यूरोपीय और वैश्विक वित्तीय बाजारों में इस समय केंद्रीय बैंकों की नीतियों और आने वाले प्रमुख आर्थिक आंकड़ों को लेकर भारी अनिश्चितता का माहौल बना हुआ है। पोलैंड के केंद्रीय बैंक, नेशनल बैंक ऑफ पोलैंड की हालिया नीतिगत समीक्षा और उसके गवर्नर एडम ग्लापिंस्की के बयानों ने मुद्रा बाजार में नई बहस छेड़ दी है। भले ही केंद्रीय बैंक के बयानों में मुद्रास्फीति को लेकर सख्त रुख दिखाया गया हो, लेकिन जमीनी स्तर पर दर वृद्धि को टालने के फैसले से पोलिश ज़्लॉटी पर गिरावट का खतरा गहरा गया है। वाणिज्यिक बैंकिंग समूह कॉमर्सबैंक के विश्लेषक तथा घोष ने स्पष्ट किया है कि पोलैंड का यह सतर्क रुख आने वाले समय में मुद्रा के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है, क्योंकि ईंधन कीमतों पर मिली अस्थायी सरकारी राहत हटने के बाद मुद्रास्फीति के दोबारा अनियंत्रित होने की आशंका बनी हुई है।
इसी बीच अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बाजारों में भी कई बड़े बदलाव देखने को मिल रहे हैं। एक तरफ जहां अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में आई गिरावट और ईरान के साथ तनाव कम होने की उम्मीदों ने अमेरिकी डॉलर की बढ़त को सीमित किया है, वहीं दूसरी तरफ शुक्रवार को आने वाले अमेरिकी नॉन-फार्म पेरोल्स आंकड़ों से पहले निवेशक किसी भी बड़े जोखिम से बचते नजर आ रहे हैं। इस व्यापक आर्थिक पृष्ठभूमि के बीच पोलिश ज़्लॉटी, ऑस्ट्रेलियाई डॉलर, जापानी येन और सोने की कीमतों में अलग-अलग दिशाओं में हलचल दर्ज की जा रही है।
नेशनल बैंक ऑफ पोलैंड की नीति और ज़्लॉटी के सामने खड़ी चुनौतियां
पोलैंड के केंद्रीय बैंक के गवर्नर एडम ग्लापिंस्की ने अपनी हालिया नीतिगत बैठक में ब्याज दरों को यथावत बनाए रखने का फैसला किया। उन्होंने इसके पीछे आर्थिक विकास की धीमी रफ्तार, मजदूरी वृद्धि में नरमी और अक्टूबर महीने में मुद्रास्फीति के केंद्रीय बैंक के लक्ष्य के दायरे में लौटने का हवाला दिया। गवर्नर ने दिसंबर के महीने में ब्याज दरों में किसी भी तरह की बढ़ोतरी की संभावना को सिरे से खारिज कर दिया है और स्पष्ट संकेत दिया है कि कम से कम अगली तिमाही की शुरुआत तक किसी नीतिगत बदलाव की उम्मीद नहीं की जानी चाहिए।
हालांकि, वित्तीय विश्लेषकों का मानना है कि इस नीतिगत ठहराव के पीछे जो तर्क दिए गए हैं, वे काफी कमजोर हैं। अक्टूबर में महंगाई दर में आई गिरावट टिकाऊ आर्थिक सुधार की वजह से नहीं, बल्कि सरकार द्वारा ईंधन की कीमतों पर दी गई प्रशासनिक रियायतों और कर कटौतियों का परिणाम थी। तथा घोष का तर्क है कि जब किसी देश की मौद्रिक नीति सरकारी सब्सिडी, बिजली दरों और प्रशासनिक मूल्य नियंत्रणों पर अत्यधिक निर्भर हो जाती है, तो दीर्घकालिक वित्तीय स्थिरता खतरे में पड़ जाती है। ऐसे अस्थायी उपायों के आधार पर दरों में वृद्धि टालना अंततः मुद्रा के मूल्य को नीचे धकेलने का काम करता है।
2027 तक मुद्रास्फीति का अनुमान और दूसरी लहर के जोखिम
नेशनल बैंक ऑफ पोलैंड के नए आर्थिक अनुमानों से संकेत मिलता है कि देश में मुद्रास्फीति का दबाव लंबे समय तक बना रह सकता है। ताजा अनुमानों के मुताबिक यदि पोलिश सरकार 2027 तक ईंधन कर में दी गई रियायतों को आगे नहीं बढ़ाती है, तो उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित मुद्रास्फीति वर्ष 2027 की पहली और दूसरी तिमाही के दौरान उछलकर लगभग 5 प्रतिशत वार्षिक स्तर तक पहुंच सकती है। इससे भी अधिक चिंता की बात यह है कि यदि सरकार कर राहत को जारी भी रखती है, तब भी 2027 की पहली छमाही में महंगाई दर 3.5 प्रतिशत वार्षिक से अधिक रहने का अनुमान है, जो पोलैंड के केंद्रीय बैंक के तय लक्ष्य सीमा के ऊपरी दायरे से कहीं अधिक है।
बाजार में केवल उपभोक्ता कीमतें ही चिंता का विषय नहीं हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे माल और खाद्य पदार्थों की ऊंची कीमतें, उत्पादक मूल्य सूचकांक में लगातार बना हुआ उछाल और मजदूरी व उत्पादन लागत बढ़ने से दूसरे दौर के मुद्रास्फीति प्रभावों का बढ़ता खतरा केंद्रीय बैंक के लिए विकट परिस्थिति पैदा कर रहा है। तथा घोष के अनुसार, इन परिस्थितियों में ब्याज दरों को स्थिर बनाए रखने से मौद्रिक नीति जरूरत से ज्यादा ढीली रह जाएगी। मुद्रा बाजार में ज़्लॉटी पहले से ही दबाव में आकर कमजोर हो रही है, और ब्याज दरों पर कड़ा कदम न उठाने से आने वाले महीनों में इसकी गिरावट और तेज हो सकती है।
ऑस्ट्रेलियाई डॉलर और जापानी येन में मिलाजुला रुख
वैश्विक मंच पर केवल पूर्वी यूरोप की मुद्राएं ही दबाव में नहीं हैं, बल्कि प्रशांत और एशियाई क्षेत्र में भी व्यापक बदलाव देखे जा रहे हैं। शुक्रवार के एशियाई कारोबारी सत्र के दौरान ऑस्ट्रेलियाई डॉलर अमेरिकी डॉलर के मुकाबले तीन सप्ताह के निचले स्तर तक फिसल गया। इस गिरावट की मुख्य वजह रिज़र्व बैंक ऑफ ऑस्ट्रेलिया का नीतिगत रुख में नरमी लाना और वैश्विक शेयर बाजारों में आई तेज बिकवाली रही, जिससे जोखिम से जुड़ी मुद्राओं की मांग घट गई। हालांकि, अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड के दो महीने के निचले स्तर पर आ जाने की वजह से डॉलर की तेजी भी सीमित रही, जिससे ऑस्ट्रेलियाई डॉलर को और अधिक गिरने से सहारा मिला।
दूसरी ओर, जापानी येन के मुकाबले अमेरिकी डॉलर शुक्रवार को एशियाई सत्र के अपने साप्ताहिक निचले स्तर से मामूली बढ़त दर्ज करने में सफल रहा। अमेरिकी नौकरियों की रिपोर्ट आने से पहले मंदड़िए सतर्क रुख अपना रहे हैं। अमेरिकी बॉन्ड प्रतिफल में गिरावट और पश्चिम एशिया में ईरान युद्ध के तनाव में कमी आने की उम्मीदों ने डॉलर पर दबाव बनाए रखा है। इसके विपरीत, बैंक ऑफ जापान के ब्याज दरें बढ़ाने की संभावनाओं और जापानी अधिकारियों द्वारा मुद्रा बाजार में संभावित हस्तक्षेप के जोखिम ने येन को ठोस समर्थन दिया है, जिसके चलते डॉलर-येन जोड़ी की बढ़त एक सीमित दायरे में सिमट गई है।
सोने की कीमतों में सुधार के बाद सीमित दायरे का कारोबार
कीमती धातुओं के बाजार में सोना पिछले दिनों की तेजी के बाद कुछ सुस्ती दिखाता नजर आया। अमेरिकी मध्यावधि चुनावों में डेमोक्रेटिक पार्टी की शानदार जीत के बाद डॉलर के कमजोर पड़ने से सोने की कीमतें एक बार फिर 4,000 डॉलर के मनोवैज्ञानिक स्तर के पार पहुंच गई थीं। हालांकि, शुक्रवार के एशियाई कारोबारी सत्र में सोना अपने दो सप्ताह के उच्च स्तर से फिसलकर 4,050 डॉलर प्रति औंस के नीचे आ गया। डॉलर इंडेक्स में सितंबर के अंत के निचले स्तर से आई मामूली रिकवरी ने सर्राफा बाजार पर कुछ दबाव डाला है।
पूरे वर्ष के दौरान सोने में हर तेज उछाल के बाद भारी मुनाफावसूली और बिकवाली देखने को मिली है। इसलिए, अंतरराष्ट्रीय बाजार के कारोबारी अब शुक्रवार को जारी होने वाली अमेरिकी नॉन-फार्म पेरोल्स रिपोर्ट की प्रतीक्षा कर रहे हैं। यह रिपोर्ट ही तय करेगी कि सोने की हालिया तेजी एक टिकाऊ ब्रेकआउट है या फिर यह केवल एक अस्थायी उछाल भर है। जब तक रोजगार और मजदूरी के स्पष्ट आंकड़े सामने नहीं आते, तब तक विदेशी मुद्रा और कमोडिटी दोनों ही बाजारों में दिशाहीन और सतर्क कारोबार जारी रहने की संभावना है।



















