महाराष्ट्र के विभिन्न ग्रामीण अंचलों में मानसून की विदाई के साथ ही सूखे और अकाल का गंभीर संकट गहराने लगा है। उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली पार्टी शिवसेना-यूबीटी ने किसानों की दुर्दशा को लेकर राज्य प्रशासन पर तीखा हमला बोला है। पार्टी ने आरोप लगाया है कि मराठवाड़ा, उत्तर महाराष्ट्र और विदर्भ का काश्तकार पानी और चारे की भारी किल्लत से जूझ रहा है, जबकि शासन से जुड़े जनप्रतिनिधि और अधिकारी संवेदनशील बैठकों में शाही ऐशो-आराम का लुत्फ उठा रहे हैं। राज्य की आधी से अधिक आबादी के अकाल की छाया में होने की बात कहते हुए विपक्षी दल ने चेतावनी दी है कि यदि ठोस कदम नहीं उठाए गए तो प्रदेश में भुखमरी, भय और प्यास जैसी बेहद गंभीर स्थितियां उत्पन्न हो सकती हैं।
नांदेड़ की बैठक और सूखे मेवे पर छिड़ा सियासी विवाद
विपक्षी दल ने हाल ही में नांदेड़ के विश्राम गृह में संपन्न हुई एक प्रशासनिक बैठक का उल्लेख किया, जहां राज्य के कृषि मंत्री दत्तामामा भरणे मराठवाड़ा क्षेत्र में अकाल की परिस्थितियों का मुआयना करने पहुंचे थे। आरोप लगाया गया कि जमीनी हकीकत का जायजा लेने से पहले बुलाई गई इस बैठक में मंत्रियों, विधायकों और सांसदों की मौजूदगी में काजू, बादाम और सूखे मेवे परोसे गए। इसे तबाह हो चुके काश्तकारों के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा आचरण बताते हुए पार्टी ने कहा कि जहां खेत में खड़ी फसलें सूखने से अन्नदाता चीख-पुकार कर रहा है, वहीं सत्ता पक्ष मौज-मस्ती में व्यस्त है। इस दौरान सांसद बंडू जाधव द्वारा बैठक में काजू-बादाम के सेवन का खुला समर्थन करने पर भी कड़े ऐतराज दर्ज किए गए और 50-50 करोड़ रुपये के कथित लेन-देन का तंज कसते हुए नेताओं की प्राथमिकताओं पर सवाल दागे गए।
देवेंद्र फडणवीस की प्रतिक्रिया पर उठाए गए सवाल
इस पूरे मामले पर मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के रुख की भी कड़ी आलोचना की गई है। मुख्यमंत्री ने इस घटनाक्रम पर टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसी बैठकों में काजू-बादाम खाना अनुचित है, प्रशासन को संवेदनशीलता बरतनी चाहिए और विपक्ष को हर बात पर राजनीति करने की आदत है। विपक्षी दल का तर्क है कि मुख्यमंत्री ने अपनी जवाबदेही से पल्ला झाड़ते हुए पूरा ठीकरा सीधे प्रशासनिक तंत्र पर फोड़ दिया। उनका कहना है कि सरकार की इस असंवेदनशीलता ने किसानों की तकलीफों को और बढ़ा दिया है। मुख्यमंत्री का दावा है कि मंत्रिमंडल की बैठक में हालात पर गहन मंथन हुआ है और सभी जिलों की प्राथमिक समीक्षा पूरी होते ही आधिकारिक पंचनामे कर तुरंत आर्थिक मदद दी जाएगी, लेकिन विपक्ष का मानना है कि जमीनी अमल के बिना ये महज खोखले वादे बनकर रह गए हैं।
फसलों का विनाश, मवेशियों का चारा और उजड़ते परिवार
राज्य के कई जिलों में प्राकृतिक आपदा के चलते खड़ी फसलों को अपूरणीय क्षति पहुंची है। खासतौर पर सोयाबीन की पूरी फसल जलकर खाक हो चुकी है और निराश किसान खेत की मेड़ों पर बैठकर आंसू बहाने को मजबूर है। ग्रामीण इलाकों में मवेशियों के लिए चारे का गंभीर अभाव पैदा हो गया है, पीने के साफ पानी की भारी किल्लत है, बच्चों की स्कूल-कॉलेज की शिक्षा अधर में लटक गई है और बेटियों के विवाह टल रहे हैं। घरों में चूल्हे बुझने की नौबत आ चुकी है। प्रधानमंत्री के जन्मदिन के अवसर पर हजारों तेल के दीये जलाए जाने की तुलना करते हुए सवाल उठाया गया कि क्या ऐसे आयोजनों से सूखाग्रस्त इलाकों की जमीनी त्रासदी दूर हो सकती है, जबकि संकट के समय सूखे मेवे का जलसा बेहद शर्मनाक तस्वीर पेश करता है।
विशेष विधानसभा सत्र और तत्काल आर्थिक सहायता का प्रस्ताव
संकट की गंभीरता को देखते हुए शिवसेना-यूबीटी ने मांग रखी है कि राज्य सरकार को तुरंत विधानमंडल का विशेष सत्र बुलाना चाहिए ताकि अकाल पर व्यापक चर्चा हो सके। इसके साथ ही दलीय मतभेदों को भुलाकर एक सर्वदलीय 'टास्क फोर्स' के गठन का सुझाव दिया गया है। पार्टी ने शरद पवार के रुख का समर्थन करते हुए कहा कि सरकार को किसी भी औपचारिक तकनीकी नियम या मानदंड का इंतजार किए बगैर समूचे राज्य में आधिकारिक अकाल घोषित कर देना चाहिए। राहत पैकेज के तहत प्रभावित किसानों को प्रति हेक्टेयर 50 हजार रुपये की सीधी वित्तीय सहायता देने, संपूर्ण और एकमुश्त कृषि कर्जमाफी लागू करने, जरूरतमंद छात्रों की शैक्षणिक फीस माफ करने और पशुओं को बचाने के लिए तुरंत चारा छावनियां स्थापित करने का आग्रह किया गया है।



















