अंतरराष्ट्रीय विदेशी मुद्रा बाजार में यूरो और ब्रिटिश पाउंड के बीच विनिमय दर 0.8590 के आसपास एक सीमित दायरे में कारोबार कर रही है। वैश्विक निवेशकों और मुद्रा व्यापारियों की नजरें यूरोपीय सेंट्रल बैंक की आगामी नीतिगत समीक्षा पर टिकी हुई हैं। बाजार में इस बात की व्यापक संभावना व्यक्त की जा रही है कि यूरोपीय सेंट्रल बैंक इस साल दूसरी बार अपनी बेंचमार्क ब्याज दर में बढ़ोतरी का कदम उठा सकता है। इस संभावित बढ़ोतरी के बाद नीतिगत दर बढ़कर 2.5 प्रतिशत हो जाने की उम्मीद है। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के कारण उपभोक्ता मूल्य सूचकांक लंबे समय तक बैंक के निर्धारित लक्ष्य से ऊपर बने रहने की आशंका है, जिसके चलते केंद्रीय बैंक को सख्ती का रुख अपनाना पड़ रहा है।
ईसीबी की नीतिगत बैठक पर टिकी बाजार की निगाहें
यूरोपीय सेंट्रल बैंक की ओर से बेंचमार्क ब्याज दर में 25 बेसिस प्वाइंट का इजाफा किए जाने की मजबूत संभावना है। दर में इस वृद्धि के साथ ही मुख्य ब्याज दर 2.5 प्रतिशत पर पहुंच जाएगी। वित्तीय बाजारों में कारोबारी इस बात पर करीबी नजर रख रहे हैं कि ईसीबी अध्यक्ष क्रिस्टीन लागार्ड अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में क्या संदेश देती हैं। ऊर्जा और कच्चे तेल की ऊंची कीमतों के कारण मुद्रास्फीति मध्यम अवधि में बैंक के 2 प्रतिशत के लक्ष्य से अधिक बनी रह सकती है।
कॉमर्जबैंक के विश्लेषकों का मानना है कि यदि क्रिस्टीन लागार्ड अपनी मौद्रिक नीति को लेकर कड़ा या हॉकिश रुख स्पष्ट रूप से व्यक्त नहीं करती हैं, तो यूरो की विनिमय दर में गिरावट आ सकती है। निवेशक यह समझना चाहते हैं कि आने वाले महीनों में दरों में बढ़ोतरी का सिलसिला जारी रहेगा या केंद्रीय बैंक अपनी नीतिगत दरों को एक स्तर पर रोकने का इरादा रखता है।
केंद्रीय बैंकों की कार्यप्रणाली और मुद्रास्फीति नियंत्रण
संसार भर के केंद्रीय बैंकों का प्राथमिक दायित्व किसी देश या आर्थिक क्षेत्र में मूल्य स्थिरता बनाए रखना होता है। जब वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव होता है, तो अर्थव्यवस्था को मुद्रास्फीति या अवस्फीति की स्थिति का सामना करना पड़ता है। वस्तुओं के दामों में निरंतर बढ़ोतरी मुद्रास्फीति कहलाती है, जबकि कीमतों में लगातार गिरावट को अवस्फीति कहा जाता है। केंद्रीय बैंक का मुख्य कार्य अपनी नीतिगत दरों को समायोजित करके बाजार में मांग को संतुलित बनाए रखना होता है। अमरीका के फेडरल रिजर्व, यूरोपीय सेंट्रल बैंक और बैंक ऑफ इंग्लैंड जैसे दुनिया के प्रमुख केंद्रीय बैंकों का लक्ष्य मुद्रास्फीति को 2 प्रतिशत के आसपास बनाए रखना होता है।
मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिए केंद्रीय बैंकों के पास सबसे प्रभावी हथियार बेंचमार्क पॉलिसी रेट यानी ब्याज दर होता है। केंद्रीय बैंक पूर्व-निर्धारित तिथियों पर अपनी मौद्रिक नीति समिति की बैठकों के बाद नीतिगत दरों की घोषणा करते हैं और दर में बदलाव या उसे यथावत रखने के कारणों की जानकारी देते हैं। इसके आधार पर स्थानीय वाणिज्यिक बैंक अपनी जमा और ऋण दरों में समायोजन करते हैं। जब ब्याज दरें बढ़ाई जाती हैं, तो आम लोगों के लिए कर्ज लेना महंगा हो जाता है और जमा पर अधिक ब्याज मिलता है, जिसे मौद्रिक कड़ाई या मॉनेटरी टाइटनिंग कहा जाता है। इसके विपरीत, जब दरों में कटौती की जाती है, तो इसे मॉनेटरी ईजिंग या मौद्रिक नरमी कहा जाता है।
नीतिगत रुख: हॉक्स बनाम डव्स की बहस
अधिकांश केंद्रीय बैंक राजनीतिक हस्तक्षेप से स्वतंत्र होकर कार्य करते हैं। केंद्रीय बैंक के नीति बोर्ड के सदस्यों की नियुक्ति एक विस्तृत समीक्षा प्रक्रिया के माध्यम से की जाती है। बोर्ड का प्रत्येक सदस्य इस बात पर अपनी अलग धारणा रखता है कि मुद्रास्फीति को किस तरह नियंत्रित किया जाना चाहिए। जिन सदस्यों का मानना होता है कि अर्थव्यवस्था को रफ्तार देने के लिए ब्याज दरों को कम रखा जाना चाहिए और सस्ती ऋण व्यवस्था लागू की जानी चाहिए, भले ही मुद्रास्फीति 2 प्रतिशत से थोड़ी ऊपर चली जाए, उन्हें डव्स कहा जाता है। दूसरी तरफ, जो सदस्य जमा पर बेहतर रिटर्न देने और मुद्रास्फीति को हर हाल में 2 प्रतिशत या उससे नीचे रखने के लिए ऊंची ब्याज दरों के समर्थक होते हैं, उन्हें हॉक्स कहा जाता है।
नीतिगत बैठकों की अध्यक्षता अध्यक्ष या गवर्नर द्वारा की जाती है, जो हॉक्स और डव्स के विचारों के बीच सहमति बनाने का प्रयास करते हैं। यदि किसी प्रस्ताव पर बोर्ड में 50-50 का टाई हो जाता है, तो अध्यक्ष का वोट निर्णायक साबित होता है। बैठक के बाद अध्यक्ष प्रेस कॉन्फ्रेंस और संबोधनों के माध्यम से मौद्रिक नीति के भविष्य के रुख की जानकारी देते हैं। नीतिगत बैठक से कुछ दिन पहले तक एक ब्लैकआउट पीरियड लागू होता है, जिसके दौरान बोर्ड का कोई भी सदस्य सार्वजनिक रूप से नीति से जुड़ा कोई बयान नहीं दे सकता ताकि बाजारों में अचानक अस्थिरता न आए।
वैश्विक मुद्रा बाजारों का हाल: डॉलर, येन और ऑस्ट्रेलियाई डॉलर
यूरो के अलावा अन्य प्रमुख वैश्विक मुद्राओं में भी हलचल देखी जा रही है। एशियाई व्यापारिक सत्र के दौरान ऑस्ट्रेलियाई डॉलर बनाम अमरीकी डॉलर (AUD/USD) की दर 0.7200 के स्तर से ऊपर स्थिर बनी हुई है। रिजर्व बैंक ऑफ ऑस्ट्रेलिया (RBA) द्वारा ब्याज दरों में बढ़ोतरी की बढ़ती उम्मीदों के कारण ऑस्ट्रेलियाई डॉलर 14 मई के बाद के अपने उच्चतम स्तर के करीब बना हुआ है। हालांकि, फेडरल रिजर्व द्वारा दरों को ऊंचा रखने की संभावना और अमरीका व ईरान के बीच बढ़ते तनाव के कारण अमरीकी डॉलर को भी समर्थन मिल रहा है, जिससे इस मुद्रा जोड़े की तेजी पर कुछ सीमा लग गई है।
दूसरी ओर, अमरीकी डॉलर बनाम जापानी येन (USD/JPY) 153.50 से ऊपर स्थिर होता दिख रहा है। हालांकि, बैंक ऑफ जापान (BoJ) द्वारा दरों में बढ़ोतरी की संभावनाओं के पुनर्मूल्यांकन के कारण यह सात महीने के निचले स्तर के करीब कारोबार कर रहा है। अमरीका में सितंबर में फेड द्वारा दरों में वृद्धि की अटकलों और वैश्विक तनावों से डॉलर की बिकवाली पर थोड़ा अंकुश लगा है।
सोना और अमरीकी आर्थिक आंकड़े: पीपीआई और सीपीआई पर नजर
कीमती धातुओं के बाजार में सोने की कीमत 4,400 डॉलर प्रति औंस से नीचे जाने के बाद दोबारा संभलती हुई दिखी है। हालांकि, सोना अभी भी 4,450 डॉलर के महत्वपूर्ण प्रतिरोध स्तर से नीचे बना हुआ है। निवेशक अमरीकी आर्थिक आंकड़ों के जारी होने से पहले नए सौदे करने से बच रहे हैं। अमरीका का प्रोड्यूसर प्राइस इंडेक्स (PPI) का आंकड़ा आज जारी होना है, जबकि कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) की रिपोर्ट शुक्रवार को आएगी।
अमरीका की हालिया रोजगार रिपोर्ट ने फेडरल रिजर्व के अगले नीतिगत कदम को लेकर अनिश्चितता को पूरी तरह खत्म नहीं किया है, लेकिन नीति निर्माताओं को अपने विकल्प खुले रखने का अवसर दिया है। श्रम बाजार में कई महीनों की सुस्ती के बाद अगस्त में रोजगार के आंकड़ों में अनुमान से बेहतर सुधार देखने को मिला है, जिससे फेड को अपनी अगली मौद्रिक नीति तय करने में अधिक लचीलापन मिलेगा।



















