सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ न्यायाधीश जस्टिस उज्जल भुइयां ने देश में असहमति की आवाज को दबाने और नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों के सिकुड़ने पर गहरी चिंता व्यक्त की है। भोपाल में नेशनल लॉ इंस्टीट्यूट यूनिवर्सिटी में आयोजित जस्टिस जीपी सिंह मेमोरियल लेक्चर के दौरान बोलते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखना और विरोध प्रदर्शन करना हर नागरिक का संवैधानिक अधिकार है। जस्टिस भुइयां ने कहा कि लोकतंत्र की असली आत्मा इसी बात में निहित है कि किसी भी विषय पर खुलकर चर्चा हो और असहमति को भी पूरा स्थान मिले। उन्होंने न्यायपालिका को सचेत करते हुए कहा कि यदि अदालतें भी ऐसी सख्त और अनुचित जमानत शर्तें लगाने लगेंगी जिससे लोगों की आवाज दबे, तो आम जनता का न्याय प्रणाली पर से भरोसा उठ जाएगा।
वाराणसी बिरयानी मामले और छात्रों की गिरफ्तारी पर उठाए सवाल
अपने संबोधन के दौरान जस्टिस उज्जल भुइयां ने वाराणसी में गंगा नदी में बोट पर इफ्तार के दौरान चिकन बिरयानी खाने के मामले का प्रमुखता से उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि इस घटना में कुछ युवाओं को पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर तीन महीने तक जेल में बंद रखा गया। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या देश के किसी कानून में गंगा नदी पर बिरयानी खाना कोई अपराध घोषित किया गया है। जब ऐसा कोई कानून मौजूद ही नहीं है, तो उन युवाओं को तीन महीने तक जमानत क्यों नहीं दी गई। उन्होंने पर्यावरण संरक्षण की दिशा में काम करने वाले कार्यकर्ताओं के साथ अपराधियों जैसा व्यवहार किए जाने पर भी निराशा व्यक्त की। इसके साथ ही उन्होंने विभिन्न विश्वविद्यालयों में अपनी जायज मांगों को लेकर शांतिपूर्ण आंदोलन करने वाले छात्रों की गिरफ्तारी और उन्हें सस्पेंड किए जाने की घटनाओं पर भी रोष जताया और कहा कि आज देश में शांतिपूर्ण विरोध की जगह लगातार सीमित हो रही है।
अदालतों की जमानत शर्तों और अभिव्यक्ति की आजादी पर टिप्पणी
जस्टिस भुइयां ने अदालतों द्वारा जमानत मंजूर करते समय लगाई जा रही अजीबोगरीब शर्तों पर भी अपनी असहमति दर्ज कराई। उन्होंने दिल्ली दंगे और कुछ फेसबुक पोस्ट से जुड़े मामलों का जिक्र करते हुए कहा कि अक्सर देखा जा रहा है कि कोर्ट ऐसी शर्तें लगा रही हैं जिनका उस मामले से कोई सीधा संबंध ही नहीं होता। उन्होंने न्यायपालिका से आत्मचिंतन करने को कहा कि क्या इस प्रकार की शर्तें लोगों को सार्वजनिक जीवन से दूर रहने और अपनी अभिव्यक्ति को रोकने का संदेश नहीं दे रही हैं। इसके अलावा, मुंबई में गाजा और फिलिस्तीन के समर्थन में आयोजित होने वाले शांतिपूर्ण प्रदर्शन की अनुमति न मिलने और उस पर बॉम्बे हाईकोर्ट द्वारा की गई टिप्पणियों पर भी उन्होंने अचरज प्रकट किया। उन्होंने साफ किया कि वैश्विक मुद्दों पर अपनी मानवीय संवेदना या विरोध प्रकट करना भी नागरिकों के मौलिक अधिकारों के अंतर्गत आता है।
संविधान की सर्वोच्चता और शैक्षणिक संस्थानों की भूमिका
छात्रों और वहां उपस्थित लोगों के साथ संवाद करते हुए वरिष्ठ न्यायाधीश ने कहा कि किसी भी विश्वविद्यालय का काम केवल डिग्रियां बांटना नहीं होता, बल्कि ये संस्थान स्वतंत्र रूप से सोचने और सवाल पूछने की क्षमता विकसित करने के लिए होते हैं। उन्होंने सत्ता और संविधान के बीच के फर्क को स्पष्ट करते हुए कहा कि सरकारें तो लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के तहत आती-जाती रहती हैं, लेकिन देश का संविधान स्थाई है। इसलिए यह सरकार, संसद और हमारी न्यायपालिका, तीनों का परम कर्तव्य है कि वे मिलकर संविधान की मूल भावना और उसके आधारभूत ढांचे की रक्षा करें।
जस्टिस विशाल धगट ने रेखांकित किया न्यायपालिका का दायित्व
इस गरिमामयी कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस विशाल धगट ने भी इस विषय पर अपने विचार साझा किए। उन्होंने अपने संबोधन में इस बात पर विशेष बल दिया कि न्यायपालिका का सबसे प्राथमिक और महत्वपूर्ण कर्तव्य देश के संविधान और नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करना है। उन्होंने जोर देकर कहा कि न्यायाधीशों को अपने निर्णय लेते समय किसी भी प्रकार के जनभावनाओं के ज्वार या बाहरी दबाव में नहीं आना चाहिए। न्यायपालिका को हमेशा केवल और केवल स्थापित कानूनों और संवैधानिक मूल्यों के आधार पर ही पूरी निष्पक्षता के साथ अपने फैसले सुनाने चाहिए।



















