अमेरिकी केंद्रीय बैंक के नीति निर्माता विलियम्स ने अर्थव्यवस्था में आपूर्ति श्रृंखला से जुड़ी समस्याओं को लेकर अहम रुख सामने रखा है। उनका स्पष्ट मानना है कि अगर बाजार में आपूर्ति पक्ष के झटके लंबे समय तक टिके रहते हैं, तो मौद्रिक नीति तय करने वाले तंत्र के लिए उन्हें दरकिनार करना मुमकिन नहीं होगा। उन्होंने रेखांकित किया कि केंद्रीय बैंक का प्रमुख दायित्व यह सुनिश्चित करना है कि ऐसे आर्थिक झटके व्यवस्था में गहराई से जड़ें न जमा लें। इस महत्वपूर्ण वक्तव्य के तुरंत बाद विदेशी मुद्रा बाजारों में प्रतिक्रिया देखने को मिली, जहां अमेरिकी डॉलर इंडेक्स (DXY) 0.2 प्रतिशत की हल्की नरमी के साथ 101.05 के स्तर के आसपास पहुंच गया।
श्रम बाजार, टैरिफ और कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर दृष्टिकोण
आर्थिक दबावों का बारीकी से विश्लेषण करते हुए विलियम्स ने स्पष्ट किया कि मौजूदा समय में नौकरियों का बाजार महंगाई बढ़ाने वाला मुख्य कारक नहीं है। व्यापार नीतियों और शुल्कों पर बात करते हुए उन्होंने समझाया कि सामान्य तौर पर टैरिफ की वजह से दीर्घकालिक या अनवरत मुद्रास्फीति पैदा नहीं होती है। इसके अलावा, तकनीकी क्षेत्र में हो रहे बड़े बदलावों, विशेषकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के प्रसार पर नजर डालते हुए उन्होंने रेखांकित किया कि अभी तक उत्पादकता के आंकड़ों में AI का कोई ठोस या बड़ा असर दर्ज नहीं हुआ है। नीति निर्धारकों का ध्यान इस बात पर केंद्रित है कि अस्थायी मूल्य अस्थिरता स्थायी महंगाई का रूप न ले ले।
फेडरल रिजर्व के दोहरे लक्ष्य और ब्याज दरों का तंत्र
संयुक्त राज्य अमेरिका में समग्र मौद्रिक दिशा तय करने की शक्ति फेडरल रिजर्व के पास केंद्रित है। इस संस्थान को अमेरिकी कानून के तहत दो मुख्य जिम्मेदारियां सौंपी गई हैं, जिनमें कीमतों में स्थिरता बनाए रखना तथा रोजगार के अवसरों को अधिकतम स्तर तक पहुंचाना शामिल है। इन दोहरे लक्ष्यों को साधने के लिए केंद्रीय बैंक का प्राथमिक हथियार नीतिगत ब्याज दरों में समायोजन करना होता है।
जब बाजार में वस्तुओं और सेवाओं के दाम बेलगाम होने लगते हैं और मुद्रास्फीति फेड के 2 प्रतिशत के तय मानक से आगे निकल जाती है, तब नीति निर्माता उधार की लागत बढ़ा देते हैं। ब्याज दरों में यह बढ़ोतरी समूची अर्थव्यवस्था में कर्ज महंगा कर देती है। इस फैसले से अंतरराष्ट्रीय निवेशकों के लिए अमेरिका में पूंजी लगाना अधिक आकर्षक बन जाता है, जिसके परिणामस्वरूप ग्रीनबैक यानी अमेरिकी डॉलर को मजबूती मिलती है। इसके विपरीत, जब महंगाई दर 2 प्रतिशत के बेंचमार्क से नीचे खिसकने लगती है अथवा बेरोजगारी दर खतरनाक स्तर तक बढ़ जाती है, तब केंद्रीय बैंक आर्थिक गतिविधियों को सहारा देने के लिए दरों में कटौती करता है, जिसका स्वाभाविक दबाव डॉलर की ताकत पर पड़ता है।
एफओएमसी की बैठकें और निर्णय लेने की व्यवस्था
अमेरिकी मौद्रिक नीतियों की रूपरेखा तैयार करने के लिए फेडरल ओपन मार्केट कमेटी (FOMC) साल भर में कुल आठ बार आधिकारिक बैठकें आयोजित करती है। इन सम्मेलनों में व्यापक आर्थिक संकेतकों, वित्तीय सेहत और उत्पादन आंकड़ों का सूक्ष्म मूल्यांकन किया जाता है। निर्णय लेने वाली इस उच्चस्तरीय समिति में बारह शीर्ष अधिकारी शामिल होते हैं। इनमें बोर्ड ऑफ गवर्नर्स के सात सदस्य, फेडरल रिजर्व बैंक ऑफ न्यूयॉर्क के अध्यक्ष तथा बाकी बचे ग्यारह क्षेत्रीय रिजर्व बैंकों के प्रमुखों में से चार अध्यक्ष शामिल होते हैं, जो एक-एक वर्ष के रोटेशन आधार पर अपनी सेवाएं देते हैं।
मात्रात्मक सहजता और कड़ाई: असाधारण मौद्रिक उपाय
गंभीर वित्तीय संकट या असामान्य आर्थिक शिथिलता के दौर में फेडरल रिजर्व गैर-पारंपरिक रणनीतियों का सहारा लेता है। ऐसी ही एक नीति क्वांटिटेटिव ईजिंग (QE) अथवा मात्रात्मक सहजता कहलाती है, जिसके जरिए केंद्रीय बैंक संकटग्रस्त बैंकिंग तंत्र में ऋण प्रवाह को बड़े पैमाने पर बढ़ाता है। वर्ष 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के समय इस उपाय का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया गया था। इस प्रक्रिया में नया धन सृजित करके वित्तीय संस्थानों से उच्च गुणवत्ता वाले सरकारी बॉन्ड खरीदे जाते हैं, जिससे आमतौर पर डॉलर कमजोर होता है।
इसके ठीक उलट प्रक्रिया को क्वांटिटेटिव टाइटनिंग (QT) या मात्रात्मक कड़ाई कहा जाता है। इस रणनीति के अंतर्गत केंद्रीय बैंक बॉन्ड खरीदना बंद कर देता है और परिपक्व हो चुके बॉन्डों से मिलने वाले मूलधन का पुनर्निवेश नए बॉन्डों में नहीं करता। इस प्रकार बाजार से अतिरिक्त तरलता वापस खींच ली जाती है, जो सामान्य तौर पर अमेरिकी डॉलर के मूल्य के लिए सकारात्मक साबित होती है।
विदेशी मुद्रा बाजार में हलचल और तकनीकी स्थिति
मुद्रा विनिमय बाजारों में शुक्रवार के एशियाई सत्र के दौरान महत्वपूर्ण उतार-चढ़ाव दर्ज किए गए। ऑस्ट्रेलियाई डॉलर और अमेरिकी डॉलर (AUD/USD) की जोड़ी रातोंरात अपने 200-दिवसीय सिंपल मूविंग एवरेज के नीचे फिसलने के बाद 0.7000 के निकट कमजोर नजर आई और इसने अगस्त की शुरुआत के बाद का सबसे निचला स्तर छू लिया। कच्चे तेल की कीमतों में लगातार दो दिनों की तेजी ने मुद्रास्फीति की चिंताएं दोबारा बढ़ा दी हैं, जिसने अमेरिकी बॉन्ड यील्ड को कई वर्षों के उच्च स्तर पर पहुंचा दिया है। रिजर्व बैंक ऑफ ऑस्ट्रेलिया (RBA) द्वारा दरों में बढ़ोतरी की उम्मीदों पर भू-राजनीतिक जोखिम और मजबूत डॉलर का असर भारी पड़ गया।
दूसरी तरफ, जापानी येन के मुकाबले अमेरिकी डॉलर (USD/JPY) एशियाई कारोबार में थोड़ा नरम हुआ और 159.00 के तीन सप्ताह के शीर्ष स्तर के पास इसकी तेज रफ्तार थम गई। बाजार में जापानी अधिकारियों द्वारा संभावित हस्तक्षेप की आशंका ने येन के विक्रेताओं को सतर्क कर दिया है। हालांकि, बैंक ऑफ जापान (BOJ) द्वारा हाल ही में ब्याज दर लक्ष्य को 7-2 के बहुमत से 1.00 प्रतिशत से बढ़ाकर 1.25 प्रतिशत किए जाने के बावजूद उसका नरम रुख डॉलर-येन के भाव को समर्थन दे रहा है। लाइव तकनीकी आंकड़ों के मुताबिक USD/JPY की दर 157.67 पर है, जो पिछले बंद स्तर 158.26 से 0.37 प्रतिशत कम है। इसका 52-सप्ताह का दायरा 149.41 से 163.98 के बीच है। रिलेटिव स्ट्रेंथ इंडेक्स 53 पर संतुलित है, जबकि 20-दिवसीय ईएमए 156.89, 50-दिवसीय ईएमए 158.05 और 200-दिवसीय ईएमए 157.67 पर स्थित हैं। लंबी अवधि में गोल्डन क्रॉस बना हुआ है और 14-दिवसीय एटीआर 1.44 अंक की दैनिक अस्थिरता दर्शाता है। इसके प्रमुख समर्थन स्तर 157.19 और 156.70 पर हैं, जबकि प्रतिरोध स्तर 158.51 तथा 159.34 पर देखे जा रहे हैं।
सोने के भाव और केंद्रीय बैंकों का रुख
कीमती धातुओं के खंड में सोने की कीमतों में शुक्रवार को थोड़ी रिकवरी देखी गई। यह धातु 4,230 डॉलर के समर्थन क्षेत्र से उछलने के बाद 4,300 डॉलर के स्तर के ठीक नीचे कारोबार करती पाई गई। इसके बावजूद धातु पर समग्र दबाव बना हुआ है, क्योंकि अमेरिकी फेड द्वारा आगे भी दरें ऊंची बनाए रखने की उम्मीदें और दीर्घकालिक ट्रेजरी यील्ड का 5 प्रतिशत से ऊपर टिका रहना गैर-ब्याज वाली संपत्तियों पर लगातार भारी पड़ रहा है। वैश्विक केंद्रीय बैंक लगातार बदलती परिस्थितियों के बीच महंगाई और विकास के बीच नाजुक संतुलन बनाने का प्रयास कर रहे हैं।


















