अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आई हालिया गिरावट अब एक अहम मोड़ पर ठहरती दिख रही है। पिछले दिनों 96.00 डॉलर प्रति बैरल के साप्ताहिक शिखर तक चढ़ने के बाद डब्ल्यूटीआई क्रूड फिसलकर 91.00 डॉलर और 92.00 डॉलर के बीच एक सीमित दायरे में स्थिर होने का प्रयास कर रहा है। ताजा कारोबारी आंकड़ों के अनुसार कच्चा तेल 92.37 डॉलर के स्तर पर देखा गया, जो पिछले सत्र के बंद भाव 94.61 डॉलर की तुलना में 2.37 प्रतिशत की कमजोरी दर्शाता है। तेल की कीमतों में आई इस नरमी के पीछे खाड़ी देशों की ओर से सितंबर में आपूर्ति बढ़ाए जाने की मुख्य भूमिका रही है। इसके उलट, पश्चिम एशिया में निरंतर बना भू-राजनीतिक तनाव और संघर्ष की अनिश्चितता कीमतों को बहुत ज्यादा नीचे फिसलने से रोक रही है, जिससे बाजार दोनों दबावों के बीच झूल रहा है।
खाड़ी देशों से तेल निर्यात में अप्रत्याशित बढ़ोतरी
कच्चे तेल पर बने मंदी के दबाव की प्राथमिक वजह फारस की खाड़ी से होने वाली आपूर्ति में आया तेज उछाल है। होर्मुज जलडमरूमध्य के जरिए सऊदी अरब से होने वाला कच्चे तेल का निर्यात सितंबर महीने में युद्ध काल के अपने उच्चतम स्तर को छूते हुए 50 लाख बैरल प्रतिदिन से ऊपर निकल गया है। यह आंकड़ा पिछले महीनों की तुलना में काफी बड़ा बदलाव दर्शाता है, जहां अगस्त में यह प्रवाह 34 लाख बैरल प्रतिदिन और जुलाई में 45 लाख बैरल प्रतिदिन दर्ज किया गया था। इस समुद्री मार्ग से तेल की निकासी में आई तेज रफ्तार ने वैश्विक स्तर पर ऊर्जा आपूर्ति को लेकर बैठी तात्कालिक आशंकाओं को काफी हद तक कम किया है।
सऊदी अरब के साथ-साथ इस क्षेत्र के अन्य प्रमुख उत्पादक भी वैश्विक आपूर्ति को सहज बनाने में जुटे हुए हैं। इराक, कुवैत और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देश अपने जहाजों के ट्रांसपोंडर बंद करके खाड़ी क्षेत्र से तेल की खेप बाहर भेज रहे हैं। इस रणनीति के जरिए अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अतिरिक्त आपूर्ति पहुंचाई जा रही है, जिससे आपूर्ति बाधित होने का डर हल्का पड़ा है और कीमतों में हालिया नरमी देखने को मिली है। आपूर्ति का यह बढ़ता प्रवाह रिफाइनरियों और आयातक देशों को तत्काल राहत दे रहा है।
कूटनीतिक प्रयास और युद्धविराम का नया प्रस्ताव
बाजार में जोखिम प्रीमियम कम होने का एक और बड़ा कारण पर्दे के पीछे चल रही शांति वार्ताएं हैं। अमेरिका और ईरान के बीच एक शांति समझौते पर पहुंचने के लिए गोपनीय बातचीत जारी रहने की सूचनाओं ने संघर्ष के बातचीत के जरिए समाधान की उम्मीदों को बल दिया है। तेहरान ने हाल ही में सात दिनों के नए युद्धविराम का प्रस्ताव सामने रखा है। इस औपचारिक प्रस्ताव के तहत जून में हस्ताक्षरित सहमति पत्र यानी एमओयू को लागू करने और होर्मुज जलडमरूमध्य को निर्बाध आवाजाही के लिए पूरी तरह से खोलने की बात कही गई है। कूटनीतिक मोर्चे पर इस तरह की प्रगति से व्यापारियों में यह उम्मीद जगी है कि यदि समुद्री गलियारा सुरक्षित रहता है तो आपूर्ति संकट टल सकता है।
सैन्य हमले और बुनियादी ढांचे पर नए खतरे
कूटनीतिक सुगबुगाहट के बीच जमीनी स्तर पर अनिश्चितता अब भी चरम पर बनी हुई है। सऊदी अरब के अधिकारियों द्वारा यमन से हूती विद्रोहियों द्वारा दागी गई मिसाइलों की एक नई खेप को बीच रास्ते में ही मार गिराए जाने की पुष्टि के बाद बाजार में सतर्कता फिर बढ़ गई है। तेल बाजार में इस बात को लेकर गहरी घबराहट बनी हुई है कि इस तरह का कोई भी संभावित हमला सऊदी अरब के तेल क्षेत्रों को दोबारा नुकसान पहुंचा सकता है। तेल प्रतिष्ठानों पर प्रत्यक्ष हमले का यह स्थायी जोखिम ही वह मुख्य कारक है जो कच्चे तेल की कीमतों को तेजी से नीचे जाने से रोक रहा है और 91 डॉलर के ऊपर एक मजबूत सहारा दे रहा है।
डब्ल्यूटीआई क्रूड की प्रकृति और गुणवत्ता
अंतरराष्ट्रीय जिंस बाजारों में कारोबार किए जाने वाले कच्चे तेल में डब्ल्यूटीआई एक प्रमुख किस्म है, जिसे वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट के नाम से जाना जाता है। वैश्विक पटल पर यह ब्रेंट और दुबई क्रूड के साथ तीन सबसे बड़े बेंचमार्क में गिना जाता है। डब्ल्यूटीआई तेल को इसके अपेक्षाकृत कम घनत्व के कारण हल्का और सल्फर की बेहद कम मात्रा के चलते मीठा कहा जाता है। कम सल्फर और हल्के घनत्व के कारण इसे रिफाइन करना बेहद आसान होता है, जिससे यह उच्च गुणवत्ता वाले गैसोलीन और डीजल उत्पादन के लिए अत्यधिक मुफीद माना जाता है। यह तेल संयुक्त राज्य अमेरिका में निकाला जाता है और ओक्लाहोमा स्थित कुशिंग हब के माध्यम से देश भर में वितरित किया जाता है, जिसे दुनिया के पाइपलाइन चौराहे के रूप में जाना जाता है।
कच्चे तेल की कीमत तय करने वाले बुनियादी कारक
अन्य सभी संपत्तियों की तरह डब्ल्यूटीआई तेल की दरें भी बुनियादी तौर पर मांग और आपूर्ति के संतुलन से निर्धारित होती हैं। जब वैश्विक आर्थिक विकास की गति मजबूत होती है तो कारखानों और परिवहन क्षेत्र से तेल की मांग में उछाल आता है, जिससे कीमतें चढ़ती हैं। इसके विपरीत सुस्त वैश्विक विकास मांग को घटा देता है। इसके अलावा राजनीतिक अस्थिरता, क्षेत्रीय युद्ध और प्रमुख उत्पादक देशों पर लगाए जाने वाले प्रतिबंध आपूर्ति श्रृंखला को अस्त-व्यस्त कर कीमतों में भारी उछाल ला सकते हैं। ओपेक देशों के उत्पादन कोटा के फैसले भी बाजार की चाल तय करने में निर्णायक भूमिका निभाते हैं। चूंकि कच्चे तेल का अधिकांश अंतरराष्ट्रीय कारोबार अमेरिकी डॉलर में होता है, इसलिए डॉलर की कीमत में होने वाले उतार-चढ़ाव का सीधा असर पड़ता है। जब अमेरिकी डॉलर कमजोर होता है तो अन्य मुद्रा वाले देशों के लिए तेल खरीदना सस्ता हो जाता है, जिससे मांग और कीमतें दोनों बढ़ सकती हैं।
भंडारण आंकड़े और ओपेक की भूमिका
अमेरिकी पेट्रोलियम संस्थान यानी एपीआई और अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन यानी ईआईए द्वारा हर हफ्ते जारी की जाने वाली तेल इन्वेंटरी रिपोर्ट भी कीमतों पर गहरा प्रभाव डालती हैं। यह साप्ताहिक डेटा सीधे तौर पर आपूर्ति और खपत में आ रहे अंतर को दर्शाता है। यदि रिपोर्ट में कच्चे तेल के भंडार में गिरावट दिखती है, तो इसका मतलब है कि मांग मजबूत बनी हुई है, जिससे कीमतें ऊपर चढ़ती हैं। दूसरी ओर, भंडारण में बढ़ोतरी अधिक आपूर्ति की ओर इशारा करती है और कीमतों पर दबाव बनाती है। एपीआई अपनी रिपोर्ट हर मंगलवार को प्रकाशित करता है, जबकि सरकारी एजेंसी ईआईए अगले दिन अपने आंकड़े जारी करती है। दोनों के परिणाम लगभग 75 प्रतिशत मामलों में एक-दूसरे के 1 प्रतिशत के दायरे में ही रहते हैं, हालांकि ईआईए के सरकारी एजेंसी होने के कारण इसके आंकड़ों को बाजार में अधिक आधिकारिक माना जाता है।
वैश्विक आपूर्ति को नियंत्रित करने में ओपेक की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रहती है। 12 तेल उत्पादक देशों का यह समूह साल में दो बार होने वाली बैठकों में अपने सदस्य देशों के लिए उत्पादन कोटा निर्धारित करता है। जब ओपेक उत्पादन में कटौती का निर्णय लेता है, तो वैश्विक बाजार में तेल की उपलब्धता घट जाती है और कीमतें बढ़ जाती हैं। उत्पादन बढ़ाने पर इसका ठीक उल्टा असर दिखाई देता है। इस समूह के साथ जब रूस समेत दस अन्य गैर-ओपेक निर्यातक देश जुड़ते हैं, तो इसे ओपेक प्लस कहा जाता है, जिसका ऊर्जा बाजार पर व्यापक नियंत्रण रहता है।
तकनीकी संकेत और प्रमुख कारोबारी स्तर
वर्तमान बाजार संकेतकों पर नजर डालें तो दैनिक चार्ट पर आरएसआई 49 पर बना हुआ है, जो तटस्थ गति का संकेत देता है। 20-दिवसीय ईएमए 94.40 डॉलर, 50-दिवसीय ईएमए 89.97 डॉलर और 200-दिवसीय ईएमए 80.12 डॉलर पर स्थित है, जिसमें लंबी अवधि का रुझान सकारात्मक बना हुआ है और गोल्डन क्रॉस कायम है। एमएसीडी 2.36 पर सिग्नल लाइन 3.55 के नीचे नकारात्मक हिस्टोग्राम दर्शा रहा है। तात्कालिक रूप से 93.09 डॉलर का पिवट स्तर काफी महत्वपूर्ण है। ऊपर की ओर 94.03 डॉलर और 95.70 डॉलर पर प्रतिरोध देखा जा सकता है, जबकि नीचे की ओर 91.42 डॉलर और 90.48 डॉलर के स्तर मजबूत समर्थन प्रदान कर रहे हैं। 52 हफ्तों के दौरान तेल का निचला स्तर 54.98 डॉलर और ऊपरी स्तर 119.48 डॉलर दर्ज रहा है।
वैश्विक वित्तीय बाजारों और मुद्राओं पर असर
तेल बाजार के इस घटनाक्रम का प्रभाव अन्य वित्तीय संपत्तियों पर भी स्पष्ट रूप से देखा जा रहा है। फेडरल रिजर्व के आक्रामक रुख और तेल के कारण दोबारा उभरती मुद्रास्फीति की चिंताओं ने अमेरिकी बॉन्ड यील्ड को कई वर्षों के उच्चतम स्तर पर पहुंचा दिया है। इसके चलते एशियाई सत्र में शुक्रवार को ऑस्ट्रेलियाई डॉलर अमेरिकी डॉलर के मुकाबले कमजोर होकर 0.7000 के संवेदनशील स्तर के पास संघर्ष करता दिखा। जापानी येन के मुकाबले अमेरिकी डॉलर 159.00 के तीन सप्ताह के उच्च स्तर पर पहुंचने के बाद थोड़ा संभला है, जहां संभावित सरकारी हस्तक्षेप की आशंकाएं देखी जा रही हैं। उधर बैंक ऑफ जापान द्वारा अपनी अल्पकालिक ब्याज दर 7-2 के बहुमत से 1.00 प्रतिशत से बढ़ाकर 1.25 प्रतिशत कर दी गई है। सुरक्षित निवेश माने जाने वाले सोने में भी कुछ रिकवरी आई है और यह 4,230 डॉलर के समर्थन से उछलकर 4,300 डॉलर के नीचे कारोबार कर रहा है, हालांकि अमेरिकी बॉन्ड प्रतिफल 5 प्रतिशत से ऊपर बने रहने से इस पर दबाव बना हुआ है।



















