्रभावों का विस्तार से उल्लेख किया था।
अन्न की बर्बादी रोकने और भोजन के आदर का नियम
परिवार के भीतर संसाधनों की कद्र करना सिखाने के लिए हीराबेन का नियम बेहद सख्त और स्पष्ट था। वह अपने बच्चों को बचपन से यह समझाती थीं कि अपनी थाली में उतना ही भोजन परोसना चाहिए जितना खाया जा सके। भोजन का एक भी दाना बर्बाद करना उनके उसूलों के खिलाफ था और वह स्वयं भी इस नियम का कड़ाई से पालन करती थीं। प्रधानमंत्री ने इस बात को कई बार साझा किया है कि बचपन में मिले इस संस्कार ने उन्हें जीवन भर अन्न और संसाधनों के प्रति सजग और आदर भाव से युक्त बनाए रखा।
जीव मात्र के प्रति दया, करुणा और सेवा की भावना
हीराबेन का सरोकार केवल अपने परिवार तक सीमित नहीं था, बल्कि वह पूरे समाज और मूक प्राणियों के प्रति भी उतनी ही संवेदनशील थीं। गर्मियों के दिनों में पक्षियों के लिए पानी का प्रबंध करना, रोज गायों के लिए रोटी निकालना और अपने आसपास के किसी भी जरूरतमंद इंसान की मदद के लिए तत्पर रहना उनके रोजमर्रा के स्वभाव का हिस्सा था। इन्हीं आदतों को देखते हुए प्रधानमंत्री के भीतर समाज सेवा, कमजोरों के प्रति करुणा और नागरिक जिम्मेदारी की गहरी भावना विकसित हुई। इसके साथ ही उन्होंने यह भी साबित किया कि किसी व्यक्ति के पास औपचारिक शिक्षा की डिग्री न होने के बावजूद वह व्यावहारिक रूप से बेहद ज्ञानवान और समझदार हो सकता है, यही वजह रही कि उन्होंने हमेशा ज्ञान और शिक्षकों का आदर करने की सीख दी।


















