अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में भू-राजनीतिक अस्थिरता और आपूर्ति से जुड़े जोखिमों के चलते कच्चे तेल की कीमतों में एक बार फिर तेजी देखने को मिल रही है। पिछले दो कारोबारी सत्रों की गिरावट के बाद वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट यानी डब्ल्यूटीआई क्रूड एशियाई कारोबारी घंटों के दौरान 98.60 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गया। इस पूरे महीने में कच्चे तेल की कीमतों में 10 प्रतिशत से अधिक की तेजी दर्ज की जा चुकी है, जिसका मुख्य कारण मध्य पूर्व में जारी सैन्य संघर्ष और पूर्वी यूरोप में रूस तथा यूक्रेन के बीच बढ़ता तनाव है। इसके साथ ही होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों पर हुए हमलों और अमेरिका-ईरान के बीच संभावित कूटनीतिक समझौतों को लेकर आ रही मिली-जुली खबरों ने बाजार में अनिश्चितता का माहौल बनाए रखा है।
मध्य पूर्व में कूटनीति और आपूर्ति संकट की स्थिति
मध्य पूर्व में संघर्ष विराम को लेकर चल रही बातचीत अभी तक किसी अंतिम निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सकी है। पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर ने हाल ही में तेहरान का दौरा किया, जहां उन्होंने वरिष्ठ ईरानी राजनयिकों और सैन्य अधिकारियों के साथ द्विपक्षीय संबंधों और वॉशिंगटन के साथ जारी वार्ताओं पर चर्चा की। इस चर्चा में शामिल एक राजनयिक ने स्पष्ट किया कि टकराव को समाप्त करने की कूटनीतिक कोशिशें अभी भी जारी हैं, लेकिन किसी अंतिम समझौते के तुरंत होने की अटकलें पूरी तरह निराधार हैं। समझौते की संभावनाओं के खारिज होने से तेल बाजार को कीमतों में गिरावट के दबाव से राहत मिली और तेजी का रुख कायम रहा।
सप्लाई के मोर्चे पर हालात काफी चुनौतीपूर्ण बने हुए हैं। पिछले दो हफ्तों के दौरान दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल पारगमन मार्गों में से एक, होर्मुज जलडमरूमध्य में कम से कम 18 जहाजों पर हमले दर्ज किए गए हैं। सऊदी अरब, ईरान समर्थित हूती बलों, रूस और यूक्रेन से जुड़े संघर्षों ने अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति श्रृंखला पर गहरा असर डाला है। इन गंभीर बाधाओं के बावजूद इस क्षेत्र का ऊर्जा ढांचा लचीला साबित हुआ है और मध्य पूर्व से कच्चे तेल की निकासी युद्ध-पूर्व स्तर के लगभग 80 प्रतिशत तक बहाल हो चुकी है। वित्तीय सेवा कंपनी सोसिएते जेनेराले के रणनीतिकारों का कहना है कि ब्रेंट क्रूड उछलकर 111.2 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया है, जो 20 मई के बाद का सबसे ऊंचा स्तर है और बाजार में लंबे समय बाद आई मजबूती को दर्शाता है।
अमेरिकी डॉलर का वैश्विक दबदबा और फेडरल रिजर्व की नीतियां
कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें अमेरिकी डॉलर और वैश्विक केंद्रीय बैंकों की ब्याज दर नीतियों को भी सीधे तौर पर प्रभावित कर रही हैं। अमेरिकी डॉलर न केवल संयुक्त राज्य अमेरिका की आधिकारिक मुद्रा है, बल्कि यह दुनिया के कई देशों में स्थानीय मुद्राओं के साथ लेन-देन के माध्यम के रूप में भी व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है। वैश्विक विदेशी मुद्रा बाजार में डॉलर का वर्चस्व लगातार बना हुआ है। वर्ष 2022 के आंकड़ों के अनुसार, दुनिया भर के कुल विदेशी मुद्रा कारोबार में 88 प्रतिशत से अधिक की हिस्सेदारी अमेरिकी डॉलर की है, जो रोजाना औसतन 6.6 ट्रिलियन डॉलर के वित्तीय लेन-देन के बराबर है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद डॉलर ने ब्रिटिश पाउंड को पीछे छोड़ते हुए दुनिया की प्रमुख रिजर्व करेंसी का दर्जा हासिल किया था। ऐतिहासिक रूप से अमेरिकी डॉलर सोने द्वारा समर्थित था, लेकिन वर्ष 1971 में ब्रेटन वुड्स समझौते के खात्मे के साथ गोल्ड स्टैंडर्ड समाप्त कर दिया गया था।
अमेरिकी डॉलर के मूल्य को निर्धारित करने वाला सबसे बड़ा कारक फेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीति है। अमेरिकी केंद्रीय बैंक को दो प्रमुख जिम्मेदारियां सौंपी गई हैं, जिनमें कीमतों में स्थिरता यानी मुद्रास्फीति को नियंत्रित रखना और रोजगार के अवसरों को अधिकतम करना शामिल है। इन लक्ष्यों को पाने के लिए फेडरल रिजर्व ब्याज दरों में बदलाव को मुख्य हथियार के रूप में इस्तेमाल करता है। जब वस्तुएं और सेवाएं तेजी से महंगी होने लगती हैं और महंगाई दर फेड के 2 प्रतिशत के लक्ष्य से ऊपर चली जाती है, तब फेडरल रिजर्व ब्याज दरों में बढ़ोतरी करता है, जिससे डॉलर को मजबूती मिलती है। इसके विपरीत, जब महंगाई 2 प्रतिशत से नीचे आ जाती है या बेरोजगारी दर चिंताजनक रूप से बढ़ जाती है, तब अर्थव्यवस्था को रफ्तार देने के लिए ब्याज दरों में कटौती की जाती है, जिसका डॉलर की कीमत पर नकारात्मक असर पड़ता है।
क्वांटिटेटिव ईजिंग और क्वांटिटेटिव टाइटनिंग का तंत्र
अत्यधिक गंभीर आर्थिक मंदी या वित्तीय संकट के समय फेडरल रिजर्व बाजार में नकदी बढ़ाने के लिए अपरंपरागत कदम भी उठाता है। ऐसा ही एक कदम क्वांटिटेटिव ईजिंग यानी क्यूई है, जिसके तहत केंद्रीय बैंक भारी मात्रा में मुद्रा जारी कर वित्तीय तंत्र में ऋण के प्रवाह को बढ़ाता है। इस नीति का सहारा तब लिया जाता है जब बैंकों के बीच एक-दूसरे को कर्ज देने का भरोसा खत्म हो जाता है और केवल ब्याज दरें घटाना नाकाफी साबित होता है। वर्ष 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के दौरान फेडरल रिजर्व ने इसी रणनीति को अपनाया था। इसके तहत केंद्रीय बैंक नई नकदी का सृजन करके वित्तीय संस्थानों से अमेरिकी सरकारी बॉन्ड खरीदता है, जिससे आमतौर पर डॉलर कमजोर होता है।
इसके ठीक उलट, क्वांटिटेटिव टाइटनिंग यानी क्यूटी की प्रक्रिया तब अपनाई जाती है जब केंद्रीय बैंक वित्तीय तंत्र से अतिरिक्त नकदी को वापस खींचना चाहता है। इस प्रक्रिया में फेडरल रिजर्व वित्तीय संस्थानों से नए बॉन्ड खरीदना बंद कर देता है और अपने पास मौजूद मैच्योर हो चुके बॉन्ड से मिलने वाले मूलधन का पुनर्निवेश नहीं करता है। वित्तीय प्रणाली से नकदी की मात्रा कम होने के कारण क्वांटिटेटिव टाइटनिंग आम तौर पर अमेरिकी डॉलर के मूल्य के लिए सकारात्मक साबित होती है।
मुद्रा बाजारों में उतार-चढ़ाव: ऑस्ट्रेलियाई डॉलर और जापानी येन
ऊर्जा की कीमतों में उछाल और फेडरल रिजर्व के रुख ने वैश्विक मुद्रा जोड़े पर भी अपना प्रभाव छोड़ा है। ऑस्ट्रेलियाई डॉलर बनाम अमेरिकी डॉलर यानी एयूडी/यूएसडी बुधवार के एशियाई कारोबारी सत्र में लगातार चौथे दिन बढ़त बनाए रखने में सफल रहा और 0.7000 के स्तर से ऊपर कारोबार करते हुए तीन सप्ताह के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया। रिजर्व बैंक ऑफ ऑस्ट्रेलिया के डिप्टी गवर्नर एंड्रयू हॉसर के सख्त बयानों और देश में महंगाई की चिंताओं ने ऑस्ट्रेलियाई मुद्रा को सहारा दिया है। हालांकि, अमेरिका और ईरान के बीच बनी अनिश्चितता के कारण डॉलर में खरीदारी लौटने से इस जोड़ी की ऊपरी बढ़त पर थोड़ा अंकुश लगा हुआ है।
दूसरी ओर, अमेरिकी डॉलर बनाम जापानी येन यानी यूएसडी/जेपीवाई एशियाई सत्र में निचले स्तरों पर कुछ खरीदारी दर्ज करने के बाद 158.50 के स्तर के आसपास एक सीमित दायरे में फंसा रहा। बैंक ऑफ जापान द्वारा ब्याज दरों में अगली बढ़ोतरी के समय को लेकर बनी अनिश्चितता जापानी येन के खरीदारों को बैकफुट पर रखे हुए है। इसके विपरीत, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों से पैदा होने वाले मुद्रास्फीति के दबाव ने फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में सख्ती की उम्मीदों को जिंदा रखा है, जिससे डॉलर को मजबूत समर्थन मिल रहा है। हालांकि, बाजार में जापानी अधिकारियों द्वारा संभावित मुद्रा हस्तक्षेप का डर बना हुआ है, जिससे येन की गिरावट सीमित रहने की संभावना है।
सोने की चाल और दिग्गज टेक कंपनियों के नतीजे
कमोडिटी बाजार में सोने की कीमतों पर दबाव लगातार बना हुआ है। बुधवार के एशियाई कारोबारी सत्र में बुलियन लगातार चौथे दिन गिरकर अपने साप्ताहिक निचले स्तर के करीब मंडराता दिखा। बाजार के ट्रेडर नए सौदे करने से पहले सोने की कीमत के 4,100 डॉलर प्रति औंस के अहम स्तर से नीचे टिकने का इंतजार कर रहे हैं। ऊर्जा की ऊंची लागत के कारण महंगाई दोबारा भड़कने का खतरा बना हुआ है, जिससे फेड की ओर से ब्याज दरें ऊंची रहने या बढ़ाने की आशंकाएं बनी हुई हैं। इस वजह से बिना ब्याज देने वाले सोने के प्रति आकर्षण घटा है और डॉलर की मांग बढ़ी है। फिर भी, यदि अमेरिका और ईरान के बीच कूटनीतिक समाधान की कोई ठोस खबर आती है तो सुरक्षित निवेश के तौर पर डॉलर की मांग थोड़ी घट सकती है, जिससे सोने को कुछ सहारा मिल सकता है।
इसके अलावा, वित्तीय बाजार की नजरें इस सप्ताह आने वाले कॉर्पोरेट नतीजों पर भी टिकी हुई हैं। मनोरंजन और प्रौद्योगिकी क्षेत्र की दिग्गज कंपनियां नेटफ्लिक्स, मेटा प्लेटफॉर्म्स और टेस्ला इस हफ्ते अपनी तिमाही कमाई के आंकड़े सार्वजनिक करने जा रही हैं। ये तीनों कंपनियां बाजार की अलग-अलग दिशाओं का प्रतिनिधित्व करती हैं और छुट्टी के कारोबारी सत्र से पहले निवेशकों की धारणा तय करने में इनकी वित्तीय रिपोर्ट बेहद निर्णायक साबित होगी। यही वजह है कि निवेशक इस समय उम्मीद और अनिश्चितता के बीच काफी सतर्क रुख अपनाए हुए हैं।

















